जनसेवा या स्वार्थसेवा
आपका कृपापत्र मिला। वास्तवमें आजकलके जगत्में स्वार्थपरता बहुत अधिक बढ़ गयी है। देशसेवा, समाजसेवा, धर्मसेवा, भगवत्सेवा और निष्काम प्रेम आदि किसी भी नामपर आजका मनुष्य प्राय: अपने व्यक्तिगत प्रयोजनको ही मुख्यरूपसे सामने रखता है। इसीलिये सत्यानुरागके बदले मिथ्यानुराग बढ़ चला है। अफसर हों या नेता, व्यापारी हों या मजदूर, जमींदार हों या किसान, सभी जगह अपनी ही ओर दृष्टि है। सभी लेना चाहते हैं, देना कोई नहीं चाहता। सुखपूर्वक देना वहीं सम्भव होता है, जहाँ प्रेम होता है। प्रेम ही नीच स्वार्थका नाश करता है। प्रेम वास्तवमें होता है प्रेमके लिये ही। प्रेमका प्रयत्न होनेपर भी जहाँ वस्तुत: व्यक्तिगत प्रयोजनकी प्रधानता होती है, वहाँ प्रेमका प्रकाश नहीं होता। आज प्राय: सभी जगह अभिनय है; सच्चा अनुराग नहीं है। इसीलिये जो कुछ होता है, दिखावेके लिये होता है, अन्तरात्मासे नहीं।
जो देशप्रेमी हैं, जिनका हृदय देशकी दुर्दशापर रोता है, वे जिस किसी भी उपायसे देशका कल्याण चाहेंगे; वे यह क्यों चाहेंगे कि जनताको अपनी ओर खींचकर हम उसका नेतृत्व करें। सच्चा पुरुष किसी भी भय या प्रलोभनसे अपने सत्य पथसे नहीं डिग सकता। परन्तु जो प्रलोभनमें पड़कर ही किसी तरहका स्वाँग बनाते हैं, उनसे किसी भी क्षेत्रमें वास्तविक कल्याणकार्य नहीं हो सकता। कभी-कभी श्मशान-वैराग्यकी भाँति मनमें सचमुच ही जनसेवाकी इच्छा हुआ करती है और उस समय जनसेवाके लिये व्यक्तिगत रूपसे भी कर्म-क्षेत्रमें उतरना उत्तम है; परन्तु केवल नेता बननेकी इच्छासे जनताको जिस किसी मार्गमें ढकेल देना नीच स्वार्थ ही नहीं है वरं पाप भी है। जो सच्चे जनसेवक होते हैं, वे न तो मिथ्या प्रचार करते हैं, न किसी भिन्न मत रखनेवालेके प्रति जहर उगलते हैं, न अनुचितरूपसे—भय या लोभ देकर किसीका मुख बन्द करना चाहते हैं, न दूसरेकी युक्तियोंको सुनने और उनपर विचार करनेमें आनाकानी करते हैं और न छल-प्रपंचका आश्रय लेकर अपने नेतापनके स्वाँगको ही बनाये रखना चाहते हैं। जो लोग ऐसा करते हैं, वे जनसेवक नहीं हैं, वे यथार्थमें स्वार्थके गुलाम हैं।
उद्देश्य कितना ही ऊँचा हो, पर मनुष्य जबतक स्वयं ऊँचा नहीं होता, तबतक उसके उद्देश्यकी सिद्धि नहीं हो सकती। जिसके मनका जैसा भाव होता है, वैसा ही उसका स्वरूप होता है—
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स:।
(गीता १७। ३)
—और जैसा स्वरूप होता है, उसीके अनुसार क्रिया होती है। इसीलिये मनुष्य कई बार अपनेको महान् उद्देश्यका साधक मानकर अपने भावानुसार उद्देश्यके विपरीत कार्य कर बैठता है और आप ही अपनेको धोखा देकर गिर जाता है। अतएव मनुष्यको चाहिये वह पहले ही नेता, पथप्रदर्शक या गुरु आदि न बनकर अपनेको ऐसा बनावे जिसमें उसके अन्दर आदर्श सद्गुणोंका और महान् ऊँचे चरित्रका विकास हो। फिर यदि स्वाभाविक ही जनता उसको नेता मान ले और उसका पदानुसरण करने लगे तो हानि नहीं है। दोष यही है, हमलोग दूसरोंको ऊँचा बनाने जाते हैं, पर स्वयं ऊँचा बनना नहीं चाहते। मनुष्य निर्माण करना चाहते हैं, पर अपनेमें मनुष्यत्वका विकास नहीं करते। इसीसे जिनको अपने पीछे चलाना चाहते हैं, अपनी दुर्गतिके साथ उनकी भी दुर्गति ही करते हैं। भगवान्से प्रार्थना करें कि वे हमें ऐसी आत्मशुद्धि और आत्मशक्ति प्रदान करें जिससे हम सच्चे मनुष्यत्वको प्राप्त हों और क्षुद्र स्वार्थको छोड़कर, आसक्तिरहित होकर, स्वमतप्रतिष्ठाके लिये नहीं—परन्तु प्रेमके आकर्षणसे केवल ईश्वर-प्रीत्यर्थ ही कर्म करें। फिर चाहे हम किसी क्षेत्रमें हों, हमारे कर्म सत्यज्ञानके मूलस्रोतसे निकले हुए सत्यस्वरूप होंगे और उनसे हमारा और जनताका भी निश्चित कल्याण होगा।