भारतीय नारीका स्वरूप और उसका दायित्व
प्रिय बहिन! सस्नेह हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपके प्रश्नोंका उत्तर लिखनेकी चेष्टा करता हूँ। यदि आपके पत्रकी सारी बातोंका आज उत्तर नहीं दिया जा सका तो कृपया क्षमा करना चाहिये। हो सका तो फिर कभी चेष्टा करूँगा।
यह सत्य है कि इस युगमें सब ओर स्वतन्त्रताकी आकांक्षा जाग्रत् हो गयी है और सभी परतन्त्रताकी बेड़ीसे छूटकर स्वाधीन होना चाहते हैं। फिर ‘चिरकालसे परतन्त्रताकी बेड़ीमें बँधी हुई नारी अपनेको स्वतन्त्र क्यों न कर ले?’ यह प्रश्न भी उचित ही है। स्वतन्त्रता निश्चय ही परम श्रेष्ठ धर्म है, और नर तथा नारी दोनोंको ही स्वतन्त्र होना भी चाहिये। बल्कि यह भी परम सत्य है कि—दोनों जबतक स्वतन्त्र नहीं होंगे, तबतक यथार्थ प्रेम होगा ही नहीं। पर विचारणीय प्रश्न तो यह है कि दोनोंके स्वतन्त्रताके क्षेत्र तथा मार्ग एक ही हैं या दो हैं? बरजोरीसे चाहे कोई इस बातको न माने; परन्तु यह है सत्य कि नर और नारीका शारीरिक और मानसिक संघटन नैसर्गिक दृष्टिसे कदापि एक-सा नहीं है। और यदि यह सत्य है तो दोनोंकी स्वतन्त्रताके क्षेत्र तथा मार्ग भी निश्चय ही दो हैं। दोनों अपने-अपने क्षेत्रमें अपने-अपने मार्गसे चलकर ही स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं। यही स्वधर्म है। जबतक स्वधर्मको नहीं समझा जायगा, तबतक कल्याणकी आशा नहीं है। स्त्री घरकी रानी है, सम्राज्ञी है, घरमें उसका एकच्छत्र राज्य है, पर वह घरकी रानी है स्नेहमयी माता और आदर्श गृहिणीके रूपमें ही। यही उसका नैसर्गिक स्वातन्त्र्य है। इसीसे कहा गया है कि ‘दस शिक्षकोंसे श्रेष्ठ आचार्य हैं, सौ आचार्योंसे श्रेष्ठ पिता हैं और हजार पिताओंकी अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ, वन्दनीय और आदरणीय माता हैं।’ नारीका यह सनातन मातृत्व ही उसका स्वरूप है। वह मानवताकी नित्य माता है। भगवान् राम-कृष्ण, भीष्म-युधिष्ठिर, कर्ण-अर्जुन, बुद्ध-महावीर, शंकर-रामानुज, गाँधी-मालवीय आदि जगत्के सभी बड़े-बड़े पुरुषोंको नारीने ही सृजन किया और बनाया है। उसका जीवन क्षणिक वैषयिक आनन्दके लिये नहीं, वह तो जगत्को प्रतिक्षण आनन्द प्रदान करनेवाली स्नेहमयी जननी है। उसमें प्रधानता है प्राणोंकी—हृदयकी और पुरुषमें प्रधानता है शरीरकी। इसलिये पुरुषकी स्वतन्त्रताका क्षेत्र है शरीर, और नारीकी स्वतन्त्रताका क्षेत्र है प्राण—हृदय। नारी शरीरसे चाहे दुर्बल हो, परन्तु हृदयसे वह पुरुषकी अपेक्षा सदा ही अत्यन्त सबल है। इसलिये पुरुष उतने त्यागकी कल्पना नहीं कर सकता, जितना त्याग नारी सहज ही कर सकती है। अतएव पुरुष और स्त्री सभी क्षेत्रोंमें समान भावसे स्वतन्त्र नहीं हैं।
