जनसंख्याकी वृद्धि, अन्नकी कमी और भ्रष्टाचारमें रुकावट कैसे हो?

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला था। आपके तीनों प्रश्नोंके उत्तर संक्षेपमें नीचे लिखे जाते हैं—

(१) आप लिखते हैं कि भारतवर्षमें जनसंख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। आजसे पचहत्तर वर्ष पहले जितनी संख्या थी, उससे आज दूनी है। इसी क्रमसे जनसंख्या बढ़ती गयी तो इतना अन्न कहाँसे आवेगा तथा लोगोंके रहनेके लिये जमीन भी कहाँसे आवेगी?

इसका यथार्थ उत्तर तो यह है कि इसकी चिन्ता विश्वनियन्ता भगवान् करेंगे। वे कब कहाँ जनसंख्या घटानी-बढ़ानी है, इसकी भी व्यवस्था आप ही कर देते हैं और सबके रहने तथा पेट भरनेका साधन भी जुटा देते हैं। परन्तु बाहरी तौरपर हमारे करनेके भी कुछ उपाय हैं; उन्हें हमको तथा हमारी सरकारको करना चाहिये। वे उपाय ये हैं—

(क) जीवनमें संयम हो, एक सन्तानके बाद दूसरी सन्तान कम-से-कम छ: वर्षके पहले उत्पन्न न हो, पचास वर्षके बाद सन्तान उत्पन्न न की जाय; इसके लिये सन्ततिनिरोधके कृत्रिम साधनोंका प्रयोग न करके संयम तथा ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया जाय तो जनसंख्याकी वृद्धिमें रुकावट आ सकती है।

(ख) भारतमें अभी भी करोड़ों एकड़ भूमि बिना जोते पड़ी रहती है। उस भूमिको ठीक करके अन्न उपजाने लायक बनाया जाय और उसमें खेती की जाय। यह काम सरकार ही करा सकती है।

(२) आप लिखते हैं कि प्रतिवर्ष करोड़ों रुपयोंका अन्न विदेशसे आता है, भारतवर्षका यह अन्नसंकट कैसे मिटे?

इसका यथार्थ उत्तर तो यह है कि हमलोग भगवान‍्में विश्वास करके स्वार्थत्यागपूर्वक जीवनको यज्ञमय बना लें तो इतना अन्न उत्पन्न हो कि हमारी आवश्यकताकी पूर्तिके अतिरिक्त बहुत-सा अन्न बच रहे। हम बाहरी उपायोंको सोचते हैं, मूलपर ध्यान नहीं देते, यह हमारा दुर्भाग्य है। बाहरी उपाय भी हैं और उनमेंसे कुछ ये हैं—

(क) अन्नपरसे नियन्त्रण हटा दिया जाय और यातायातकी पूरी सुविधा हो जाय तो अन्नसंकट बहुत कुछ दूर हो सकता है। अब भी अन्न लोगोंको मिलता है। कहीं गेहूँ बहुत सस्ता है, तो कहीं बहुत ऊँचे दामपर भी नहीं मिलता। जहाँ गेहूँका राशन नहीं है ऐसे कलकत्ते-जैसे महानगरमें हजारों मन गेहूँ प्रतिदिन बिकते हैं। इससे सिद्ध होता है कि गेहूँ तो है, पर वह सरकारके आँकड़ोंमें नहीं है। बहुत सम्भव है कि सरकारी आँकड़ोंमें भूल हो। यदि सब जगह स्वतन्त्रतासे स्वाभाविक रूपसे अन्न मिलने लगे तो कुछ दिनोंमें महँगी भी दूर हो जाय और अन्न-कष्ट भी बहुत कुछ मिट जाय।

(ख) जब देशमें धर्मकी भावना थी, शास्त्रमें विश्वास था, तब लोग व्रत-उपवास करते थे। इससे अन्नकी बहुत बचत हो जाती थी। ‘कल्याण’ के पुराने अंकोंमें महात्मा नारायण स्वामीजीकी सूचना छपी थी कि महीनेमें चार उपवास (दो एकादशी, अमावस्या और पूर्णिमा) अवश्य किये जायँ। इससे पुण्यलाभ तो निश्चित होता ही है, स्वास्थ्यमें भी बड़ा लाभ होता है। पर ज्यों-ज्यों धर्म-भावना हटी, त्यों-ही-त्यों व्रत-उपवास भी घट गये। यदि अब भी धर्मके आधारपर इसका प्रचार हो जाय और यदि छत्तीस करोड़ मनुष्योंमें आधे मनुष्य भी चारों दिन उपवास करने लगें तो आज जितना अन्न विदेशोंसे आता है, उतनेकी सहज ही बचत हो सकती है। पर आज तो धर्मके नामसे ही घृणा पैदा करायी जाती है और उसे साम्प्रदायिक बताया जाता है, तब कैसे कार्य हो।

(३) आप लिखते हैं कि इतने नये-नये कानून बनाये जाने और इतना उपाय करनेपर भी घूसखोरी और चोरबाजारी बन्द नहीं हो रही है, इसके बन्द होनेका सरल उपाय क्या है?

सो इनके बन्द होनेका सरल उपाय है—धर्ममें विश्वास, भगवान्-में विश्वास। जबतक मनुष्य पापको पाप मानकर एकान्तमें भी उसके करनेमें नहीं हिचकेगा, तबतक कानूनसे पाप नहीं रोका जा सकता। दुष्कर्मसे घृणा होनी चाहिये, तभी मनुष्य उससे बचता है। उसमें गौरव-बुद्धि हो जाय तब तो कोई उपाय ही नहीं है। ऐसी हालतमें कानून मानने और मनवानेवाले स्वयं ही कानून तोड़नेका रास्ता निकाल लेते हैं और किताबोंमें कानूनके रहते और कहीं-कहीं, जहाँ परस्पर मेल न हो सकता हो—कानूनी कार्यवाही होते रहनेपर भी पाप बन्द नहीं होता। इसके लिये आवश्यक है धर्म और भगवान‍्में विश्वास हो, दुष्कर्मसे घृणा और भय हो। आज ये दोनों ही बातें बुरी तरह घट रही हैं। तब क्या उपाय है। इसका तो यही उपाय होगा कि पाप करते-करते मनुष्य जब गिर जायगा और पापके अनिवार्य परिणाम भीषण सन्तापको प्राप्त होगा तब उसे चेत होगा—तभी भगवत्कृपासे मानव-जातिका यह महान् संकट दूर होगा।

असलमें सारी विपत्तियोंके नाशका एकमात्र उपाय है ‘सच्चे मनसे भगवदाश्रय’। भगवान् कहते हैं—

मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।