ईश्वरपर विश्वास कीजिये
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। व्यापारिक उलझनोंके कारण आपकी जो मानसिक स्थिति हो गयी है, वह अवश्य ही शोचनीय है। योजनाओंकी चतुर्दिक् असफलताओंसे निराशा और सन्देहका उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। आप आज चारों ओर निराशा देखते हैं। चित्तमें उदासी, विषाद है; सभीपर सन्देह है कि लोग मेरी उपेक्षा करते हैं, अपमान करते हैं और आपके मुँहसे निराशा भरे शब्द निकलते हैं। यह सब ठीक है, पर इस स्थितिको सुधारना है। निराशा भरे भावोंका पोषण करने, निराशा भरे शब्दोंके उच्चारण करने तथा अपनेको एवं दूसरोंको कोसनेसे स्थितिमें सुधार नहीं होगा; ये तो मानसिक दुर्बलताके लक्षण हैं। इनसे संकटोंकी शृंखला टूटती नहीं, वरं और भी दृढ़ हो जाती है। इनके बदले आप पवित्र रचनात्मक भावोंको मनमें लायें और वैसे ही शब्द उच्चारण करें। ऐसा करनेसे बल और उत्साह आयेगा, संकटोंको झेलनेकी शक्ति आयेगी तथा संकटोंसे तरनेका मार्ग दिखायी देगा।
श्रीभगवान् पर विश्वास कीजिये। आप निश्चय मानिये, भगवान्ने आपके अन्दर वह शक्ति दे रखी है, आपको वह साधन प्रदान कर रखा है, जिसके प्रयोगसे निराशाकी जगह निश्चित आशाका संचार हो सकता है और असफलता सफलतामें परिवर्तित हो सकती है। वह शक्ति या साधन है—‘ईश्वरमें विश्वास रखकर सावधानीके साथ अपने कार्यमें लगे रहना।’ ईश्वरमें विश्वास करनेपर ईश्वरीय नियमोंकी रचनात्मक शक्तियाँ जाग्रत् हो जाती हैं और मनुष्य अपने-आप निराशापर विजय प्राप्त करके असफलताके मूल कारणको भी समूल उखाड़ फेंकनेमें समर्थ होता है।
दु:खी होने, कोसने, निराश होने, पागलोंकी तरह प्रलाप करने, अपशब्दोंके उच्चारण करने और कार्यमें मन लगाकर प्रयत्न न करनेसे तो उलझनें और भी बढ़ जायँगी। अतएव मेरी आपसे विनीत प्रार्थना है कि आप ईश्वरमें विश्वास करके अपनेको समर्थ बना लें और आशाभरे भावोंका पोषण तथा आशाभरे शब्दोंका उच्चारण करें; फिर दुर्भाग्य आपसे दूर भाग जायगा और आप अपने आध्यात्मिक स्तरकी भी रक्षा कर सकेंगे।
ईश्वरका रचनात्मक विधान सदा-सर्वदा हमारे संकटनाश और अभ्युदयके लिये प्रस्तुत है। आप इस सत्यको स्वीकार कीजिये; फिर देखिये, आपकी उलझनें किस आसानीसे सुलझती हैं। संशय, भय, क्रोध, निराशा और असफलताके भावोंका पोषण करके तथा बार-बार ऐसे शब्द बोलकर आप उन बीजोंको बो रहे हैं जिनके फल भी यही—संशय, भय, क्रोध, निराशा और असफलता ही होंगे। इनसे बचिये और ईश्वरकी महान् कृपा और उनके स्वाभाविक प्रेमपर विश्वास करके उन्हींके बीज बोइये; फिर उनसे वैसे ही ईश्वर-कृपामें और उनके प्रेममें अनन्त विश्वासरूपी महान् फल प्राप्त होंगे।
यदि आप जीवनमें सुख, शान्ति, आनन्द, सफलता और ईश्वर-प्रेम चाहते हैं तो बार-बार इन्हींका चिन्तन कीजिये और इन्हीं शब्दोंका उच्चारण कीजिये। दु:ख-अशान्ति, असफलता आदिकी चर्चा और चिन्तन ही बन्द कर दीजिये। जो कुछ हो चुका है, उसे भगवान्के मंगलविधानका परिणाम मानकर अपने मनमें उसका रूप बदल दीजिये, जिससे आपमें उत्साह, उल्लास और कार्यशीलता आ जाय एवं आपका भविष्य उज्ज्वल तथा सुखपूर्ण हो जाय।
ईश्वरमें आपका विश्वास जितना ही दृढ़तर होगा, आपमें और ईश्वरमें उतना ही अधिक निकटका सम्बन्ध होगा और आप उतने ही सुख-शान्ति तथा आनन्दका अनुभव करेंगे।
ये बातें मैं केवल आपको ऊपरी सान्त्वना देनेके लिये नहीं लिख रहा हूँ। यह परम सत्य है। कोई भी मनुष्य इसका प्रयोग करके देख सकता है। आप साहस मत छोड़िये और निराश न होइये। भगवान्की अपार और अटूट शक्तिपर विश्वास करके कार्योंको सुलझानेमें जुट जाइये। आपको अपने-आप चमत्कारपूर्ण प्रकाश मिलेगा, पथ मिलेगा और आप अनायास ही कष्टकी कँटीली और जहरीली भूमिको पार करके सुख-शान्तिसे पूर्ण अमृतमयी भूमिमें पहुँच जायँगे।
विपत्तिसे घबरानेवालेकी विपत्ति बढ़ती है घटती नहीं। विपत्ति तो उसीकी नष्ट होती है, जो विपत्ति-विदारण भगवान्के बलपर विश्वास करके विपत्तिको भगानेमें जुट जाता है।
विपत्ति आती ही इसलिये है कि मनुष्य पहले अपने विश्वास करनेयोग्य वस्तुके चुनावमें भूल करता है। वह यदि पहलेसे ही क्षणभंगुर, अनित्य और दु:खदायी भोगोंपर विश्वास न करके ईश्वरमें विश्वास करता तो विपत्ति आती ही नहीं। पर जो हो गया, सो हो गया। अब भी असत्यका त्याग करके सत्यको स्वीकार कर लिया जाय तो सारी उलझनें सहज ही सुलझ सकती हैं।
‘हारिये न हिम्मत बिसारिये न हरि नाम।’