हृदयकी सच्ची तड़प ही भगवान्को पानेका साधन है
सादर हरिस्मरण। आपको ‘प्यारे रामसे मिलनेकी तड़प है’—यह बड़े ही सौभाग्यकी बात है। मुझे तो उन्हें पानेका इस ‘तड़प’ से बढ़कर और कोई उपाय मालूम नहीं है। पर यह पढ़कर मुझे आश्चर्य ही होता है कि प्रियतमका ऐसा सच्चा अनुराग पाकर भी आप योगी गुरुका आश्रय लेना चाहते हैं। क्या वियोगसे बढ़कर भी कोई योग है? योगिनी गोपियोंने तो प्रियतमके भेजे हुए योगी गुरु उद्धवको भी वियोगी बना दिया था। हठयोग या राजयोग तो प्रेमशून्य साधकोंके लिये है। प्यारे श्यामसुन्दर भी गीतामें श्रद्धालु भक्तको ही सबसे बड़ा योगी बताते हैं—
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:॥
(६।४७)
अर्थात् ‘समस्त योगियोंमें भी मैं उसीको सबसे बड़ा योगी मानता हूँ जो मुझमें मन लगाकर श्रद्धापूर्वक मेरा भजन करता है।’ अत: आप तो इस वियोगरूप योगका ही आश्रय लीजिये और प्यारे रामको ही अपना गुरु बनाइये। यदि उनकी इच्छा होगी तो वे आपको किसी लौकिक या अलौकिक गुरुके रूपमें प्रकट होकर किसी अन्य योगकी दीक्षा भी दे देंगे। आप स्वयं उनसे प्रेमके सिवा कोई दूसरा पन्थ और उनके सिवा कोई दूसरा पथ-प्रदर्शक क्यों मानते हैं? गुरुके रूपमें तो स्वयं भगवान् ही आया करते हैं और उचित अवसर आनेपर वे स्वयं ही साधकको प्राप्त हो जाते हैं। किसीसे पूछताछ करके गुरुका पता नहीं लगाया जा सकता और सच मानिये तो मुझे किसी सिद्ध योगीका पता भी नहीं है।
मैंने आपको ‘कृपा बनी रहे’ यह शब्द इसीलिये लिखे थे कि मैं वास्तवमें भक्तोंकी कृपा चाहता हूँ। भक्त और भगवान्की कृपा ही मेरा एकमात्र आधार है। आप क्या हैं—यह मैं भी नहीं जानता, किन्तु जब आपको उनसे मिलनेकी ‘तड़प’ है, तो मेरी दृष्टिमें तो आप भगवान्के कृपापात्र ही हैं। भगवान्के कृपापात्रकी कृपा चाहना मेरा स्वभाव ही है। आपकी आयु अथवा योग्यता कुछ भी हो, मैं तो आपको भगवद्भक्तके रूपमें ही देखता हूँ। मैं क्या हूँ यह मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकता। मैं तो अपनेको उन नटनागरके हाथका यन्त्र ही मानता हूँ, परन्तु ठीक यन्त्र भी बन सका हूँ या नहीं—यह तो वे ही जानें।
और अधिक क्या लिखूँ। आपको देनेयोग्य मेरे पास कोई नवीन भाव भी तो है नहीं। आपकी यह ‘तड़प’ यदि दिनोंदिन बढ़ती ही रहेगी तो एक दिन उन्हें इसे सफल बनानेके लिये प्रकट होना ही पड़ेगा। अत: आपको जो कुछ आवश्यकता हो, वह उन्हींके आगे रख दीजिये। अच्छा तो यह हो कि आप सारी आवश्यकताओं और सारे साधनोंको उनकी चरण-नख-चन्द्रिकापर निछावर करके केवल उन्हींकी आवश्यकताको अपने हृदयमें जाग्रत् कीजिये।
शेष भगवत्कृपा। पत्रोंका उत्तर देनेमें बहुत देरी हो गयी, इसके लिये क्षमा करें।