जगत‍्में दु:खकी वृद्धि क्यों हो रही है?

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। यह सर्वथा सत्य है कि वर्तमान समयमें सारे संसारमें उत्तरोत्तर दु:ख ही बढ़ रहा है, पर इसके लिये क्या किया जाय। फल तो वही लगेगा, जैसा बीज बोया जायगा। भगवान् व्यासदेवने कहा है—

पुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवा:।

न पापफलमिच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नत:॥

‘मनुष्य पुण्यका फल (सुख) तो चाहते हैं, परन्तु पुण्य (पवित्र कर्म) करना नहीं चाहते। इसी प्रकार पापका फल (दु:ख) कोई नहीं चाहते; परन्तु पाप (बुरे कर्म) करते हैं यत्नपूर्वक (नये-नये ढूँढ़कर)।’ इस समय जगत‍्के मानव-प्राणीकी यही दशा है। घोर तमोगुणसे उसकी बुद्धि इतनी विपरीत हो गयी है कि उसे पापोंमें ही पुण्यकी झाँकी हो रही है। भगवान‍्ने गीतामें कहा है—

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।

सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी॥

(१८।३२)

‘अर्जुन! जो तमोगुणसे ढकी हुई बुद्धि अधर्मको धर्म मानती है और सारी बातोंको उलटा ही देखती है, वह बुद्धि तामसी है।’ जबतक मनुष्यकी बुद्धि पापको पाप बतलाती है, तबतक पाप करनेवाले पुरुषको पापमें हिचक होती है और वह बुद्धिकी बार-बार प्रेरणा पाकर पापको छोड़ भी देता है; परन्तु जब बुद्धि पापको पुण्य बतलाती है, तब तो पापमें उसका मन गौरवका अनुभव करता है और नित्य नये-नये पापोंमें प्रवृत्त होकर अपनेको सफल-जीवन मानने लगता है। हमारे आजके मानव-समाजकी प्राय: यही दशा है; तब आप ही विचारिये सुख कैसे हो सकता है। आज जो सर्वत्र दु:खका तूफान आ रहा है, इसका यही कारण है। बीज अनन्तगुना होकर फल दिया करता है। हमारे पाप ही आज अनन्तगुने होकर दु:खके रूपमें फल दे रहे हैं। और जबतक हमारी यह तामसिक बुद्धि नहीं बदलेगी, जबतक हम पापको पाप समझकर उसका परित्याग नहीं करेंगे, तबतक निश्चय जानिये दु:खोंकी मात्रा उत्तरोत्तर बढ़ती ही जायगी। फिर चाहे मोहवश हम उसको उन्नति-अभ्युदय कहें या अन्य किसी गौरवप्रद नामसे पुकारें। असली सुख-शान्ति तो तब होगी, जब सारी विषयकामनाको छोड़कर हम श्रीभगवान‍्का भजन करेंगे—

तब लगि कुसल न जीव कहँ

सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहँ

सोक धाम तजि काम॥

आध्यात्मिक शक्ति ही जगत‍्को विनाशसे बचा सकती है

सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। जहाँ जीवनका लक्ष्य केवल कामोपभोग होता है, वहाँ मनुष्यमें धीरे-धीरे समस्त आसुरी सम्पत्तियाँ आ जाती हैं। गीताके सोलहवें अध्यायमें आसुरी सम्पत्तिका वर्णन देखना चाहिये। आजका मनुष्य कामोपभोगपरायण है। उसका लक्ष्य भौतिक उन्नति—प्रचुर परिणाममें जागतिक पदार्थोंकी प्राप्ति है। व्यक्ति और राष्ट्र सभी इसी होड़में लगे हैं। इसीका परिणाम संघर्ष, संहार, अशान्ति और दु:ख है और भौतिक उन्नतिकी दौड़में लगे हुए जगत‍्के लिये यह अनिवार्य है। परमाणु बम—जिसने क्षणोंमें लाखों हिरोशिमा-निवासियोंका विनाश कर डाला और जिसकी दानवीय शक्तिपर आज भी अमेरिका जगत‍्को आतंकित कर रहा है एवं सोवियत रूसके वैज्ञानिक जिसके आश्चर्यजनक विकासकी साधनामें संलग्न हैं, यह इस आसुरी ‘कामोपभोगपरायणता’ की देन है। भगवान‍्की दिव्यतासे रहित भौतिक उन्नति मानवको रसातलमें ले जाती है; वह उन्नति, प्रगति और विकासके मोहक नामोंपर पतनके अत्यन्त गहरे गर्तमें गिर जाता है जिससे उठनेका उसे जन्म-जन्मान्तरतक भी अवकाश नहीं मिलता, वरं उत्तरोत्तर उसे नीची-से-नीचीगतिमें जाना पड़ता है। श्रीभगवान‍्ने ऐसे ही मनुष्योंके लिये कहा है—

तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥

(गीता १६। १९-२०)