कोई चाहे जोशमें यह न स्वीकार करे, परन्तु होशमें आनेपर तो यह मानना ही पड़ेगा कि नारी देहके क्षेत्रमें कभी पूर्णतया स्वाधीन नहीं हो सकती। प्रकृतिने उसके मन, प्राण और अवयवोंकी रचना ही ऐसी की है। वह स्वस्थ मानवशिशुको जन्म देकर, अपने हृदयके अमीरससे उसे पाल-पोसकर पूर्ण मानव बनाती है। इस नैसर्गिक दायित्वकी पूर्तिके लिये ही उसकी शारीरिक और मानसिक शक्तियोंका स्वाभाविक सद्व्यय होता रहता है। जगत्के अन्यान्य क्षेत्रोंमें जो नारीका स्थान संकुचित या सीमित दीख पड़ता है, उसका कारण यही है कि नारी बहुक्षेत्रव्यापी पुरुषका निर्माण करनेके लिये अपने एक विशिष्ट क्षेत्रमें रहकर ही प्रकारान्तरसे सारे जगत्की सेवा करती रहती है (नारी यदि अपनी इस विशिष्टताको भूल जाय तो जगत्का विनाश बहुत शीघ्र होने लगे। आज यही हो रहा है)।
स्त्रीको बाल, युवा और वृद्धावस्थामें जो स्वतन्त्र न रहनेके लिये कहा गया है, वह इसी दृष्टिसे कि उसके शरीरका नैसर्गिक संघटन ही ऐसा है कि उसे सदा एक सावधान पहरेदारकी जरूरत है। यह उसका पदगौरव है न कि पारतन्त्र्य। जिन पाश्चात्य देशोंमें नारी-स्वातन्त्र्यका अत्यधिक विस्तार है, वहाँ भी स्त्रियाँ पुरुषोंकी भाँति निर्भीकरूपसे विचरण नहीं कर पातीं। नारीमें मातृत्व है, उसे गर्भ धारण करना ही पड़ता है। प्रकृतिने पुरुषको इस दायित्वसे मुक्त रखा है और स्त्रीपर इसका भार दिया है—अतएव उसकी शारीरिक स्वाधीनता सर्वत्र सुरक्षित नहीं है। परन्तु इस दैहिक परतन्त्रतामें भी वह हृदयसे स्वाधीन है; क्योंकि तपस्या, त्याग, धैर्य, सहिष्णुता, सेवा आदि सद्गुण सत्-स्त्रीकी सेवामें सदा लगे ही रहते हैं। पुरुषमें इन गुणोंको लाना पड़ता है, सो भी पूरे नहीं आते। स्त्रीमें स्वभावसे ही इन गुणोंका विकास रहता है। इसीसे नारी देहसे परतन्त्र होते हुए भी हृदयसे स्वतन्त्र है।
स्त्री अपने इस प्राकृतिक उत्तरदायित्वसे बच नहीं सकती। जो बचना चाहती हैं, उनमें विकृतरूपसे इसका उदय होता है। विकृतरूपसे होनेवाले कार्यका परिणाम बड़ा भयानक होता है।
यूरोपमें नारी-स्वातन्त्र्य है, पर वहाँकी स्त्रियाँ क्या इस प्राकृतिक दायित्वसे बचती हैं? क्या वासनाओंपर उनका काबू है? वे चाहें विवाह न करें या सामाजिक विघटन होनेके कारण चाहे उनके विवाह योग्य उम्रमें न होने पावें; परन्तु पुरुष-संसर्ग तो हुए बिना रहता नहीं। अभी हालमें इंगलैण्डकी पार्लियामेण्टकी साधारण सभामें एक प्रश्नके उत्तरमें मजदूर सदस्य श्रीयुत लेजने बतलाया कि ‘इंगलैण्डमें २० वर्षकी आयुवाली कुमारियोंमेंसे ४० प्रतिशत विवाहके पहले ही गर्भवती पायी जाती हैं। और विवाहित स्त्रियोंकी प्रथम सन्तानमें चारमें एक अर्थात् २५ प्रतिशत नाजायज (व्यभिचारजन्य) होती है।’ आपने यह भी कहा है कि ‘देशका ऐसा नैतिक पतन कभी देखनेमें नहीं आया।’ कहते हैं कि अमेरिकाकी स्थिति इससे भी कहीं भयानक है। क्या ऐसा स्त्री-स्वातन्त्र्य भारतीय स्त्री कभी सहन कर सकती है?
