भगवत्प्राप्तिके लिये तीव्र विरहतापकी आवश्यकता
प्रिय महोदय, सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। भगवान् श्रीकृष्णके लिये मनमें अत्यन्त तीव्र इच्छा होनी चाहिये। ऐसी आग भड़क उठनी चाहिये जो श्रीकृष्णके अजस्र दर्शनवारिके बिना कभी किसी प्रकार शान्त हो ही नहीं। ऐसी मार्मिक पीड़ा होनी चाहिये जो केवल श्रीकृष्ण-वैद्यकी मिलन-ओषधिसे ही दूर हो। मीराने गाया था—‘मीराकी तब पीर मिटै जब बैद साँवलिया होय।’ हमलोग तो भगवत्प्राप्तिकी वैसी ही इच्छा करते हैं, जैसे कोई बालक किसी दूसरेके मुँहसे किसी खिलौनेकी प्रशंसा सुनकर अपने दस खिलौनोंके साथ उसे भी रखना चाहता है और पिता-मातासे उसे मँगवा देनेके लिये आग्रह करता है। अथवा जैसे कोई शौकीन मनुष्य अपने घरमें सजावटके दूसरे सैकड़ों पदार्थोंके साथ-साथ भगवान्के चित्र भी रखना चाहता है। वस्तुत: ऐसी चाहसे भगवान् नहीं मिलते! उनके लिये तो हृदयमें ऐसा तीव्र ताप होना चाहिये कि जिसके कारण क्षणभरके लिये भी चैन न पड़े। तीव्र विरहवेदनामें किसी दूसरी वस्तुका नाम भी नहीं सुहावे—कहीं किसी भी स्थिति या पदार्थमें मन नहीं टिके। दिन-रात उन्हींका चिन्तन हो, उन्हींका स्मरण हो और पल-पलमें उनके उद्देश्यसे सर्वस्वत्यागके लिये—बड़े-से-बड़े बलिदानके लिये चित्तमें सुखभरी उमंगें उठती रहें। कबीरजी कहते हैं—
सीस उतारे भुइँ धरै तापै राखै पाँउ।
दास कबीरा यों कहै ऐसा होइ तो आउ॥
परन्तु वह भगवान्का विरही तो निरन्तर सिरको हाथमें लिये ही फिरता है—कहता है, ‘जो सिर साटै हरि मिलै तो तेहि लीजे दौरि।’ सिरका मूल्य तो उसे बहुत सस्ता जान पड़ता है।
ऐसी लगन हो जानेपर भगवान्की प्राप्तिमें देर नहीं होती। ऐसी लगन होती कहाँ है। हम कहते हैं कि हमें भगवत्प्राप्तिकी इच्छा है—पर उसके लिये जहाँ त्यागका प्रश्न आता है, वहाँ तुरन्त पीछे हट जाते हैं। हम तो सब कुछको बचाकर, सब कुछको बढ़ाकर उन्हींके साथ भगवान्को भी रखना चाहते हैं। भगवान्की विरहाग्निमें जलता हुआ मनुष्य ‘सब कुछ’ को क्या समझेगा। उसके सारे ‘सब कुछ’ को तो विरहाग्नि सुलगते ही जला डालती है। उसका अपना कुछ रहता ही नहीं। वह सर्वथा अकिंचन होता है और होता है एकमात्र प्रभु-दर्शनका भिखारी। पल-पलमें उसके हृदयमें हूक उठती है और वह उसे सह नहीं सकता। उसमें ऐसी चरम श्रेणीकी परम व्याकुलता निरन्तर जगी रहती है, जो एकमात्र प्रियतम भगवान्के सिवा और किसीके स्मरणकी कल्पना या संस्कारको भी नहीं रहने देती। वह अनन्य-प्रेमिकाकी भाँति प्रतिपल अपने प्राणप्रियके मिलनके लिये अभिसारको प्रस्तुत रहता है। संसारके बड़े-से-बड़े प्रलोभन और बड़े-से-बड़े भय भी उसको उसके लक्ष्यसे—उसके पथसे तनिक भी विचलित नहीं कर सकते। वह संसारके भोगोंको तृणवत् समझकर उनका त्याग कर देता है और उसमें जो विरह-सन्ताप है, उसके सामने कोई भय तो उसके समीप आकर खड़ा ही नहीं हो सकता। उस भयानक सन्तापसे सारे जागतिक भय सदा भयभीत रहते हैं।