‘उन द्वेष करनेवाले, अशुभ कर्मोंमें लगे हुए, क्रूरहृदय नीच नरोंको मैं (भगवान्) संसारमें बार-बार आसुरी योनियोंमें ही गिराता हूँ। अर्जुन! वे मूढ़ लोग (आसुरी सम्पत्तिका अर्जन कर काम-क्रोधादिकी परायणतासे केवल सांसारिक भोगोंकी प्राप्ति और भोगमें लगे रहकर अपने ही हाथों अपना पतन करनेवाले मूर्ख) एक जन्मके बाद दूसरे जन्ममें—बार-बार आसुरी-योनिको प्राप्त होते हैं। मुझ (भगवान्)-को न पाकर (मनुष्यशरीरकी सच्ची सफलता भगवत्प्राप्तिसे वंचित रहकर) आसुरी-योनिसे भी अति नीच गतिको प्राप्त करते हैं।’

ऐसे लोगोंका मानव-जीवन निष्फल होकर परलोक तो बिगड़ता ही है, यहाँ भी उन्हें क्षणभरके लिये सुख-शान्तिकी प्राप्ति नहीं होती। वरं जो लोग उनके सम्पर्कमें आते हैं, उनकी भी सुख-शान्ति नष्ट होने लगती है। आजका मानव-जगत् इसी आसुरभावको प्राप्त है। जबतक वह इससे नहीं छूट जाता, जबतक भोगोंकी जगह भगवान‍्को जीवनका लक्ष्य नहीं बना लेता, जबतक भौतिक पदार्थोंसे मन हटाकर आध्यात्मिकताकी ओर प्रवृत्त नहीं हो जाता, तबतक सुख-शान्तिकी आशा करना आकाश-कुसुमके समान व्यर्थ ही है। मानवका मन जिस कालमें भगवान‍्से हट जाता है और भौतिक शक्ति-सामर्थ्य-ऐश्वर्य-वैभव-प्रभाव-प्रख्याति, विज्ञान-ज्ञान आदिकी वृद्धि हो जाती है; तब उसकी दिव्य आध्यात्मिक शक्तियाँ सुप्त-सी हो जाती हैं—उनका विकास और प्रकाश रुक जाता है। वह काल मनुष्यके लिये घोर पतनका समझा जाता है। अवश्य ही उसकी विपरीत बुद्धि इस पतनको उत्थान, इस अवनतिको उन्नति और इस विनाशको विकास बतलाती है और मूढ़ मानव इसपर गर्व भी करता है। आज यही प्रत्यक्ष हो रहा है। आजका विकासवादी मानव भौतिक उन्नतिको देखकर फूला नहीं समाता और वह अपनी उन्नतिपर गर्वोन्मत्त होकर शीघ्र ही प्रचण्डरूपसे भड़क उठनेवाले सर्वसंहारक विस्फोटकी ढेरीपर खड़ा हर्षसे नाच रहा है! वह उन्नतिका माप भौतिक पदार्थोंकी प्रचुरता और कर्मकी महान् विस्तृतिसे करता है। उसके हृदयमें जो काम-क्रोध, लोभ-मोह, द्वेष-दम्भ, मद-अहंकार, ईर्ष्या-असूया, हिंसा-प्रतिहिंसा और इनके फलस्वरूप चिन्ता-शोक, दु:ख-विषाद, अस्थिरता, अशान्तिकी भीषण आग जल रही है उसकी ओर वह नहीं देखता। यही विपरीत बुद्धिका मोह है—यही तामसी बुद्धिका स्वरूप है—

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी॥

(गीता १८। ३२)

भगवान् कहते हैं—‘अर्जुन! तमोगुणसे ढकी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म मानती है तथा अन्य भी सब अर्थोंको विपरीत (अवनतिको उन्नति, विनाशको विकास, हानिको लाभ, अकर्तव्यको कर्तव्य, अशुभको शुभ आदि) ही मानती है, वह बुद्धि तामसी है!’ और तामस मनुष्य अधोगतिको प्राप्त होते हैं—‘अधो गच्छन्ति तामसा:।’ (गीता १४। १८)

यह सब देखकर यही कहना पड़ता है कि आजका मानव-जगत् इस समय अवनतिके कालमें है और क्रमश: अवनतिकी ओर ही जा रहा है; क्योंकि बुराई पहले मनमें आती है, पीछे वह क्रियारूपमें प्रकट होती है। आजकी मानव-मनकी यह काम-क्रोधादि-परायणता ही कल विनाशका भीषण स्वरूप धारण करके क्रियारूपमें प्रकट होनेवाली है। यदि इस स्थितिमें परिवर्तन नहीं हुआ, मानव कामोपभोगके लक्ष्यको छोड़कर आध्यात्मिकताकी ओर—भगवान‍्की ओर न मुड़ा तो तीसरे राक्षसी महायुद्धके रूपमें या अन्य किसी रूपमें उसका पतन या विनाश अवश्यम्भावी है। विनाशके मुखपर बैठे हुए जगत‍्को यदि कोई शक्ति बचा सकती है तो वह केवल आध्यात्मिक शक्ति ही है। मानव-जातिके शुभचिन्तकोंको चाहिये कि वे स्वयं सावधान हो जायँ और जहाँतक उनकी आवाज पहुँचती हो, नम्रता, विनय परन्तु दृढ़ताके साथ इस आवाजको पहुँचानेका प्रयत्न करें।