आपने लिखा कि ‘‘पाश्चात्य देशोंमें स्त्रियोंकी स्वतन्त्रताके तथा शिक्षाके कारण बड़ी उन्नति हुई है।’ मेरी धारणामें यह कथन भ्रमपूर्ण है। उन्नतिका एक उदाहरण तो ऊपर बतलाया जा चुका है। इसके सिवा यदि ध्यान देकर देखा जाय तो पता लगेगा कि वहाँका पारिवारिक जीवन प्राय: नष्ट हो गया है। सम्मिलित कुटुम्ब—जो दया, प्रेम, स्नेह, परोपकार, जीव-सेवा, संयम और शुद्ध अर्थ-वितरणकी एक महान् संस्था है, जिसमें दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, भाई-भौजाई, देवर-जेठ, सास-पतोहू, मामा-मामी, बुआ-बहिन, मौसी-मौसे, भानजे-भानजी, भतीजे-भतीजी आदिका एक महान् सुशृंखल कुटुम्ब है और जिसके भरण-पोषण तथा पालनमें गृहस्थ अपनेको धन्य और कृतार्थ समझता है—का तो वहाँ नामोनिशान भी नहीं मिलेगा। स्वतन्त्रता तथा समानाधिकारके युद्धने वहाँके सुन्दर घरको मिटा दिया है। इसीसे वहाँ जरा-जरा-सी बातमें कलह, अशान्ति, विवाह-विच्छेद या आत्महत्या हो जाती है। वहाँ स्त्री अब घरकी रानी नहीं है, घरमें उसका शासन नहीं चलता, गृहस्थ-जीवनका परम शोभनीय आदर्श उसकी कल्पनासे बाहरकी वस्तु हो गया है। घरको सुशोभित करनेवाली श्रेष्ठ गृहिणी पतिके प्रत्येक कार्यमें हृदयसे सहयोग देनेवाली सहधर्मिणी और बच्चोंको हृदयका अमीरस पिलाकर पालनेवाली माताका आदर्श वहाँ नष्ट हुआ जा रहा है। ‘व्यक्तिगत स्वातन्त्र्य’ और ‘स्वतन्त्र प्रेम’ के मोहमें वहाँकी नारी आज इतनी अधिक पराधीन हो गयी है कि उसे दर-दर भटककर विभिन्न पुरुषोंकी ठोकरें खानी पड़ती हैं! जगह-जगह प्रेम बेचना पड़ता है। नौकरीके लिये नये-नये मालिकोंके दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं और no vacancy की सूचना पढ़कर निराश लौटना पड़ता है। यह कैसी स्वतन्त्रता है और कैसा सुख है?
आप कहती हैं कि ‘वहाँकी शिक्षिता स्त्रियोंमें बहुमुखी विकास हुआ है।’ यह सत्य है कि वहाँ अक्षर-ज्ञानका पर्याप्त विस्तार है। परन्तु अक्षर-ज्ञानसे ही कोई सुशिक्षित और विकसित हो जाय, ऐसा नहीं माना जा सकता। वास्तवमें शिक्षा वह है जो मनुष्यमें उसके स्वधर्मानुकूल कर्तव्यको जाग्रत् करके उसे उस कर्तव्यका पूरा पालन करनेयोग्य बना दे। यूरोपकी स्त्री-शिक्षाने यह काम नहीं किया। स्त्रियोंका उनके नैसर्गिक धर्मके अनुकूल शिक्षा मिलती तो बहुत बड़ा लाभ होता। प्रकृतिके विरुद्ध शिक्षासे इसी प्रकार बड़ी हानि हुई है। इस युगमें स्त्रियोंको जो शिक्षा दी जाती है, क्या उससे सचमुच उनका स्वधर्मोचित विकास हुआ है? क्या इस शिक्षासे स्त्रियाँ अपने कार्यक्षेत्रमें कुशल बन सकी हैं? क्या अपने क्षेत्रमें, जो उनकी नैसर्गिक स्वतन्त्रता थी, उसकी पूरी रक्षा हुई है? उसका अपहरण तो नहीं हो गया है? सच पूछिये तो सैकड़ों