दीक्षा और शक्तिसंचार

सादर हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिल गया था। उत्तरमें देर हुई, इसके लिये क्षमा करें। आपने मानस-दीक्षा, शक्तिसंचार तथा स्पर्शादि तान्त्रिक दीक्षाओंके सम्बन्धमें पूछा सो यद्यपि इनका मुझे पूरा ज्ञान नहीं है, तथापि शास्त्राध्ययन आदिके आधारपर कुछ बातें सेवामें निवेदन करता हूँ। वायवीय संहिता और कुलार्णवतन्त्रमें शाम्भवी दीक्षाके सम्बन्धमें लिखा है—

गुरोरालोकमात्रेण स्पर्शात् सम्भाषणादपि।

सद्य: संज्ञा भवेज्जन्तोर्दीक्षा सा शाम्भवी मता॥

(वायवीय संहिता)

गुरोरालोकमात्रेण भाषणात् स्पर्शनादपि।

सद्य: संजायते ज्ञानं सा दीक्षा शाम्भवी मता॥

(कुलार्णवतन्त्र)

‘गुरुकी दृष्टि, स्पर्श और भाषणमात्रसे जो तुरन्त एक ज्ञान उत्पन्न होता है, उसीका नाम शाम्भवी दीक्षा है।’

‘गुरुकी दृष्टि, भाषण और स्पर्शादि-मात्रके द्वारा जो तुरन्त एक ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे शाम्भवी दीक्षा माना गया है।’

इसीको वेधदीक्षा और मानसदीक्षा भी कहते हैं। शक्तिसंचारके लिये ही ‘स्पर्शदीक्षा’, ‘दृग्दीक्षा’ और ‘मानसदीक्षा’ का प्रयोग होता है।

यथा पक्षी स्वपक्षाभ्यां शिशून् संवर्द्धयेच्छनै:।

स्पर्शदीक्षोपदेशश्च तादृश: कथित: प्रिये॥

स्वापत्यानि यथा मत्स्यो वीक्षणेनैव पोषयेत् ।

दृग्भ्यां दीक्षोपदेशश्च तादृश: कथित: प्रिये॥

यथा कूर्म: स्वतनयान् ध्यानमात्रेण पोषयेत्।

वेधदीक्षोपदेशश्च मानस: स्यात् तथाविध:॥

जैसे पक्षी अपनी दोनों पाँखोंसे स्पर्श करके धीरे-धीरे अण्डेके अन्दर रहनेवाले बच्चोंका संवर्धन करते हैं, वैसे ही गुरु अपने स्पर्शद्वारा शिष्यकी सोयी हुई शक्तिको जगाकर उसे समृद्ध करते हैं, इसीको ‘स्पर्शदीक्षा’ कहते हैं। जैसे मछली केवल देख-देखकर ही अपने छोटे बच्चोंका पोषण करती है, वैसे ही गुरु केवल दृष्टिके द्वारा ही शिष्यमें शक्तिका संचार करते हैं। इसको ‘दृग्दीक्षा’ नामक उपदेश कहते हैं। और जैसे कछुआ केवल मनसे बार-बार ध्यान करके ही जमीनके अन्दर अण्डोंमें पड़े हुए बच्चोंका पोषण करता है वैसे ही गुरु केवल मनके द्वारा ही शिष्यकी शक्तिको जगा देते हैं। इसको ‘वेधदीक्षा’ या ‘मानसदीक्षा’ नामक उपदेश कहते हैं।

जैसे पिताका शुक्रविन्दु माताके रजके साथ मिलनेसे समयपर सन्तानकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही सुयोग्य शिष्यमें जब गुरुशक्ति संचरित होती है तब उसके अन्दर रही हुई शक्ति जाग उठती है और उससे समयपर ज्ञानरूपी शिशु उत्पन्न होता ही है।

गुरुके द्वारा ‘वेधदीक्षा’ सम्पन्न होनेपर शिष्यमें क्रमश: आनन्द, कम्प, आसनोत्थान, चक्र, निद्रा और मूर्छा—ये छ: अवस्थाएँ प्रकट होती हैं—

आनन्दश्चैव कम्पश्चोद्भावो घूर्णा कुलेश्वरि।

निद्रा मूर्च्छा च वेधस्य षडवस्था: प्रकीर्तिता:॥

शाक्तानन्दतरंगिणीमें कहा है कि शक्तिसंचारके द्वारा उत्तम मन्त्र-चैतन्य होनेपर आनन्द, अश्रुपात, रोमांच और देहावेश आदि लक्षण दिखायी पड़ते हैं—

आनन्दाश्रूणि पुलको देहावेश: सुरेश्वरि।

इत्येतत् कथितं देवि मन्त्रचैतन्यमुत्तमम्॥

इसके अतिरिक्त समर्थ गुरु भक्ति तथा ज्ञानमार्गमें भी शक्तिसंचार किया करते हैं। अवश्य ही ऐसा होता है वहीं, जहाँ गुरु वस्तुत: शक्तिमान् हों, शक्तिपात करना जानते हों और शिष्य शक्तिपात संग्रहण करनेका अधिकारी हो। अनधिकारी गुरु शक्तिपात नहीं कर पाता; क्योंकि वह जानता ही नहीं और अनधिकारी शिष्यमें शक्तिपात करनेसे वह उसे ग्रहण नहीं कर पाता। फलत: कहीं-कहीं तो छोटे बच्चेपर अधिक बोझ लाद देनेसे जैसे उसका अनिष्ट होता है, वैसे ही शिष्यका अनिष्ट भी हो जाता है।

साधारण शक्तिपातका तरीका यह है कि सेवा, अनुकूल आचरण और मधुर सम्भाषणके द्वारा साधक गुरुकी प्रसन्नता प्राप्त करता रहे। गुरु प्रसन्न होकर जब-जब शिष्यको स्वाभाविक आशीर्वादमयी स्निग्ध दृष्टिसे देखते हैं, जब-जब कृपापरवश होकर उसका स्पर्श करते हैं और जब-जब उसका स्मरण करते हैं, तब-ही-तब गुरुकी शक्तिका शिष्यमें संचरण होता है। गुरुकी शक्ति तथा शिष्यके अधिकारके तारतम्यके भेदसे लाभ न्यूनाधिक भले ही हो, परन्तु होता है अवश्य।

भगवान‍्के द्वारा भी अधिकारी साधकको शक्ति प्राप्त होती है। वह होती है विशुद्ध श्रद्धासम्पन्न हृदयकी सरल प्रार्थनाके द्वारा। प्रत्येक साधक इससे लाभ उठा सकता है। कभी-कभी तो प्रार्थनाद्वारा ऐसी शक्ति साधकको प्राप्त हो जाती है कि वह स्वयं आश्चर्यमें डूब जाता है। ध्रुवादिमें भगवत्कृपासे ही शक्तिका संचार हुआ था।

वर्तमान कालमें शक्तिसम्पन्न गुरु जैसे विरले ही मिलते हैं, वैसे ही अधिकारी शिष्य भी बहुत ही थोड़े रह गये हैं। इसलिये शक्तिपातका प्रश्न ही प्राय: नहीं उठता।

मेरी समझसे तो आपको भगवत्कृपाका आश्रय लेकर सरल शुद्ध भावसे भगवन्नामका जप और भगवान् श्रीकृष्णके श्यामसुन्दर मदनमोहन कुमार रूपका ध्यान करना चाहिये। आपकी प्रकृतिके अनुसार आपको इसीसे लाभकी सम्भावना प्रतीत होती है।