धनका सदुपयोग कीजिये
प्रिय महोदय, सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपके लम्बे पत्रका उत्तर संक्षेपमें निम्नलिखित है। धनसे बड़े-बड़े अनर्थ होते हैं। यदि किसीके पास धन आये तो उसे तुरन्त भगवत्प्रीत्यर्थ लोकसेवाके काममें लगाना आरम्भ कर देना चाहिये। धनकी सार्थकता तथा सफलता इसीमें है। भगवान्की प्रसन्नताके लिये व्यय किया हुआ धन भगवान्की प्रसन्नताका कारण होता है और फलत: व्यय करनेवालेको भी प्रसन्नता प्राप्त होती है। धनकी तीन गतियाँ प्रसिद्ध हैं—दान, भोग और नाश। इनमें भगवत्प्रीत्यर्थ धनका दान उसका सर्वोत्तम उपयोग है; भोग निकृष्ट है और परिणाममें दु:खदायी है। नहीं तो, नाश तो होगा ही। पर वह दु:ख, संकट, अपमान, कलह, अनाचार और मौततक देकर नाश होगा। बड़ी साधसे छिपाकर रखा हुआ धन जब जबरदस्ती जाता है, तब बहुत दु:ख होता है। पहले उसका सद्व्यय किया नहीं, फिर सिर पटककर रोना पड़ता है। धन भी छूटता है और वह सुखको भी साथ ले जाता है। बटोरे हुए धनका बलात् अपहरण और विनाश आज प्रत्यक्ष है; यह धनकी अवश्यम्भावी गति है। आप चाहे जितने दु:खी हों, यह तो जायगा ही। बस, इसके बटोरनेमें आपने जो पाप किये, उसका फल यहाँ और आगे आपको भोगना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त इसको लेकर यहाँ जो चिन्ता तथा दु:ख है, वह अलग है। अब भी मेरा तो यही निवेदन है कि बचे-खुचे धनका यदि अब भी कुछ सदुपयोग हो सके तो करना चाहिये। किसी तरह मान लीजिये यदि आपने छलछद्म करके इसको बचा भी लिया, जिसकी सम्भावना बहुत कम है, तो आपके उत्तराधिकारी इसका कैसा सुन्दर सदुपयोग करेंगे, इसका अनुमान आप उनके वर्तमान विचारों और आचरणोंसे लगा सकते हैं। सच्ची बात तो यह है कि धनको जो इतना महत्त्व दिया जा रहा है, यही भूल है। सच्चा धन तो भगवान्का भजन है, मन लगाकर उसका संचय कीजिये। छोड़िये इसकी चिन्ताको यह तो कभी छूटेगा ही। इस समय रह भी जाता तो मरनेके समय इसे छोड़ना पड़ता। यह साथ तो जाता ही नहीं, फिर अभीसे इसका मोह छोड़कर निश्चिन्त क्यों नहीं हो जाते? आप अपनेको बड़ा बुद्धिमान् समझते हैं और बुद्धिमान् हैं भी। यह तो बुद्धिका दुरुपयोग हुआ, जिससे आज आपको दु:खी होना पड़ रहा है। इस बुद्धिको, विवेकको अब जगत्से मोड़कर भगवान्की ओर लगा दीजिये। घबरानेकी जरा भी बात नहीं है। जितनी आयु आपकी शेष है, यदि उसका एक-एक श्वास आपने भगवान्को सौंप दिया तो सारे पाप-तापोंसे मुक्त होकर इसी जन्ममें आप भगवान्को पाकर अनन्त जीवनकी साध पूरी कर सकते हैं। आशा है मेरी प्रार्थनापर आप ध्यान देंगे। शेष भगवत्कृपा।