दुराचार-भ्रष्टाचार कानूनसे नहीं मिट सकता
सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आजकल इस विषयपर बहुत अधिक चर्चा हो रही है। पत्रोंमें यही विषय है, सभाओंमें यही है, धारासभाओंमें यही है और पार्टियोंमें भी यही है। सभी इस रोगको समझते हैं, सभी दवा बताते हैं, नित्य नये-नये नुस्खे भी निकलते हैं, कानून बनते हैं, भ्रष्टाचार-निवारण-समितियाँ बनती हैं और उपदेश-आदेश होते हैं; परन्तु फल विपरीत ही होता है। ‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।’ इसपर मुझे भी बहुत-से मित्रोंको लिखना पड़ा है, परन्तु इससे होता क्या है। यह ध्रुव निश्चय समझिये—दुराचार और भ्रष्टाचार समाचारपत्रोंके लेखोंसे, दिखौआ व्याख्यानोंसे और कानूनोंसे कभी नहीं मिट सकते। इनकी जड़ तो हमलोगोंके हृदयोंमें है। भगवत्कृपासे जब मनुष्यकी चित्तवृत्ति भगवान्की ओर आकृष्ट होगी, जब वह सत्य और त्यागका महत्त्व समझेगा और सर्वव्यापी भगवान्की सत्ता सर्वत्र समझकर एकान्तमें—मनमें भी पापका आचरण करनेमें लज्जा या भयका अनुभव करेगा, तभी दुराचार और भ्रष्टाचार बन्द होंगे। नहीं तो, नये-नये कानून बनते जायँगे, नये-नये रास्ते निकलते जायँगे। एक-दूसरेकी आलोचना लोग करेंगे, एक-दूसरेके पापोंका उद्घाटन करनेमें सुखका अनुभव भी करेंगे; पर स्वयं पापका त्याग नहीं करेंगे। उसे लोभीके धनकी-ज्यों छिपा-छिपाकर रखेंगे और नया-नया बढ़ाते ही जायँगे। इस स्थितिमें कानून क्या करेगा। पापसे, दुराचारसे, भ्रष्टाचारसे घृणा होनी चाहिये। मनमें उनके प्रति असह्य बुद्धि होनी चाहिये। तभी उनसे मनुष्य हटता है। जब मनमें इनके प्रति प्रियबुद्धि है, गौरवबुद्धि है और ऐसा करनेमें बुद्धिमानीका गर्व है, तब मनुष्यसे ये क्यों छूटेंगे। वह वस्तुत: छोड़ना चाहता ही नहीं। पर क्या किया जाय। आज तो ‘कुएँ भाँग पड़ी’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। कोई सरकारी महकमा, कोई अधिकारिवर्ग, कोई क्लर्क-श्रेणी, कोई व्यापारी-वर्ग, कोई उन्नतिकामी और दुराचार-भ्रष्टाचार-विरोधी संस्थाओंका समुदाय—कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है, जिसमें न्यूनाधिक रूपसे दुराचार और भ्रष्टाचारका दोष सर्वथा न आ गया हो। इसका एकमात्र कारण है—घोर विषयासक्ति—जिसके कारण शारीरिक सुखोपभोगकी राक्षसी इच्छा, भगवान्की सर्वव्यापक सत्तामें और कर्मफलभोगमें अविश्वास, शास्त्रमें अश्रद्धा और धर्मकी अवहेलना आदि दोष समाजमें प्रबलरूपसे आ गये हैं।
इन दोषोंके दूर होनेका उपाय है—‘हिंदू-संस्कृति’ के अनुसार जीवनका लक्ष्य त्याग हो, और त्यागकी तैयारी करनेमें ही बालकपनसे लेकर बुढ़ापेतक सारी क्रियाएँ हों। जीवनका आरम्भ संयमसे हो—बीजारोपण ही संयमसे हो, संयममें ही उसका पालन-पोषण हो, संयममें ही ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा-दीक्षाकी प्राप्ति हो, संयममें ही धन-वैभव और पद-अधिकारोंकी प्राप्ति हो और संयममें उनका सदुपयोग होकर अन्तमें पूर्ण त्यागमें पहुँचकर जीवन त्यागरूपमें ही पर्यवसित हो जाय। यह सर्वस्वत्याग ही हिन्दू-संस्कृतिका ‘संन्यास’ है। गर्भाधानसे लेकर संन्यासतक सारा जीवन संयममय होता है और उसकी धारा स्वाभाविक ही अनवरत उसी प्रकार भगवान्की ओर चलती है, जिस प्रकार गंगाकी धारा समुद्रकी ओर प्रवाहित होती है। इस प्रकार धर्मका आश्रय लेनेपर ही संसारसे दुराचार, भ्रष्टाचार, पाप-ताप दूर होंगे और तभी सच्चे सुख-शान्तिकी प्राप्ति होगी। इसके बिना बाहरी करोड़ों उपायोंसे भी पाप न मिटेंगे और जब पाप नहीं मिटेंगे तब ताप मिटनेका तो प्रश्न ही क्यों उठना चाहिये। पर आज तो दुर्भाग्यवश हमलोग धर्मके नामसे ही चिढ़ने लगे हैं। धर्मका बहिष्कार करके ही सुख-शान्ति पाना चाहते हैं। इसी प्रमादका परिणाम प्रत्यक्ष है। समाजका नैतिक पतन उत्तरोत्तर गहरा होता जा रहा है और इसीके साथ-साथ क्रूरता, संघर्ष, संहार, हिंसा आदि दोष और भाँति-भाँतिके दु:ख भी बढ़ रहे हैं और यही दशा रही तो इनका सहज ही अन्त होना भी कठिन ही है।