वर्षोंसे चली आती हुई यूरोपकी शिक्षाने वहाँ कितनी महान् प्रतिभाशालिनी स्वधर्मपरायणा जगत्की नैसर्गिक रक्षा करनेवाली महिलाओंको उत्पन्न किया है? बल्कि यह प्रत्यक्ष है कि इस शिक्षासे वहाँ नारियोंमेंसे गृहिणीत्व तथा मातृत्वका ह्रास हुआ है। अमेरिकामें ७७ प्रतिशत स्त्रियाँ घरके कामोंमें असफल साबित हुई हैं। ६० प्रतिशत स्त्रियोंने विवाहोचित उम्र बीत जानेके कारण विवाहकी योग्यता खो दी है। विवाहकी उम्र वहाँ साधारणत: १६ से २० वर्षतककी ही मानी जाती है। इसके बाद ज्यों-ज्यों उम्र बड़ी होती है त्यों-ही-त्यों विवाहकी योग्यता घटती जाती है। इसका परिणाम यह है कि वहाँ स्वेच्छाचार, अनाचार, व्यभिचार और अत्याचार बढ़ गया है। अविवाहित माताओंकी संख्या क्रमश: बढ़ी जा रही है। घरका सुख किसीको नहीं। बीमारी तथा बुढ़ापेमें कौन किसकी सेवा करे? वहाँकी शिक्षित स्त्रियोंमें लगभग ५० प्रतिशतको कुँआरी रहना पड़ता है और बिना ब्याहे ही उन्हें वैधव्यका-सा दु:ख भोगना पड़ता है। यही क्या बहुमुखी विकास है?
इसके सिवा वर्तमान शिक्षाका एक बड़ा दोष यह है कि स्त्रियोंमें ‘नारीत्व’ और ‘मातृत्व’ का नाश होकर उनमें ‘पुरुषत्व’ बढ़ रहा है और उधर पुरुषोंमें ‘स्त्रीत्व’ की वृद्धि हो रही है। नारी नियमित व्यायाम करके और भाँति-भाँतिके अन्यान्य साधनोंके द्वारा ‘मर्दाना’ बनती जा रही है, तो पुरुष अंग-लालित्य, भावभंगिमा, केशविन्यास और स्वरमाधुर्य आदिके द्वारा ‘जनाना’ बने जा रहे हैं। स्त्रियोंमें मर्दानगी आनी चाहिये। उन्हें ‘रणचण्डी’ और ‘दशप्रहरणधारिणी’ दुर्गा बननी चाहिये; परन्तु बननी चाहिये पति-पुत्रका अहित करनेकी इच्छा रखनेवाले आततायीको दण्ड देनेके लिये। यह तभी होगा जब उनमें ‘पत्नीत्व’ और ‘मातृत्व’ अक्षुण्ण स्थिर रहेगा। भारतवर्षने तो नारीका रणरंगिणी मुण्डमालिनी कराली कालीके रूपमें और सिंहवाहिनी महिषमर्दिनी दुर्गाके रूपमें पूजन किया है। परन्तु वहाँ भी वह है ‘माँ’ ही। स्नेहमयी माता, प्रेममयी पत्नी यदि वीरांगना बनकर, रणसज्जासे सुसज्जित होकर मैदानमें आवेगी तो वह आततायियोंके हाथसे अपनी तथा अपने पति-पुत्रकी रक्षा करके समाज और देशका अपरिमित मंगल और मुख उज्ज्वल करेगी। परन्तु इस हृदय-धनको खोकर प्राणकी इस परम सम्पत्तिको गँवाकर केवल देहके क्षेत्रमें स्वतन्त्र होनेके लिये यदि नारी तलवार हाथमें लेगी तो निश्चय समझिये उस तलवारसे प्यारी सन्तानके ही सिर धड़से अलग होंगे, प्राणप्रियतम पतियोंके ही हृदय बेधे जायँगे और सबके मुखोंपर कालिमा लगेगी। स्त्रियोंको रणरंगिणी बननेसे पहले इस बातको अच्छी तरह सोच रखना चाहिये। अत्याचार, अनाचारीका दमन करनेके लिये हमारी माँ-बहिनें रणचण्डी बनें, परन्तु हमारी रक्षा और हमारे पालनके लिये उनके वक्ष:स्थलसे सदा अमीरस बहता रहे। वहाँ तलवार हाथमें रहे ही नहीं।
