जगत‍्का स्वरूप और ब्रह्मज्ञानीके व्यवहार

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। पत्र मिला। जगत् वस्तुत: क्या वस्तु है और ब्रह्मज्ञान होनेपर ब्रह्मज्ञानीके लिये जगत् क्या रह जाता है—इन दोनों ही प्रश्नोंका यथार्थ उत्तर देनेकी शक्ति मुझमें नहीं है; क्योंकि न तो मैंने जगत‍्के वास्तविक स्वरूपका अनुभव किया है और न मुझे ब्रह्मज्ञान ही हुआ है। जगत‍्को कुछ लोग मिथ्या कहते हैं और कुछ लोग भगवत्-रूप। इनमें मुझे भगवत्-रूप मानना अधिक अच्छा लगता है। श्रीमद्भगवद‍्गीतामें भी जहाँ-तहाँ जगत‍्को भगवत्-रूप ही बताया गया है। ‘सब कुछ वासुदेव ही है।’ ‘मेरे (भगवान् के) सिवा और कुछ भी नहीं है’ ‘सर्वं वासुदेव: इति’ (गीता ७।१९) ‘मत्त: परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति’ (गीता ७। ७)। ब्रह्मज्ञान होनेपर जगत् नहीं रहता, ऐसी बात नहीं है; क्योंकि ब्रह्मज्ञान होनेके बाद भी ज्ञानी पुरुषोंके द्वारा जगत‍्में कर्म होते देखे जाते हैं। चाहे अहंकारके अभावसे उनको अकर्म माना जाय—चाहे वे भूँजे बीजकी भाँति फलोत्पादन न कर सकें; परन्तु कर्म तो होते ही हैं। भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं जगत‍्में विधिवत् कार्य किये हैं। राजर्षि जनकने राज्य-पालन किया। वेदोंका विभाग करनेवाले भगवान् व्यास और शुकदेवके समान ज्ञानी कौन होगा; परन्तु उन्होंने भी महाभारत और पुराणादि ग्रन्थ बनाये और पढ़े-सुनाये। भगवान् शंकराचार्य परम ज्ञानी थे, परन्तु जीवनभर धर्म-प्रचारका कार्य करते रहे। यदि ब्रह्मज्ञान होनेके बाद जगत‍्का सर्वथा प्रलय हो गया होता तो इन महात्माओंके द्वारा कर्म होना सम्भव नहीं था। हाँ, ब्रह्मज्ञान होनेपर ‘जगत् ब्रह्मसे भिन्न है’ यह भ्रम अवश्य मिट जाता है। अज्ञानी व्यक्ति जगत‍्को ब्रह्मसे भिन्न देखते हैं और ज्ञानी महात्मा उसे ब्रह्मस्वरूप। जैसे स्वर्णके एक पिण्डसे ही भाँति-भाँतिके गहने बनते हैं, उन सबको स्वर्णरूपमें देखना ही यथार्थ देखना है। यदि कोई स्वर्णको भूलकर गहनोंको सोनेसे अलग देखता है तो वह भ्रममें है—ऐसे ही संसारी प्राणी जगत‍्को ब्रह्मसे अलग देखते हैं, इसीसे वे अज्ञानी हैं—भ्रान्त हैं। इसी प्रकार जगत‍्को ब्रह्मसे अभिन्न देखना ही यथार्थ देखना है। ऐसी हालतमें, जैसे सोनेके सब गहनोंको सोना समझनेपर भी गहने अपने आकार-प्रकारमें रहते हैं, चाहे वे टूटते-फूटते और बदलते रहते हों। वैसे ही ब्रह्मज्ञान हो जानेपर भी जगत् अपने आकार-प्रकारमें रहता है। मिथ्या नहीं है—जगत‍्की ब्रह्मसे भिन्नताका भ्रम ही मिथ्या है। सोनेके गहनोंको यदि कोई मिथ्या कहे तो उसे भी भ्रान्त कहते हैं; क्योंकि वस्तुत: सोना होनेपर भी गहनोंके आकार-प्रकार और व्यवहारमें भेद है ही और उनका अस्तित्व भी है ही। इसी प्रकार ब्रह्मके ही जगत्-रूपमें भासनेपर भी जगत‍्की सारी वस्तुओंका अस्तित्व है ही। इसीसे श्रुतिने कहा है— ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन।’ ‘सब कुछ ब्रह्म ही है, ब्रह्मके सिवा कुछ भी नहीं है।’ जैसे सब गहने सोना ही हैं, सोनेके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। जगत‍्को सर्वथा मिथ्या बौद्धोंने कहा है; वेदान्त मिथ्या नहीं बतलाता, परन्तु ब्रह्मरूप बतलाता है। अतएव जगत् वस्तुत: ब्रह्मरूप है और ब्रह्मज्ञान होनेपर जगत् ब्रह्मरूप ही रह जाता है।

आपने पूछा कि ब्रह्मज्ञानी व्यवहार कैसे करता है? सो इसका उत्तर यह है कि ब्रह्मज्ञानी वैसा ही व्यवहार करता है, जैसा शास्त्रदृष्टिसे उसको करना चाहिये। जैसे सब गहने सोना होनेपर भी नथ नाकमें पहनी जाती है, कड़े-कंकण हाथोंमें और हार गलेमें, वैसे ही सारा जगत् ब्रह्मरूप होनेपर भी व्यवहार वस्तुओंके अनुरूप ही होता है। ब्रह्मज्ञानी पिताको पिता, माताको माता, पत्नीको पत्नी और पुत्रको पुत्र मानकर ही व्यवहार करेगा। वह जहरको जहर मानेगा और अमृतको अमृत ही। अतएव जो व्यक्ति जिस पदसे सम्बन्ध रखता है, उसके साथ उसी पदके अनुकूल व्यवहार होगा। भिखारीके साथ जैसा व्यवहार किया जाता है वैसा ही व्यवहार यदि सम्राट्के साथ किया जाय तो बड़ा बुरा परिणाम होता है। इसलिये ब्रह्मज्ञानीके व्यवहार शास्त्र और समाजके अनुकूल ही होते हैं। अवश्य ही राग-द्वेष, कामना-वासना और अभिमान-अहंकार न होनेसे उसके व्यवहारमें कोई दोष नहीं आता। वह उज्ज्वलसे भी उज्ज्वल और आदर्शरूप होता है। उसके व्यवहारसे किसीका अहित नहीं होता। इतना होनेपर भी उसका व्यवहार होता है अपने स्वभावके अनुरूप ही। कर्मठ स्वभावका ज्ञानी विशेष कर्मशील होगा और विरागी स्वभावका ज्ञानी निवृत्तिपरायण होगा। प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनोंमें ही यथायोग्य व्यवहार होंगे। बुद्धियुक्त नियमित अप्रमत्त व्यवहारका अभाव तो तभी होता है, जब किसी भी कारणसे बाह्य ज्ञान नहीं रहता। चाहे वह नशा खानेसे हो, पागलपनसे हो या ज्ञानकी उच्च भूमिकाओंपर पहुँचनेसे। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि ज्ञानीका प्रमत्त व्यवहार होनेपर ही उसे उच्च भूमिकापर पहुँचा हुआ समझा जाय। महर्षि व्यास-नारद आदिसे बढ़कर कौन ज्ञानी होंगे; परन्तु इनके व्यवहार बड़ी सावधानीसे होते हैं। भगवान् श्रीकृष्णने तो स्वयं अपना उदाहरण देकर सावधानीके साथ नियत कर्म करनेका ज्ञानीको आदेश दिया है।