ज्ञान और भक्ति

सादर हरिस्मरण। आपने नीचे लिखा प्रश्न किया है—

प्रश्न है—‘ज्ञानसे भक्ति बढ़ती है या भक्तिसे ज्ञान? इनमेंसे किसका स्थान ऊँचा है?’ इसके उत्तरमें निवेदन है कि ज्ञानसे भक्ति बढ़ती है और भक्तिसे ज्ञान। दोनोंका ही स्थान ऊँचा है। कोई किसीसे छोटा या बड़ा, ऊँचा या नीचा नहीं है। वास्तवमें भक्ति या ज्ञानके स्वरूपको ठीक-ठीक न जाननेके कारण ही ऐसे प्रश्न होते हैं। ज्ञान क्या है? भगवान‍्के तत्त्वका यथार्थ बोध होना और भक्ति क्या है? भगवान‍्के स्वरूपमें प्रगाढ़ प्रेम होना। जिसे भगवान‍्के स्वरूपका यथार्थ ज्ञान होगा, वह इतर वस्तुओंसे हटकर भगवान‍्की ओर ही आकृष्ट होगा। जितना ही उनके तत्त्वका ज्ञान होगा, उतना ही उनके प्रति प्रेम बढ़ता जायगा और उसके परिणाममें संसारसे वैराग्य भी होता जायगा। श्रीमद्भागवतमें कहा है—जो भगवान‍्की शरणमें जाता है, उसमें तीन बातें साथ-ही-साथ प्रकट होने और बढ़ने लगती हैं— भगवान‍्के प्रति प्रेम, भगवत्तत्त्वका ज्ञान तथा अन्य वस्तुओंसे वैराग्य, जैसे भोजन करनेवाले मनुष्यको प्रत्येक ग्रासके साथ ये तीन बातें प्राप्त होती हैं—तृप्ति, पुष्टि और भूखकी निवृत्ति। यथा—

भक्ति: परेशानुभवो विरक्ति-

रन्यत्र चैष त्रिक एककाल:।

प्रपद्यमानस्य यथाश्नत: स्यु-

स्तुष्टि: पुष्टि: क्षुदपायोऽनुघासम्॥

(११। २। ४२)

यह ज्ञानसे भक्तिका बढ़ना हुआ। गीतामें भी भगवान‍्ने ज्ञानसे भक्ति और भक्तिसे ज्ञानकी प्राप्ति बतायी है—

ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।

सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥

भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वत:।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥

(१८। ५४-५५)

‘ब्रह्मको प्राप्त (वह पुरुष) प्रसन्नचित्त होकर न तो फिर शोक करता है न आकांक्षा ही। सब भूतोंमें समताको प्राप्त वह मेरी पराभक्तिको पाता है। फिर उस पराभक्तिसे वह मुझे जैसा और जो मैं हूँ, तत्त्वसे जान लेता है। तब मुझको तत्त्वसे जानकर वह इसके अनन्तर मुझमें प्रवेश हो जाता है।’

जो भगवान‍्के प्रति जितना प्रेम बढ़ायेगा, वह उनके यथार्थ स्वरूप और रहस्योंसे उतना ही अधिकाधिक परिचित होता जायगा। यह भक्तिसे ज्ञानकी वृद्धि हुई। लोकमें भी देखा जाता है—जो जिससे प्रेम करता है, वह उसके आन्तरिक रहस्योंसे विशेष परिचित रहता है। जब ज्ञान और भक्ति दोनों ही एक-दूसरेके पोषक हैं, तब किसको किससे बड़ा कहा जाय। फलकी दृष्टिसे तो दोनोंमें कोई भेद है ही नहीं, साधनकालमें भी ज्ञानके साथ भक्तिका सम्बन्ध देखा जाता है। अतएव ज्ञान या भक्तिमें कोई भेद या तारतम्य नहीं मानना चाहिये। गोस्वामी तुलसीदास भी कहते हैं—

भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा।

उभय हरहिं भव संभव खेदा॥

इस प्रकार स्वरूप और महत्त्वकी दृष्टिसे दोनोंमें कोई अन्तर न होनेपर भी साधनमें सुखद, सुगम और भगवान‍्को अत्यन्त प्रिय होनेके कारण शास्त्रोंमें भक्तिकी श्रेष्ठताका वर्णन किया गया है। ‘ज्ञानके पथ’ को कृपाणकी धार कहा जाता है, उससे गिरते देर नहीं लगती। एक तो वह सर्वसाधारणके लिये अगम्य होता है, दूसरे उसमें अनेक प्रकारके विघ्नोंसे स्खलनका भय रहता है। साधन भी उसका कठिन है।

ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका।

साधन कठिन न मन कहँ टेका॥

‘स्वयं भगवान् कहते हैं— ‘अव्यक्ता हि गतिर्दु:खं देहवद्भिरवाप्यते।’ देहाभिमानियोंके लिये अव्यक्त गति कष्टसाध्य है। देहाभिमानसे छूटना सहज नहीं है। भक्तिमें इससे कोई भय नहीं होता। वहाँ देह और उसका अभिमान दोनों श्रीहरिके चरणोंमें समर्पित हो जाते हैं। भक्तके योग-क्षेमका भार भगवान् पर होता है। वे ‘जिमि बालक राखइ महतारी’ की भाँति सदा भक्तिकी रखवारीमें लगे रहते हैं। ज्ञानका चरम फल है मुक्ति— ‘ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।’ परन्तु रामका भजन करनेवाले भक्तके पास वह मुक्ति अपने-आप आती है—

‘अनइच्छित आवइ बरिआईं।’

इतना ही नहीं, ज्ञान और विज्ञान सब कुछ भक्तिके अधीन है।

तेहि आधीन ग्यान बिग्याना।

जैसे जल स्थलके बिना नहीं रह सकता, उसी प्रकार मोक्ष-सुख भक्तिके बिना नहीं रहता—

तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई।

रहि न सकइ हरि भगति बिहाई॥

जिस अविद्याका नाश करनेके लिये ज्ञानयोगीको बहुत प्रयत्न करना पड़ता है, वही भक्तके लिये अनायास सिद्ध है।

भक्ति करत बिनु जतन प्रयासा।

संसृति मूल अबिद्या नासा॥

और भक्तिहीन ज्ञान भी भगवान‍्को प्रिय नहीं है—

भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ।

श्रीमद्भागवतमें तो यहाँतक कहा गया है कि जो भगवान‍्की कल्याणकारिणी भक्तिकी ओरसे उदासीन होकर केवल ज्ञान-प्राप्तिके लिये क्लेश उठाते हैं, उन्हें केवल परिश्रम ही हाथ लगता है—ठीक उसी तरह जैसे भूसी कूटनेवालेको चावल नहीं मिलता, केवल श्रम ही उठाना पड़ता है।

श्रेय:स्रुतिं भक्तिमुदस्य ते विभो

क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये।

तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते

नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥

(१०। १४। ४)

इस प्रकार विचार करके सबको भगवान‍्की भक्तिमें ही मन लगाना चाहिये।