अतएव इस भ्रमको छोड़ देना चाहिये कि वर्तमान यूरोप-अमेरिकामें स्त्रियाँ स्वतन्त्र होनेसे सुखी हैं और उन्हें वर्तमान शिक्षासे लाभ हुआ है। फिर यदि मान भी लें कि किसी अंशमें हुआ भी हो तो वहाँका वातावरण, वहाँकी परिस्थिति, वहाँके रस्मोरिवाज, वहाँकी संस्कृति और वहाँका लक्ष्य दूसरा है और हमारा बिलकुल दूसरा। वहाँ केवल भौतिक उन्नतिही जीवनका लक्ष्य है, हमारा लक्ष्य है परमात्माकी प्राप्ति।
परमात्माकी प्राप्तिमें सर्वोत्तम साधन है विलास-वासनाका त्याग और इन्द्रिय-संयम। इसका खयाल रखकर ही हमें अपनी शिक्षापद्धति बनानी होगी। तभी हमारी नारियाँ आदर्श माता और आदर्श गृहिणी बनकर जगत्का मंगल कर सकेंगी।
कहा जा सकता है कि फिर क्या स्त्रियाँ देशका, समाजका कोई काम करें ही नहीं? ऐसी बात नहीं है, करें क्यों नहीं। करें, पर करें अपने स्वधर्मको बचाकर। अपने स्वधर्मकी जितनी भी शिक्षा अशिक्षित बहिनोंको दी जा सके, उतनी अपने आदर्श आचरणों और उपदेशोंके द्वारा वे अवश्य दें। सच्ची बात तो यह है कि यदि पति, पुत्र, पुत्रियाँ सब ठीक रहें, अपने-अपने कर्तव्य-पालनमें ईमानदारीसे संलग्न रहें तो फिर समाजमें—देशमें ऐसी बुराई ही कौन-सी रह जाय, जिसे सुधारनेके लिये माताओंको घरसे बाहर निकलकर कुछ करना पड़े? और पुरुषोंको सत्पुरुष बनानेका यह काम है—माताओंका। माताएँ यदि अपने स्वधर्ममें तत्पर रहें तो पुरुषोंमें उच्छृंखलता आवे ही नहीं। अतएव मेरी तो भारतकी आदरणीया देवियोंसे हाथ जोड़कर विनम्र प्रार्थना है कि वे अपने स्वरूपको सँभालें, अपने दायित्वकी ओर ध्यान दें और पुरुषोंको वास्तविक स्वधर्मपरायण पुरुष बनावें। पुरुषोंकी प्रतिभाका वैसा ही निर्माण होगा, जैसा सर्वशक्तिमयी माताएँ करना चाहेंगी। आज जो पुरुष बिगड़े हैं, इसका उत्तरदायित्व माताओंपर ही है। वे ही उन्हें बना सकती हैं। यदि माताएँ पुरुषोंकी परवा न करके—अपने पति-पुत्रोंकी कल्याण-कामना न करके अपनी स्वतन्त्र व्यक्तिगत कल्याण-कामना करने लगेंगी तो पुरुषोंका पतन अवश्यम्भावी है। और जब पति-पुत्र बिगड़ गये तो फिर गृहिणी और माता भी किसके बलपर अपने सुन्दर स्वरूपकी रक्षा कर सकेंगी? पुरुषोंको बचाकर अपनेको बचाना—पुरुषोंको पुरुष बनाकर अपने ‘नारीत्व’ का अभ्युदय करना—इसीमें सच्चा कल्याणकारी नारी-उद्धार है। पुरुषोंको बेलगाम छोड़कर, नारीका उसकी प्रतिद्वन्द्वी होकर अपनी स्वतन्त्र उन्नति करने जाना तो पुरुषको निरंकुश, अत्याचारी, स्वेच्छाचारी बनाकर उसकी गुलामीको ही निमन्त्रण देना है। और फलत: समाजमें दु:खका ऐसा भयानक दावानल धधकाना है, जिसमें पुरुष और स्त्री दोनोंके ही सुख जलकर खाक हो जायँगे! शेष भगवत्कृपा।