भगवत्कृपाका भरोसा
आपका भावपूर्ण कृपापत्र मिला। उसमें ऐसी कोई बात तो नहीं मालूम होती, जिसका उत्तर मैं लिखूँ। आपने अपनी त्रुटियोंके लिये खेद प्रकट करते हुए स्वयं ही भगवद्भजन, तत्त्व-साक्षात्कार और सद्व्यवहारकी आवश्यकता प्रदर्शित की है। यही बात बहुत ठीक है। इस मानव-शरीरकी विशेषता तो यही है कि केवल इसी योनिमें जीवको कर्तव्याकर्तव्यका विवेक होता है और इसीमें वह आवागमनके चक्रसे छूटकर परमपद प्राप्त कर सकता है। मानव-जन्म पाकर जिसने इस लक्ष्यकी ओर जहाँतक गति प्राप्त की है वहाँतक ही उसका जन्म सफल समझना चाहिये। भोगोंकी प्राप्ति तो सभी योनियोंमें समान है।
परन्तु जीव अनादिकालसे भोगोंमें ही रचा-पचा रहनेके कारण उन्हें छोड़ना नहीं चाहता। इस क्षुद्र प्रलोभनके कारण ही वह इस अमूल्य जन्मके परमलाभसे वंचित रह जाता है। इस मायाकी मोहिनी शक्तिने सबको भुला रखा है। इसके कारण कई बार अच्छे-अच्छे संयमी और तपस्वी भी पथभ्रष्ट हो जाते हैं। इससे तो केवल भगवत्कृपासे ही रक्षा हो सकती है। अत: अपनी सारी योग्यता और शक्तिको प्रभुके चरणोंमें समर्पित कर सर्वथा निष्किंचन और साधनशून्य हो उन्हींकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। आप सर्वथा निश्चेष्ट हो जाइये। वे जो करावें, वही कीजिये और जैसे रखें वैसे ही रहिये। निश्चेष्ट होनेका अर्थ यह नहीं है कि हिलना-डोलना छोड़कर चुपचाप बैठ जायँ। इसका तात्पर्य यही है कि अपना लक्ष्य प्राप्त करनेके लिये अपनी बुद्धि और साधनका बल न रहे, केवल प्रभुकृपाका ही भरोसा हो। इस जीवन-नौकाकी पतवार उस भवसागर-पार लगैया को ही सौंप दी जाय। सच मानिये, फिर आप निर्भय हैं, वह आपको बीचमें कभी डूबने नहीं देगा।
जब सांसारिक प्रलोभनोंका वेग अपनी शक्तिसे अधिक जान पड़े तो घबराइये मत। दृढ़तासे प्रभुके ही चरणोंका आश्रय लीजिये। दीन और आर्त होकर उन्हें पुकारिये, उन्हींसे प्रार्थना कीजिये। द्रौपदी और गजराजकी तरह वे आपकी भी अवश्य रक्षा करेंगे। आप सच्चे मनसे प्रभुको पुकारें और वे आपकी पुकार न सुनें—ऐसा हो नहीं सकता। उनके सर्वत्र कान हैं।
बस, सारे बल छोड़कर केवल भगवत्कृपाका भरोसा रखिये और केवल श्रीभगवान्को ही अपना लक्ष्य बनाइये। जबतक भगवान्के सिवा कोई दूसरा लक्ष्य रहेगा और आत्मसमर्पण या शरणागतिके सिवा दूसरा साधन रहेगा, तबतक शान्तिका मिलना असम्भव है।