आपके मनमें भगवान्को पानेकी लालसा है, यह बड़ी ही शुभ बात है, यही लालसा मानव-जन्मको सार्थक करती है। इस लालसाको इतनी बढ़ाइये कि अन्य सारी लालसाएँ इसमें आकर अपने अस्तित्वको खो दें। भगवान्को प्राप्त करनेकी कामाग्नि इतनी प्रबल होनी चाहिये कि जिसमें अन्य सारी कामनाएँ जल जायँ। एकमात्र भगवत्प्राप्तिकी ही अनन्य और तीव्र कामना रह जाय। श्रीमद्भागवतमें वृत्रासुरके बड़े ही सुन्दर वचन हैं, वे भगवान्से प्रार्थना करते हुए कहते हैं—
न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठॺं
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्क्षे॥
अजातपक्षा इव मातरं खगा:
स्तन्यं यथा वत्सतरा: क्षुधार्ता:।
प्रियं प्रियेवव्युषितं विषण्णम मनोऽ-
रविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥
(६। ११। २५-२६)
‘प्रियतम! मैं तुमको छोड़कर स्वर्ग, ब्रह्माका पद, भूमण्डलका साम्राज्य, रसातलका एकच्छत्र राज्य, योगकी दुर्लभ सिद्धियाँ— यहाँतक कि पुन: जन्म न देनेवाला मोक्ष भी नहीं चाहता। जैसे पक्षियोंके पंखहीन छोटे बच्चे अपनी माँकी आतुरतासे बाट देखते रहते हैं, जैसे भूखे बछड़े अपनी माँ—गैयाका दूध पीनेके लिये व्याकुल रहते हैं और जैसे वियोगिनी पत्नी अपने परदेश गये हुए प्रियतमसे मिलनेके लिये उत्कण्ठित रहती है— वैसे ही हे कमलनयन! मेरा मन तुम्हारे दर्शनके लिये छटपटा रहा है।’
संसारके तुच्छ भोगोंकी तो बात ही क्या, दुर्लभ देवराज्यके भोग और कैवल्य-मोक्षका त्याग भी जो अनायास कर सकता है, वही भगवान्को अति शीघ्र प्राप्त करता है। इसी आदर्शको सामने रखकर भगवत्प्राप्तिके इच्छुक साधकोंको त्यागके लिये तैयार हो जाना चाहिये। और ऐसा सर्वस्व-त्याग कोई बहुत बड़ी बात भी नहीं है, क्योंकि भगवान्की प्राप्तिका महत्त्व इससे अनन्तगुना अधिक है। बड़े महत्त्वकी, अमूल्य वस्तुके लिये साधारण वस्तुओंका त्याग सहज ही हो जाता है। और भगवान्के सामने सभी कुछ साधारण है, नगण्य है। असलमें भगवान्के समान अमूल्य वस्तु किसी भी मूल्यपर नहीं मिल सकती। उसकी प्राप्ति तो केवल उनकी कृपासे ही होती है। पर जो उनका महत्त्व नहीं समझता, वह सबपर भगवान्की अनन्त कृपा होनेपर भी उस कृपासे वंचित ही रहता है, इसीलिये वह न तो सांसारिक वस्तुओंका त्याग कर सकता है और न उसके अन्दर भगवत्प्राप्तिकी अनन्य और तीव्र इच्छा ही जाग्रत् होती है। अतएव भगवान्का महत्त्व समझना आवश्यक है। महत्त्व समझमें आ जानेपर त्याग सहज ही हो जायगा। महत्त्व जाननेके लिये सत्संग और भजनकी आवश्यकता है—
बिनु सतसंग न हरि कथा
तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद
होइ न दृढ़ अनुराग॥
यथार्थ भजनके बिना प्रेम सम्भव नहीं और प्रेमके बिना भगवान्का यथार्थ महत्त्व समझमें नहीं आता। इसलिये सत्संग-भजनहीन मनुष्यका जीवन व्यर्थ तो होता ही है—पशु-जीवनसे भी गया-गुजरा होता है। और ऐसा मनुष्य जीवनभर नारकी यन्त्रणा भोगता हुआ शरीर-त्यागके बाद भी पुन: प्रत्यक्ष नरकोंमें जाकर वहाँकी असह्य यन्त्रणाको भोगता है। बुद्धिमान् मनुष्य वही है जो इस बातको समझ ले और जीवनको सत्संग-भजनमें लगाकर उत्तरोत्तर प्रबल लालसाके साथ भगवान्की ओर बढ़ता रहे। विशेष भगवत्कृपा।