चार बहिनोंके पत्रोंके उत्तर

(१)

सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके जीवनकी स्थितिसे परिचय प्राप्त हुआ। मेरी समझसे इसमें आपका कोई अपराध नहीं है। जिस दुष्टने आपके साथ निकटका आत्मीय होते हुए भी ऐसा दुर्व्यवहार किया, वही सर्वथा दोषका पात्र है। आप इस समय अपने स्वामीके साथ सुखी हैं और आपके स्वामी बड़े ही सदाचार-परायण, पवित्रात्मा हैं—यह बहुत ही आनन्दकी बात है। आप उनकी सेवा करती हैं और उनका आपपर आदर्श सद्भाव है, यह भगवान‍्की कृपा है। आपको जो पश्चात्ताप है और पतिदेवसे पूर्वकी घटना न बतानेके कारण जो आत्म-ग्लानि है, सो ठीक ही है। सदाचारिणी सत्-स्त्रियोंमें ऐसा होना स्वाभाविक ही है। मेरी सम्मतिमें आपको इसके लिये अब दु:ख नहीं करना चाहिये, और आत्महत्याकी बात तो सोचनी ही नहीं चाहिये। आत्महत्या स्वयं एक बहुत बड़ा पाप है और वह जीवकी भयानक दुर्गतिका कारण होता है। बच्चोंकी देख-रेखकी बात भी है ही। किसी भी दृष्टिसे आत्महत्याका समर्थन नहीं किया जा सकता। फिर आप तो अपराधिनी हैं भी नहीं। लड़कपनमें दुष्ट प्रकृतिके पुरुषने जो अनुचित लाभ उठाया, इसमें यदि किसी अंशमें आपका अपराध माना भी जाय तो वह अबतककी पश्चात्तापकी आगमें जल गया है! आप श्रीरामायणजीका पाठ करती हैं, यह सब प्रकारके पापोंका नाश करनेवाला और परम मंगलकारी है। मेरी समझसे पतिदेवके सामने अब उक्त घटनाको प्रकट करनेमें कोई लाभ नहीं है। घटना तो बदल नहीं सकती; आपका अपराध है नहीं, फिर व्यर्थ ही उन्हें कष्ट पहुँचानेमें क्या लाभ है? आप ऐसा करके उन्हें धोखा नहीं दे रही हैं; पर आप इसे जो धोखा मान रही हैं, यह आपका शील है और आदर्श गुण है। धोखा तो तब होता जब आप इस समय जान-बूझकर कोई अपराध करतीं और उसे अपने स्वामीसे छिपातीं। इसलिये आप किसी प्रकार भी विषाद मत कीजिये और श्रीभगवान‍्को याद कीजिये। वे अशरण-शरण हैं और सच्चे हृदयसे शरण होनेपर महान्-से-महान् पापीको भी तुरन्त आश्रय दे देते हैं। आप तो निर्दोष हैं। भगवान् आपको अवश्य शान्ति देंगे।

(२)

सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने एक कुलीन कुमारीकी बात लिखी, उसे पढ़कर प्रसन्नता हुई। सचमुच उनका भगवद्विश्वास और निष्ठा सराहनीय है। उन्हें यह विश्वास रखना चाहिये कि भगवान् जिसको एक बार अपना लेते हैं, फिर कभी उसे छोड़ते नहीं, भले ही किसी कारणवश बीचमें उसे सम्बन्ध-विच्छेद हुआ-सा जान पड़े। उन्हें चाहिये कि वे आर्तभावसे अपने भगवान‍्को पुकारती रहें और प्रार्थना करती रहें। रही विवाहकी बात, सो यदि स्वास्थ्य अच्छा न हो तब तो दूसरी बात है; नहीं तो, पिता-माताके आज्ञानुसार विवाह करा लेनेमें लाभ मालूम होता है। न तो प्राण देनेकी आवश्यकता है और न घरसे भागनेकी ही। आजकलका समय बहुत बुरा है। चारों ओर पापका विस्तार हो रहा है। ऐसी अवस्थामें अविवाहिता रहना उचित नहीं है। भगवान‍्का मंगल विधान मानकर भगवान‍्की सेवाके भावसे ही विवाह-बन्धनमें बँध जाना उचित और लाभदायक प्रतीत होता है। विवाह हो जानेपर पतिदेवको ही भगवान‍्की जीवित प्रतिमा मानकर भगवद्भावसे ही उनकी सेवा करनी चाहिये। यों करनेपर भगवान् अवश्य सहायता देंगे और सारी अड़चनोंको दूर करके अपने और भी समीप बुला लेंगे। चिन्ता नहीं करनी चाहिये। संसार भगवान‍्का लीला-क्षेत्र है, यह मानकर भगवान‍्की लीलामें सहर्ष यथायोग्य भाग लेना चाहिये। मन भगवान‍्में रहे और भगवान‍्की सेवाके लिये ही जगत‍्के सारे कार्य हों।

(३)

सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। मेरी समझसे भगवान‍्ने आपका जिनके साथ विवाहका विधान किया है, वही सर्वथा उपयुक्त और ठीक है। आपके पति सदाचारी और भगवत्-सेवामें दृढ़ प्रीति रखनेवाले हैं ही, फिर आपको उन्हींकी सेवामें चित्त लगाना चाहिये। आत्महत्या करनेकी बात तो सोचनी भी नहीं चाहिये। किसी प्रकार शरीरका अन्त कर देनेसे ही जीव कर्म-बन्धनसे नहीं छूट जाता। बल्कि जैसे जेलसे भागा हुआ कैदी पकड़े जानेपर और भी अधिक दण्डका भागी होता है, वैसे ही आत्महत्या करनेवाले पापी जीवको परलोकमें बड़ी भयानक यन्त्रणा भोग करनी पड़ती है। आत्महत्या करनेके बाद आपको जिनके प्रति लड़कपनमें आकर्षण था, वे मिल ही जायँगे—यह निश्चय नहीं है। पता नहीं आप किस योनिमें कहाँ जायँ और वे कहाँ रहें। विवाहके पहले दूसरी बात थी; पर अब जब भगवान‍्के मंगल-विधानके अनुसार माता-पिताने जिस सत्पात्रके साथ आपका सम्बन्ध कर दिया है, उन्हींको जीवन समर्पण करके सुखसे रहना चाहिये, नहीं तो, यह अशान्तिकी आग आपको यहाँ भी जलायेगी और आगे भी।

यदि वास्तवमें आपके हृदयमें सच्चा प्रेम है और वे पुरुष भी यदि प्रेमके ही उपासक हैं तो आपलोगोंको जीवनमें कभी न मिलनेका प्रण करके पवित्र बहिन-भाईका मानसिक सम्बन्ध रखना चाहिये। यह भी न रहे तो और अच्छा है।

आपको न तो दु:ख करना चाहिये और न अपनेको हतभागिनी ही मानना चाहिये। भगवान‍्का भजन करना चाहिये और उनकी कृपापर विश्वास करके अपने जीवनको पवित्र और सुखी बना लेना चाहिये। आपका दु:ख तो आपकी कल्पनाका है और इस कल्पनाको छोड़ते ही मिट सकता है। और यह कल्पना आपके लिये पाप-कल्पना है, अत: उसे छोड़ देना ही उचित है।

(४)

सादर हरिस्मरण। आपका पत्र प्राप्त हुआ। उत्तर लिखनेमें कुछ देर हो गयी! आपने जो अपनी स्थिति लिखी, वह अवश्य ही बड़ी शोचनीय है; पर इसे प्रारब्धका भोग ही समझना चाहिये। आपने जो निश्चय किया है, इसमें भी मुझे तो आपका मोह ही मालूम होता है। इससे तो अच्छा था कि आप भगवान‍्से प्रार्थना करतीं, विश्वासपूर्वक उन्हें पुकारतीं। यों करनेपर वे कृपा करके आपके इस जन्म और परजन्म— दोनोंके लिये यथायोग्य व्यवस्था कर देते। मनुष्य यहीं भूल करता है और अपने मनकी बात भगवान‍्से करवाना चाहता है। दूसरे जन्ममें आपके और उनके कर्मानुसार किसकी क्या गति होगी, यह कौन कह सकता है। पर जब आपने निश्चय कर लिया है, तब भगवान‍्से प्रार्थना कीजिये कि वे आपको सद‍्बुद्धि दें, आपके जीवनको निष्पाप रखें और परजन्ममें आपकी इच्छा पूर्ण करें। इस सम्बन्धमें मैं कोई विशेष जानकारी नहीं रखता; इसलिये इस स्थितिमें नहीं हूँ कि आपको कुछ बता सकूँ।

घरसे निकलकर भागनेकी बात बिलकुल नहीं सोचनी चाहिये, और जहाँतक बने, अपने रोगी पतिकी तन-मनसे सेवा करनी चाहिये। इससे आपको भगवान‍्की प्रसन्नता प्राप्त होगी। पति कैसे भी हों, आपके लिये तो पूजनीय ही हैं। हाँ, वे किसी पापके लिये आज्ञा दें तो उनकी वह आज्ञा नहीं माननी चाहिये। और आपने उनकी ऐसी आज्ञा न मानकर बहुत अच्छा कार्य किया। बड़ोंकी उस आज्ञातकको तो मान लेना चाहिये जिसके परिणाममें अपनी हानि होती हो, पर उनकी कोई हानि न हो। परन्तु जिस आज्ञापालनमें उनका अपना भविष्य बिगड़ता हो, उसे न मानना ही कर्तव्य है। ‘पाप करनेवाला’, ‘करवानेवाला’ और ‘पापका समर्थन करनेवाला’—तीनों ही पापी होते हैं। इसलिये किसीकी पापाज्ञाका न मानना उसे पापसे बचाना है। विशेष धर्मकी बात दूसरी है, पर वह सबके लिये पालनीय नहीं है।

कर्मोंका फैसला देनेवाले श्रीभगवान् ही हैं और उन्हींकी कृपासे किसीकी ‘धारणा’ सत्य हो सकती है। अवश्य ही वह धारणा धर्ममयी होनी चाहिये।