हिन्दू विधवा बहिनके साथ कैसा बर्ताव करें?

सादर हरिस्मरण। आपका पत्र यथासमय मिल गया था, उत्तरमें विलम्बके लिये क्षमा करेंगे। आप लिखते हैं ‘मैं जातिका मोहमडन हूँ, किन्तु मेरे हृदयमें सदा दयाका स्रोत बहता रहता है। मनुष्यमात्रकी सेवा करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ।’ यह बहुत ही अच्छी बात है। आपका यह गुण आपके अन्य बन्धुओंके लिये भी अनुकरणीय है। वास्तवमें दया तो मनुष्यमात्रका गुण होना चाहिये। हिन्दू हो या मुसलमान, निर्दयता सभीके लिये कलंककी बात है। मनुष्य ही क्यों, सम्पूर्ण जीवमात्रकी सेवाको परम कर्तव्य समझना चाहिये। चींटीसे लेकर मनुष्यतक सभी प्राणी भगवान‍्के अंश हैं; अत: भगवद‍्बुद्धिसे उनकी सेवा, उन्हें सुख पहुँचानेकी चेष्टा करना ही सच्ची भगवत्-सेवा है।

आपने इसी भावसे ‘एक हिन्दू विधवा बहिनकी भलाईके लिये अपना तन-मन-धन लगा रखा है’, यह बड़े सौभाग्यकी बात है। निराश्रयको आश्रय देना, असहाय और अनाथ विधवाओंकी रक्षा करना सबके लिये महान् पुण्यकार्य हैं; परन्तु इसके लिये शुद्ध नीयत और हृदयकी पवित्रता अत्यन्त आवश्यक है। मनुष्य बहुधा आदर्शके नामपर मोहका शिकार हो जाता है। विशुद्ध प्रेमके धोखेमें आकर आसक्ति और वासनाके अतल गर्तमें आकण्ठ मग्न हो जाता है। यह स्थिति बड़ी भयंकर है। इससे पग-पगपर सावधान रहना चाहिये। आपने उन विधवा बहिनकी युवावस्था, कटु-स्वभाव और अनुचित प्रवृत्तिका जो चित्र उपस्थित किया है, उसका आप-जैसे युवकके मनपर विपरीत प्रभाव पड़ना असम्भव नहीं है। तथा उनके और आपके एकान्त मिलनको देखकर जो वहाँके लोग सन्देह करते हैं, यह भी अस्वाभाविक नहीं है। इस परिस्थितिमें भी आपकी भावना कहाँतक पवित्र है, इसका ज्ञान या तो आपको होगा या आप हृदयमें बैठे हुए अन्तर्यामी भगवान् को। दूसरे लोग तो आपके और उनके बाह्य आचार और विचारको देखकर ही कुछ धारणा बनाते होंगे। यदि आप सच्चे हैं तो इन बातोंसे आपको घबराना या भयभीत होना नहीं चाहिये। विरोधकी आँचमें आप अपने खरेपन और खोटेपनकी परख कर सकते हैं। आपमें कोई दोष नहीं है तो विरोधियोंको एक-न-एक दिन अपनी भूल अवश्य मालूम होगी और वे आपका आदर भी करेंगे। न भी मालूम होगी, तो भी आपकी यथार्थमें कोई हानि नहीं होगी।

‘निन्दनीय कार्यसे डरना चाहिये, न कि निन्दासे’—आपके इस कथनका मैं समर्थन करता हूँ। आप निन्दासे बचनेके लिये उन बहिनको धोखा नहीं देना चाहते, यह विचार उत्तम है। यदि आप दोनोंके हृदयमें एक-दूसरेके प्रति भाई-बहिनका ही भाव है तो समाजके लिये सन्देह और विरोधका कोई कारण नहीं रह जाता। यह आपकी ही दुर्बलता है कि समाज आपके इस वास्तविक सम्बन्धका अनुभव नहीं कर पाता। मेरी रायमें आपको नीचे लिखी बातोंपर ध्यान देना और उन्हें काममें लानेकी चेष्टा करनी चाहिये।

१—कर्तव्य या सेवाके भावसे, कोई स्वार्थ या कामना मनमें न रखकर आप उन बहिनकी सब प्रकारसे उचित सहायता करते हुए भी उनसे मिलना-जुलना बन्द कर दें। यदि कभी कार्यवश मिलना आवश्यक हो तो दूसरोंके सामने उनसे भेंट करें। भाई-बहिनकी भेंट एकान्तमें या लुक-छिपकर क्यों हो?

२—वहाँ हिन्दू-समाजमें जो कोई वृद्ध, सदाचारी तथा उदार एवं दयालु पुरुष हों, उनसे प्रार्थना करके उन बहिनकी देखभालका कार्य उन्हें सौंपें। अच्छे घरकी सती-साध्वी स्त्रियोंसे उन बहिनका मेल-जोल बढ़े और वे उनके संगसे लाभ उठावें।

३—उनके धार्मिक आचार-विचार तथा धार्मिक भावको प्रोत्साहन देनेके लिये आप अपने लिखित विचार उनके सामने रखें, जिसे वे स्वयं भी पढ़ें और दूसरोंको भी पढ़ा सकें। इसके अलावा उन्हें गीताप्रेसकी धार्मिक पुस्तकें, ‘कल्याण’ तथा सतियोंके जीवन-चरित्र पढ़नेको दें। वे प्रतिदिन तुलसीकृत रामायणका पाठ और भगवान‍्के नामोंका जप किया करें तो बड़ा लाभ होगा। इससे उन्हें शान्ति मिलेगी, मनसे बुरे विचार निकल जायँगे और आपकी ओरसे प्रवृत्ति हट जायगी।

४—उन बहिनसे मेरा यही अनुरोध है कि अब भी वे अपनेको सुधारें। मनुष्यका शरीर बार-बार नहीं मिलता। इसको पाकर जो अपने कल्याणके लिये यत्न नहीं करता, वह मूढ़ और भाग्यहीन है। पूर्वजन्ममें न जाने कौन-सा अपराध हुआ था, जिससे उन्हें इस जन्ममें किशोरावास्थामें ही वैधव्यका कष्ट भोगना पड़ा। अब और भी पाप बढ़नेपर उन्हें किन नरकोंमें सड़ना पड़ेगा, यह कहा नहीं जा सकता। जो विधवा स्त्री संयम छोड़कर भोग-विलासमें आसक्त होती है और मर्यादाका उल्लंघन करके अपने जीवनको कलंकित करती है, वह अपने ही हाथों अपने पैरोंमें कुल्हाड़ी मारती है। उनको अब भी चेतना चाहिये, धर्म और सदाचारकी रक्षा करनी चाहिये। वे पापपंकमें डूबकर अपनेको धधकती हुई नरकाग्निमें न झोंकें। पिछले पापोंके लिये रोकर सच्चे हृदयसे भगवान‍्से क्षमा माँगें। याद रखें—वे उन हिन्दू-देवियोंकी सन्तान हैं, जो सतीत्वकी रक्षाके लिये हँसते-हँसते प्रज्वलित अग्निमें कूद पड़ती थीं। अत: उन्हींके पद-चिह्नोंपर चलकर भगवान‍्का भजन करते हुए अपने जन्म और जीवनको सफल करें।