भोजनमें सावधानी
सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। किसी भी प्राणीके साथ घृणा कभी नहीं करनी चाहिये और न आत्मदृष्टिसे उसे किसी प्रकार भी अपनेसे नीचा समझना चाहिये। बल्कि सबमें एक ही भगवान् सदा समान रूपसे विराजित हैं, यह समझकर मन-ही-मन प्राणिमात्रको प्रणाम करना चाहिये तथा यथासाध्य सबकी यथायोग्य सेवामें तत्पर रहना चाहिये। श्रीमद्भागवतमें कहा है—
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित्समुद्रांश्च हरे: शरीरं
यत्किंच भूतं प्रणमेदनन्य:॥
(११। २। ४१)
‘आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, प्राणी, दिशाएँ, वृक्ष-लताएँ, नदी, समुद्र—सभी श्रीभगवान्के शरीर हैं। सभीमें भगवान्का निवास है, ऐसा समझकर जो कोई प्राणी मिले, उसे अनन्य भगवद्भावसे प्रणाम करें।’
यह होनेपर भी, शास्त्रमतके अनुसार, खान-पानके मामलेमें विशेष सावधानी रखना आवश्यक है। अन्नके अनुसार ही मन बनता है। अन्न सात्त्विक है या तामसिक, कैसी कमाईका अन्न है, भोजन बनानेवाला कौन है और भोजन बनाते समय उसकी चित्त-वृत्ति कैसी थी। स्थान कैसा है, पंक्तिमें साथ कौन-कौन बैठे हैं तथा भोजन परसनेवाले किस भावके कौन हैं? आदि सभी बातें विचारणीय हैं। यह प्रश्न हँसीमें उड़ा देनेका नहीं है। आजकल जैसे खानसामा साहबके लाये हुए किसी भी पदार्थको खाने या पीनेयोग्य समझकर खा-पी लिया जाता है। न जूठनका परहेज है और न किसी और बातका। यह असलमें बहुत बड़ा प्रमाद है। अन्न जैसे पैसोंका होगा, बनानेवाले जैसे होंगे, स्थान और भोजनसामग्री जैसी होगी, वैसा ही मनपर प्रभाव पड़ेगा। वस्तु-शक्तिका प्रभाव तो होता ही है बल्कि यहाँतक होता है कि भोजन करानेवालेकी मनोभावना या इच्छाशक्तिका भी भोजन करनेवालोंपर प्रभाव पड़ता है।
एक महात्मा कुछ साधुओंके साथ गंगातटपर विचर रहे थे। उन सबने एक दिन किसी गाँवमें एक गृहस्थके यहाँ भिक्षा की। रातको सबको स्वप्नदोष हो गया। सबेरे महात्माजीने जब अपने स्वप्नदोषकी बात कही, तब सभी साधुओंने कहा कि हमको भी हुआ है। महात्माजी बड़े असमंजसमें पड़े। कोई कारण नहीं दिखायी दिया। तब वे उस गृहस्थके यहाँ गये और उससे पूछा कि ‘कल तुमने हमलोगोंको भोजन कराया था, उस समय तुम्हारे मनमें क्या भाव था, सच-सच बताओ।’ उसने कहा—‘महाराज! और तो कुछ नहीं, मेरे मनमें यह कामना थी कि मेरे सन्तान हो जाय।’ महात्माजी समझ गये कि स्वप्नदोष होना इसकी विचारशक्तिका ही परिणाम है, जिससे अन्न प्रभावित हुआ और उसका असर हमलोगोंपर पड़ा।
इसी प्रकारकी एक घटना दूसरी है—किसी एक गृहस्थके यहाँ दस-बारह अतिथि आये थे। घरमें रसोई बनानेवाली गृहस्थकी एक विधवा पुत्रवधू थी। घरकी और स्त्रियाँ कहीं गयी हुई थीं। पुत्रवधू बेचारी बीमार थी तथा रात-दिन सतायी जाती थी। और उसे घरका सारा काम—शरीर ठीक न रहनेपर भी करना पड़ता था। घरके आदमी तो थे ही। आज दस-बारह अतिथियोंके लिये रसोई अधिक बनानी थी। उसका पेट दु:ख रहा था और वह रोती हुई रसोई बना रही थी। अतिथियोंने भोजन किया और एक ही घण्टे बाद सबके पेटमें ऐसा दर्द हुआ कि सबको रोना पड़ा। घरमें पता लगा कि बहूके पेटमें पहलेसे ही बड़ा दर्द था। अब तो वह पड़ी कराह रही है। क्योंकि रसोई बनानेमें उसे लगातार घण्टों पेटकी पीड़ा सहते बैठे रहना पड़ा; कोई उपचार हुआ नहीं, इससे उसका दर्द और भी बढ़ गया।
दुर्योधनका अन्न खानेसे भीष्मपितामह-सरीखे महापुरुष धर्मका निर्णय करनेमें असमर्थ हो गये थे। इसीलिये अन्न-ग्रहणमें अन्नदाता, रसोइया, स्थान, अन्न, स्पर्श आदि बहुत-सी बातोंका ध्यान रखना पड़ता है। श्रीचैतन्यमहाप्रभु-सरीखे विश्वप्रेमी पुरुष भी इसीलिये ब्राह्मण वैष्णवके हाथका बना हुआ शुद्ध सात्त्विक भोजन—जो तुलसीजी चढ़ाकर पहले भगवान्के भोग लग चुका होता था—किया करते थे। उन्होंने कहा है—
प्रतिग्रह ना करिबे कभू राजधन।
विषयीर अन्न खाइले दुष्ट हय मन॥
मन दुष्ट होले महे कृष्णेर स्मरण।
कृष्ण-स्मृति बिनु हय निष्फल जीवन॥
(श्रीचैतन्यचरितामृत)
‘राजधनका कभी प्रतिग्रह न करना। बिषयी मनुष्यका अन्न खानेसे मन दुष्ट हो जाता है, मनके दुष्ट होनेसे श्रीकृष्णका स्मरण नहीं होता और श्रीकृष्णकी स्मृतिसे रहित जीवन निष्फल हो जाता है।’
आज जो इतनी धर्मग्लानि और पढ़े-लिखे लोगोंमें अनाचार-प्रवृत्ति देखी जाती है, इसमें अन्नदोष प्रधान कारण है। वे प्राय: हर किसीकी जूँठन हर किसीके हाथसे खाते हैं और इसीमें गौरव-बोध करते हैं। फल प्रत्यक्ष है। पर समझाये कौन! बुद्धिका निर्णय ही तो उलटा हो रहा है।