धन और अधिकारका मोह

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। विलम्बके लिये क्षमा करें। आपने वर्तमान परिस्थितिपर विचार प्रकट किये, सो पढ़े। मेरी समझसे आपके विचार ठीक नहीं हैं; परन्तु आप क्या करते। इस समय मनुष्यका मानसिक स्तर इतना नीचे उतर आया है कि उसमें ऐसे ही विचार आया करते हैं और इन्हींमें उसको भलाई प्रतीत होती है। जब समाजमें श्रेष्ठताका मानदण्ड ‘धन और अधिकार’ हो जाता है तथा धन और अधिकारके उपार्जनकी पवित्रता और उनके सदुपयोगपर दृष्टि नहीं रहती, तब उस समाजका पतन हो जाता है। क्योंकि उस समय समाजके अधिकांश मनुष्योंकी प्रबल कामना ‘धन और अधिकार’ को प्राप्त करनेकी हो जाती है, चाहे वे किसी साधनसे प्राप्त हों और संसारमें विषयोंकी कहीं इति नहीं है। इसलिये कितना भी धन या अधिकार प्राप्त हो जाय, कमी बनी ही रहती है, वरं जितना ही अधिक धन और अधिकार मिलता है, उतनी ही अधिक कामना बढ़ती है, वैसे ही जैसे जितनी बड़ी आग होती है, उतनी ही उसकी ईंधनकी भूख बढ़ जाती है। और इस प्रकार धन और अधिकारको प्राप्त कामनाग्रस्त मोहावृत मनुष्योंके द्वारा दूसरे लोग वैसे ही अधिक जलाये जाते हैं, जैसे बड़ी आगकी आँच दूर-दूरतक फैलकर सबको झुलस देती है। सारांश यह कि इनके ‘धन और अधिकार’ का भी दुरुपयोग ही होता है। उनसे साधारण लोगोंको सुख नहीं पहुँचता वरं उनका दु:ख ही बढ़ता है और फिर उनको अपने इन कार्योंके लिये कोई पश्चात्ताप भी नहीं होता। वे इसीको लोकसेवा मानते हैं और जरा भी सच्ची आलोचना करनेवालोंको अपना विरोधी या शत्रु मानकर अपनी शक्तिको उनकी जबान बन्द करनेमें लगा देते हैं। आपके विचार, क्षमा कीजियेगा, कुछ इसी प्रकारकी मनोवृत्तिको लेकर हैं।

आपके पास धन या अधिकार हैं तो उनका सदुपयोग कीजिये और यदि वे धन और अधिकार बुरे साधनोंसे प्राप्त हुए हैं तो उनके लिये पश्चात्ताप कीजिये। भगवान‍्से प्रार्थना कीजिये कि फिर ऐसी दुर्बुद्धि न हो। ‘धन और अधिकार’ यहीं रह जायँगे। इन विनाशी पदार्थोंके लिये सत्य और धर्मको तिलांजलि देना बहुत बड़ी मूर्खता है और हम आज बड़े गौरवके साथ यही कर रहे हैं! पता नहीं, अभी हमें पतनके किस गहरे गर्तमें गिरना है! ‘धन और अधिकार’ का मोह आज इतना बढ़ गया है कि इसके कारण आज सारे समाजमें मानस-रोग बढ़ रहे हैं। जहाँ देखिये, वहीं दलबन्दी, एक-दूसरेको गिरानेकी चेष्टा, गन्दा स्वार्थ और उस स्वार्थसाधनके लिये न्यायान्यायके विचारसे रहित उद्दाम आसुरी प्रयत्न! यह याद रखना चाहिये कि शरीरका बड़े-से-बड़ा रोग मृत्युके साथ ही मर जाता है; परन्तु मानसिक रोग मरनेके बाद भी साथ जाते हैं और जन्म-जन्मान्तरतक यन्त्रणा देते एवं नये-नये पाप करवाते रहते हैं। आपलोग समझदार हैं, बहुत-से लोग आपलोगोंको आदर्श मानते हैं और आपके बनाये हुए पथपर चलनेमें अपना कल्याण समझते हैं, इसलिये आपपर विशेष दायित्व है। आप अपने इस दायित्वको समझें और स्वयं पतनसे बचकर दूसरोंको भी पतनसे बचानेमें सहायक हों। यही आपसे मेरा विनयपूर्वक अनुरोध है।

समाज-सेवा और देश-सेवाके लिये ‘सरकारी पद’ ही आवश्यक नहीं है और न लोक-सेवाके लिये केवल धनकी ही आवश्यकता है। जो लोग सरकारी पदोंपर नहीं हैं और सर्वथा निष्किंचन हैं, पर जिनकी सेवा करनेकी सच्ची इच्छा है, उनके लिये समाज, देश और लोक-सेवाके लिये बड़ा विस्तृत क्षेत्र मौजूद है। वरं यह कहना अत्युक्ति नहीं होगा कि जो लोग पदोंके बन्धनमें नहीं हैं और जिनके पास अभिमान तथा मोहके प्रधान हेतुरूप धनका अभाव है, वे ही अधिक उत्तम और अधिक सात्त्विक भावसे ठोस सेवा कर सकते हैं। हमको जब समाज-सेवा ही करनी है, तब अधिकारका मोह क्यों होना चाहिये और क्यों इसके लिये इतनी पैंतरेबाजी करनेकी बात सोचनी चाहिये। भगवान् हमलोगोंको इस मोहसे मुक्त करें। मैंने जो कुछ लिखा है, शुद्ध प्रेमके कारण लिखा है। शब्दोंकी रूक्षताके लिये क्षमाप्रार्थी हूँ।