भजनसे जीवनकी सफलता
प्रिय महोदय! सादर हरिस्मरण। श्रीमद्भागवतमें आया है—
य: प्राप्य मानुषं देहं मोक्षद्वारमपावृतम्।
गृहेषु खगवत् सक्तस्तमारूढच्युतं विदु:॥
‘जो मनुष्य मोक्षके खुले दरवाजेके समान मनुष्य-देहको पाकर भी अबोध पक्षियोंकी भाँति (स्त्री-पुत्र-परिवारादि) घरमें आसक्त हो रहे हैं, उन्हें बहुत ऊपर चढ़कर भी गिरा हुआ ही मानना चाहिये।’
गोस्वामीजीने कहा है—
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।
पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥
सो परत्र दुख पावइ
सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि ईस्वरहि
मिथ्या दोष लगाइ॥
अतएव हमलोगोंको मन लगाकर दृढ़ताके और त्वराके साथ भगवत्प्राप्तिके पथपर अग्रसर होना चाहिये। मनुष्यजीवनका परम और चरम पुरुषार्थ भगवत्प्राप्ति ही है। जीवनकी अमूल्य घड़ियाँ बीती जा रही हैं। जबतक शरीर स्वस्थ है तभीतक कुछ कर लीजिये। जब शरीर अस्वस्थ हो जायगा, इन्द्रियाँ शिथिल पड़ जायँगी, मन व्याधियोंके कारण विचलित हो जायगा, उस समय भजन सहजमें नहीं हो सकेगा। अभी चेतिये और अपने जीवनका अधिक-से-अधिक समय और मन भगवान्के मंगलमय भजनमें ही लगाइये। तभी मानव-शरीरकी सार्थकता है—
सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा।
जो तनु पाइ भजइ रघुबीरा॥
वही शरीर पवित्र और वही सुन्दर है जिससे श्रीभगवान् राघवेन्द्रका भजन होता है।
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता।
सोइ महिमंडित पंडित दाता॥
धर्मपरायन सोइ कुलत्राता।
राम चरन जाकर मन राता॥
नीति निपुन सोइ परम सयाना।
श्रुति सिद्धांत नीक तेहि जाना॥
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा।
जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥
सारे गुणोंकी, धर्मकी, कुलकी, विद्याकी, ज्ञानकी, नीतिकी, बुद्धिमत्ताकी, पाण्डित्यकी, चतुराईकी, विज्ञानकी और मानवताकी सफलता बस एकमात्र भजनमें ही है।
बारि मथें बरु होइ घृत
सिकता तें बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ
यह सिद्धांत अपेल॥