हिन्दी और हिन्दोस्तानी
प्रिय महोदय! सप्रेम राम-राम। आपका कृपापत्र मिला। आपने जो कुछ लिखा सो ठीक है। इस समय हिन्दुओंमें राष्ट्रीयताके मोहके कारण उर्दू-प्रेम बेहद बढ़ रहा है। हिन्दी छोड़कर उर्दू पढ़ने-पढ़ानेसे नि:सन्देह ही मुसलमानी संस्कृतिका प्रभाव पड़ेगा और उससे हिन्दूजातिकी बड़ी हानि होगी। जो उर्दू पढ़ना चाहें, वे अवश्य पढ़ें, उन्हें कोई रोक नहीं सकते और रोकना चाहिये भी नहीं। परन्तु हिन्दीमें फारसीके शब्दोंको घुसेड़कर उसे हिन्दोस्तानी बनाना और नागरी तथा फारसी दोनों लिपियोंको पढ़नेके लिये बाध्य करना—यह एक प्रकारका जुल्म है। इससे एकता नहीं बढ़ेगी बल्कि भाषाके क्षेत्रमें भी साम्प्रदायिकता बढ़ जायगी और बढ़ भी रही है। परिणाम यह होगा कि मुसलमान तो हिन्दी पढ़ेगें नहीं, क्योंकि उन्हें हिन्दीकी जरूरत ही क्यों रहेगी जबकि हिन्दी ही हिन्दोस्तानीके रूपमें उर्दू बन जायगी और हिन्दू हिन्दी भूल जायँगे, फलत: उनकी संस्कृतिपर आघात होगा। पर क्या किया जाय? इस समय तो सारा काम उलटा ही हो रहा है और इसीमें अपना हित दीखता है। ऐसी हालतमें हिन्दी-प्रेमी जनताको चाहिये कि वह जबरदस्ती लादी जानेवाली हिन्दोस्तानीको स्वीकार न करे और आन्दोलन करके स्कूल-कॉलेजोंमें हिन्दोस्तानी चलानेवाले सरकारी शिक्षा-विभागको ऐसा न करनेके लिये बाध्य कर दें। फिर जिनकी इच्छा हो उर्दू पढ़ें, जिनकी इच्छा हो हिन्दी पढ़ें या दोनों पढ़ें। हिन्दी उर्दू बन जाय, उर्दू फारसी बन जाय और हिन्दी मिट जाय। इस प्रयासको कदापि सफल नहीं होने देना चाहिये। स्कूलों-कॉलेजोंके हिन्दू विद्यार्थी मिलकर जोरकी आवाज उठावें तो इस दिशामें बहुत कुछ काम हो सकता है। विशेष भगवत्कृपा!