ईश्वर-भजन या देश-सेवा

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। मेरी समझसे जो ‘मनुष्य केवल ईश्वर-भजन करता है या करनेकी कोशिश करता है और सत्यके आधारपर जीविकाका उपार्जन करता हुआ अपने गृहस्थका पालन करता है’, वह कम देश-सेवा नहीं करता। देश-सेवाका अर्थ बैज लगाकर घूमना या व्याख्यान देना नहीं है। मनुष्यके समुदायका नाम समाज है और समाजकी समष्टि ही राष्ट्र या देश है। यदि एक भी मनुष्य भजनपरायण और सत्यपर आरूढ़ है तो इसका यह अर्थ है कि देशका एक अंग सुधर गया है। इतना ही नहीं, उसके आदर्शके प्रभावसे बहुत लोगोंके सुधरनेकी आशा है। आपने लिखा कि ‘देश-सेवासे भजनमें कुछ-न-कुछ बाधा पड़ जाती है और सत्य तथा अक्रोधमें भी बाधा पड़ती है।’ इसका उत्तर यह है कि जिस देश-सेवासे सत्य और अक्रोध मिटता हो एवं असत्य तथा क्रोधको स्थान मिलता हो, वह देश-सेवा कैसी है? जो अपने आचरणसे देशवासियोंके सम्मुख सत्य और क्षमाका आदर्श उपस्थित करता है, वही तो सच्चा देशसेवक है। और भजनमें बाधा पड़नेवाली बात तो और भी विशेष विचारणीय है। जिनके लिये प्रत्येक कर्म ही भगवत्सेवा बन गया हो, जो अपने सहज कर्मसे सदा भगवान‍्की सेवा ही करते हों, उनकी बात दूसरी है। नहीं तो, भजन छूटे—भगवान‍्से चित्त हटे, ऐसा अच्छे-से-अच्छा कर्म भी वस्तुत: त्याज्य ही है।

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ।

जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥

मनुष्य-जीवनका मुख्य लक्ष्य ही भगवान‍्की या भगवान‍्के प्रेमकी प्राप्ति है और वह होती है भजनसे। इसलिये भजन ही मानवका प्रधान धर्म है। इस धर्मके सामने अन्य सभी धर्म तुच्छ हैं।