भगवत्पूजाके भावसे धन कमाइये
सप्रेम हरिस्मरण। जगत्में सब स्वार्थका ही सम्बन्ध है। वस्तुत: कोई किसीका नहीं है। आपने माता-पिताकी सेवाके लिये धन कमानेकी आवश्यकता बतलायी, सो ठीक है। धन कमाना बुरी बात थोड़े ही है। अच्छी नीयतसे और न्यायपूर्वक धन जरूर कमाना चाहिये। परन्तु भाई साहब! यह वास्तवमें हाथकी बात नहीं है। प्रारब्धके अनुसार जैसा होना होगा, होगा। न्याययुक्त चेष्टा कीजिये। भगवान्की आज्ञा मानकर भगवान्की पूजाकी बुद्धिसे धन कमानेका प्रयत्न कीजिये। भगवान्ने रच रखा होगा तो धन मिल जायगा। न रचा होगा तो नहीं मिलेगा। भगवान्के विधानपर सन्तोष करना चाहिये।
भगवत्प्रेमकी बात मैं क्या लिखूँ। मैं तो प्रेमसे बहुत दूर हूँ, हाँ, सुना है—भगवत्प्रेम बहुत ऊँची वस्तु है। मोक्षतककी इच्छाका त्याग करनेसे उस प्रेमकी प्राप्ति होती है। मैं तो एक श्रीभगवन्नामको जानता हूँ। उसका पूरा महत्त्व तो नहीं जानता—परन्तु विश्वास है कि भगवन्नामसे सब कुछ हो सकता है और आपको भी उसीका आश्रय लेनेकी नम्र सलाह देता हूँ।
आप माता-पिताकी सेवाके उद्देश्यसे, इसी कर्मके द्वारा भगवत्पूजनके भावसे भगवन्नामका जप करते हुए धन कमानेका न्याय और सत्ययुक्त प्रयत्न करें। और भगवान् फलरूपमें जो कुछ भी दें, उसीको सिर चढ़ायें।