भगवान‍्में विश्वास करके स्वस्थ हो जाइये

प्रिय भाई! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपकी स्थिति अवश्य शोचनीय है; परन्तु निराश होने-जैसी कोई बात नहीं है और इस बातको लेकर आत्महत्या करनेका विचार तो सर्वथा ही अनुचित है। प्रथम तो आत्महत्या स्वयं एक महापाप है। आत्महत्या दु:खसे छुटकारा पानेका साधन नहीं बल्कि दु:खरूपी ग्रन्थका एक बड़ा अध्याय और भी बढ़ानेवाला है। आत्महत्या करनेवालेको परलोकमें भीषण यन्त्रणा और अशान्तिका भोग करना पड़ता है। दूसरे, यह बात भी ऐसी नहीं है कि जिसके लिये यहाँतककी बात सोचना आवश्यक हो।

आजकल लड़कोंके और लड़कियोंके पूर्ण तरुण अवस्था होनेके पश्चात् विवाह होते हैं। स्कूल-कॉलेज और छात्रावासोंके अनियन्त्रित ही नहीं, बल्कि मन-इन्द्रियोंको उत्तेजित करनेवाले वातावरणमें उन्हें रखा जाता है। गन्दे शृंगारसे पूर्ण सिनेमा आदि देखे-सुने जाते हैं और कहीं-कहीं युवक-युवतियोंकी साथ-साथ पढ़ायी होती है। ऐसी अवस्थामें जीवन सर्वथा निर्दोष रहे, अपरिपक्वबुद्धि तरुणोंमें कोई बुरी आदत न आ जाय, यह सोचना भी एक प्रकारसे पागलपन है। अरण्यवासी आचार्य-ऋषियोंके तप:पूत आश्रमोंमें सुनियन्त्रित कठोर नियमोंसे आबद्ध संयमपूर्ण जीवनमें भी ‘व्रतसे स्खलन न हो जाय’, इसके लिये सावधानी रखनी पड़ती थी। तब आजकलके छात्रोंमें बुरी आदतोंका आ जाना कोई आश्चर्यकी बात नहीं। पर आपने जो स्थिति लिखी है उससे यह मालूम होता है कि आपको सन्देह हो गया है। वास्तवमें आपमें वह रोग नहीं है, जिसकी आप सम्भावना करते हैं। मेरे एक परिचित नवयुवक, जिन्होंने सर्वथा अपनेको इस रोगसे ग्रस्त मान लिया था, इस समय चार सन्तानोंके पिता हैं। अतएव आपको सन्देह नहीं करना चाहिये और पिता-माताके इच्छानुसार विवाह कर लेना चाहिये। विवाह होनेपर, आशा है आपकी शिकायतें दूर हो जायँगी। इस बीचमें आप प्रतिदिन गायत्री-मन्त्रका जप कीजिये। पवित्र धर्मग्रन्थोंका अध्ययन कीजिये और रात्रिके समय एकान्तमें मत सोइये। मनमें बार-बार ऐसा निश्चय कीजिये ‘मैं नीरोग हूँ’, ‘मुझमें अमुक रोग बिलकुल नहीं है।’ ‘मैं स्वस्थ हूँ।’ ‘कोई भी बुरे विचार और बुरी आदत मुझमें नहीं रह सकती; क्योंकि सर्वशक्तिमान्, नित्य निरामय भगवान‍्ने मुझको अपना लिया है।’ ‘मैं उनका हो गया हूँ।’ ‘उनके संरक्षणमें हूँ।’

इस प्रकार प्रयत्न कीजिये। आशा है आप बहुत शीघ्र अपनेको स्वस्थ मन और स्वस्थ शरीरका पायेंगे। भगवान‍्में और अपने आत्मामें श्रद्धा रखिये और स्वस्थ हो जाइये। विशेष भगवत्कृपा।