दहेज-प्रथा
प्रिय महोदय, सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। मेरी समझसे अपनी कन्याको दहेज देना बुरी चीज नहीं है, वरं विवाहका एक आवश्यक अंग है। क्योंकि कन्याको इसी रूपमें कुछ मिलता है। परन्तु हिन्दू-समाजमें इस समय जिस प्रकारसे कन्याके पिताको बाध्य होकर दहेज देना पड़ता है, वह तो पाप है। पहलेसे सौदा तै किया जाता है, मोल-तोल होता है और कन्याके पितासे अधिक-से-अधिक लूटनेकी चेष्टा की जाती है। परिणामस्वरूप लड़कियाँ युवती हो जाती हैं, उनके विवाह नहीं हो पाते एवं यदि विवाह हो जाता है तो वरके माता-पिताके द्वारा कन्याको अपने माता-पिताके नाम गन्दी गालियाँ सुननी पड़ती हैं। कन्याके अभिभावकोंकी बड़ी बुरी दशा होती है और उन्हें जीवनभर ऋणी रहना पड़ता है। यह प्रत्यक्ष पाप है। इसके दूर करनेका उपाय तो यही है कि वरपक्षवाले दहेज लेना बन्द कर दें। कम-से-कम, सयाने लड़कोंको इस त्यागके लिये तैयार होना चाहिये और प्रतिज्ञा करनी चाहिये कि हम अपना विवाह तभी करावेंगे, जब दहेज नहीं लिया जायगा। विशेष भगवत्कृपा।