दुर्गा और सरस्वतीकी उपासना

सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद! उत्तरमें निवेदन है कि श्रीदुर्गाजीका ‘दुर्गा’ नाम ही ढाई अक्षरका है। इसका जप आप हर समय कर सकते हैं। प्रतिदिन स्नान-सन्ध्या आदिसे निवृत्त होकर एक आसनपर बैठकर मालाद्वारा जप करना चाहिये। जितना आप अधिक-से-अधिक प्रेमपूर्वक जप कर सकें, उतना ही अच्छा है—‘अधिकस्याधिकं फलम्।’ इसके जपकी कोई नियमित संख्या या विशेष विधि नहीं है।

‘सरस्वती’ का बीज-मन्त्र ‘ऐं’ है। यह सबसे छोटा मन्त्र है। सरस्वतीजीका ध्यान करते हुए इस मन्त्रका जप करनेसे उनकी कृपा प्राप्त होती है। श्रीदेवीभागवतमें इसकी बड़ी महिमा बतायी गयी है। सुदर्शनने इसीके जपसे सरस्वतीका प्रत्यक्ष दर्शन और दुर्लभ वरदान प्राप्त किया था।

प्रत्येक कामनाकी पूर्ति करनेवाले हैं स्वयं श्रीभगवान्; अत: प्रेमपूर्वक उन्हींका नाम जपना चाहिये—

अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।

तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥

(श्रीमद्भा० २। ३। १०)

अर्थात् ‘कोई कामना न हो अथवा सब प्रकारकी कामनाएँ हों या मोक्षमात्रकी अभिलाषा हो, मनुष्य तीव्र भक्तियोगके द्वारा परम पुरुष भगवान‍्की आराधना करे।’ अत: प्रत्येक कामनाकी पूर्तिका उपाय है—भगवान‍्की अटल भक्ति और भगवान‍्के नामोंका निरन्तर जप।

वशीकरणकी विधि मेरे पास नहीं है। वशीकरणका प्रयोग सीखना या करना भी नहीं चाहिये। कोई पुरुष किसी स्त्रीको वशमें करनेके लिये यदि इसका प्रयोग करता है तो वह पाप करता है। यदि किसी मनोरथकी सिद्धिके लिये देवताको वशमें करना हो तो वह उस देवताकी अथवा साक्षात् भगवान‍्की आराधनासे ही साध्य है। इसके लिये वशीकरणका प्रयोग करना निरर्थक है। भगवान् पर वशीकरण नहीं चलता। वे तो प्रेमसे ही वशमें होते हैं अथवा स्वयं कृपा करके ही भक्तकी इच्छा पूरी करते हैं। भगवान‍्को वशमें करनेके लिये ‘ढाई’ अक्षरका ‘प्रेम’ ही समर्थ है। शेष भगवत्कृपा।