दुष्ट पतिको पत्नी क्या समझे?
सादर हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। अत्यन्त दुष्ट स्वभावके जो पुरुष अपनी सती-साध्वी निर्दोष पत्नियोंको मारते हैं, उन्हें छोड़ देनेकी तथा उन्हें ठीक करनेके लिये दूसरी स्त्री घरमें लाकर रखनेकी धमकी देते हैं, पर-स्त्रीके पास जानेसे रोकने तथा समझानेपर अत्यन्त अनुचित ढंगसे डाँटते-फटकारते एवं अपमान करते हैं, वे मूर्ख पुरुष अपने ही हाथों अपने सिरपर प्रहार कर रहे हैं। अपने ही गिरकर जलनेके लिये भीषण नरकाग्निको प्रज्वलित कर रहे हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि वे महापाप कर रहे हैं और उसका भयानक परिणाम, भगवत्कृपासे कोई प्रायश्चित्त नहीं हो गया तो, उन्हें अवश्य ही भोगना पड़ेगा; परन्तु पतिव्रता पत्नी पतिको ऐसा दु:खद परिणाम भोगते देखकर सुखी थोड़े ही होगी।
बहुत दिन पहलेकी बात है; किसी सज्जनने महात्मा गाँधीजीसे पूछा था कि ‘निर्दोष सीताको वनमें अकेली छुड़वा देनेवाले रामको, साध्वी द्रौपदीको जुएके दावपर लगा देनेवाले युधिष्ठिरको और सती दमयन्तीको जंगलमें अर्धवस्त्रा सोयी छोड़कर चल देनेवाले नलको मनुष्य समझा जाय या राक्षस?’ इसपर महात्माजीने उत्तर दिया था कि ‘इसका निर्णय तो सीता, द्रौपदी और दमयन्ती ही कर सकती हैं और उन्होंने क्या निर्णय किया तथा अपने-अपने पतिको क्या समझा—यह उनके आचरणोंसे स्पष्ट है।’
ठीक स्मरण नहीं है, प्रश्नकर्ताके और महात्माजीके शब्द क्या थे। पर जहाँतक स्मरण है, भाव यही था। ऐसी स्थितिमें पत्नीके साथ अनवरत दुष्टताका व्यवहार करनेवाले पतिको क्या समझना चाहिये, इसका यथार्थ निर्णय तो उसकी पत्नी ही करेगी। परन्तु यह निर्विवाद है कि उसका पति अपराधी है और दण्डका पात्र है।
प्रतिदिन असहाय होकर चुपचाप झिड़कियाँ, गालियाँ, थप्पड़ और घूँसे सहकर पतिव्रता बने रहनेका उपदेश देना तो सहज है; परन्तु ऐसी परिस्थितिमें कितनी और कैसी शारीरिक तथा मानसिक यन्त्रणा होती है तथा मनकी उस समय क्या दशा होती है—इसका अनुभव तो भुक्त-भोगीको ही हो सकता है। कलम चलानेवाला कोई इसपर क्या लिखे; परन्तु ऐसी स्त्रीको कम-से-कम इतना तो अवश्य करना चाहिये कि वह ऐसे पतिसे अलग अपने मैकेमें अथवा अन्य किसी सुरक्षित स्थानमें रहे और कानूनी कार्रवाई करके निर्वाहका खर्च पतिसे वसूल करे।
वस्तुत: हिन्दू नारीकी शोभा और उसका गौरव तो इसमें है कि वह अपने पवित्र सतीत्वके तेजसे पतिके दुराचारी तथा अत्याचारी स्वभावको बदल दे और उसके जीवनको पवित्र बना दे। यमराजको जीतनेवाली पतिव्रता चाहें तो भगवत्कृपाके बलपर क्या नहीं कर सकतीं। ऐसा होना असम्भव नहीं है कठिन तप:साध्य अवश्य है।
अब ऐसे पति महाशयोंसे यह कहना है कि वे अपनी इस दुर्नीतिको नहीं छोड़ेंगे तो अपना तथा हिन्दूजातिका भी बड़ा अकल्याण करेंगे। स्त्रियोंमें भी चेतन आत्मा है। उनको भी शारीरिक तथा मानसिक पीड़ा होती है। वे पत्थरकी तो हैं ही नहीं जो आपकी डाँट-मारको सहती रहें और बदलेमें कुछ भी न करें। आपलोगोंको अपना जीवन पवित्र बनाना चाहिये और सती-साध्वी निर्दोष पत्नियोंको सतानेसे बाज आना चाहिये। इसीमें आपका कल्याण है।