जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपने अद्वैत-वेदान्तानुसार ब्रह्म और जगत्का स्वरूप, विवर्त्तका भावार्थ, जीवन्मुक्तिका स्वरूप तथा जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिके भेदके सम्बन्धमें पूछा सो आपकी कृपा है। ब्रह्मका स्वरूप अनिर्वचनीय है, वाणीसे उसका वर्णन नहीं हो सकता तथापि आपके अनुरोधवश शास्त्र तथा सन्तोंसे सुने हुए वचनोंके आधारपर संक्षेपमें कुछ लिखनेका प्रयास करता हूँ। वस्तुत: यह विषयसाधन सापेक्ष है और अधिकारी पुरुष ही इसे समझ और समझा सकते हैं। जो नित्य सत्य चिदानन्द-स्वरूप है; जो सर्वथा अबाध्य और अद्वितीय है; जिसमें सजातीय, विजातीय या स्वगत कोई भेद नहीं है; जो भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें एवं जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय चारों अवस्थाओंमें सम और एकरूप है; जो सबका आश्रय, ज्ञाता, प्रकाशक और आधार है—वह एक नित्य सत् चेतन पदार्थ ब्रह्म है। ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ आदि कहकर श्रुतियोंने उसीका संकेत किया है और उसीकी प्राप्तिमें मानवजीवनकी चूडान्त सफलता मानी गयी है।
वेदान्तके सिद्धान्तानुसार यह ब्रह्म एकमात्र सत्य है और जगत् असत् है। जगत्-रूपसे प्रतीत होनेवाला जो कुछ है सो मायाका विलासमात्र है। निर्विशेष निर्विकार एकमात्र चैतन्यघन ब्रह्म ही अघटनघटनापटीयसी मायाके प्रभावसे सविशेष विकारी और अनेक रूपोंमें दिखायी पड़ता है। मैं-तुम, मेरा-तेरा, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-पर्वत, देव-असुर आदि अपार दृश्यमान समस्त प्रपंच मायाका ही विस्तार है, इस मायाके वशमें होकर ही जीव बद्धदशाको प्राप्त है। भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने श्रीलक्ष्मणजीसे कहा है—
मैं अरु मोर तोर तैं माया।
जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥
गो गोचर जहँ लगि मन जाई।
सो सब माया जानेहु भाई॥
ब्रह्ममें जगत् वैसे ही कल्पित है जैसे रस्सीमें सर्प; रस्सीसम्बन्धी अज्ञानके कारण जैसे रस्सी ही सर्पकी उत्पत्ति, स्थिति और लयका आधार है, ठीक वैसे ही ब्रह्मसम्बन्धी अज्ञानके प्रभावसे ब्रह्मरूप अधारमें ही जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी प्रतीति होती है। इस मिथ्या प्रतीतिका नाम ही ‘विवर्त्त’ है। ‘अतत्त्वतोऽन्यथा प्रथाविवर्त्त इत्युदाहृत:।’ वस्तुके स्वरूपमें किसी प्रकारका परिवर्तन न होकर उसकी दूसरे रूपमें प्रतीति हो, इसे ‘विवर्त्त’ कहते हैं। ब्रह्म जगत्-रूपमें परिवर्तित नहीं होता, मायाके प्रभावसे ब्रह्ममें जगत्की भ्रान्ति प्रतीति होती है, जैसे स्वप्नमें स्वप्नद्रष्टा पुरुष अपने ही संकल्पसे स्वप्न-जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लय देखता है, वस्तुत: वह सब कुछ उसी स्वप्नद्रष्टा पुरुषमें उसीसे और उसीको दीखता है, अन्य कुछ भी नहीं है, वही एकमात्र उसका आश्रय और ‘अभिन्ननिमित्तोपादानकारण’ है वैसे ही यह जगत् भी जगद्द्रष्टा ब्रह्ममें दीखता है। वस्तुत: उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। निद्राके प्रभावसे जैसे स्वप्नद्रष्टा पुरुष अपने एकमें ही अनेककी कल्पना करता है वैसे ही अज्ञानके प्रभावसे ब्रह्म ही जीवरूपसे अपने एकमात्र स्वरूपमें अनेककी कल्पना करता है। जैसे मरुभूमिमें वास्तविक जल न होनेपर भी जलकी तथा सीपमें वस्तुत: चाँदी न होनेपर भी चाँदीकी भ्रान्ति होती है; वैसे ही अद्वितीय ब्रह्ममें अज्ञानवश जगत्की प्रतीति होती है। तत्त्वत: जगत् नहीं है— एकमात्र ब्रह्म ही परमार्थ-सत्य है। परन्तु अज्ञानके कारण चेतन जीवको जगत्की सत्-प्रतीति होती है और इसीसे वह बन्धनमें जकड़ा हुआ है। यह बन्धन अनादि है; क्योंकि माया भी अनादि है। वस्तुत: स्वभावसे तो यथार्थरूपमें जीव भी मुक्त ही है।
तो फिर जीवकी मुक्ति या ब्रह्मकी प्राप्तिसे क्या तात्पर्य है? वह तात्पर्य इतना ही है कि जीवको जो ब्रह्मसे पृथक्त्व एवं बद्धताका भ्रम हो रहा है, सद्गुरु, शास्त्र और भगवत्कृपासे साधन करनेपर इस भ्रमका मिट जाना और तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो जाना ही उसकी मुक्ति या उसे ब्रह्मकी प्राप्ति होना है। जीवको ब्रह्मकी प्राप्ति होती नहीं, वह तो ब्रह्मस्वरूप ही है, उसे तो स्वरूपत: नित्य ही ब्रह्म प्राप्त है। इस नित्य प्राप्तिमें जो अप्राप्तिका भ्रम हो रहा है, उसको मिटा देना है। इस भ्रमका मिट जाना ही ब्रह्मकी प्राप्ति है। जैसे कोई राजकुमार प्रारब्धवश जन्मकालमें ही मातासे बिछुड़कर साधारण ग्रामीण लोगोंमें पले और अपने राजकुमारत्वको भूलकर अपनेको साधारण ग्रामीण मानता रहे, पर जब उसे किसी जानकारके बतानेसे अपने स्वरूपका ज्ञान हो तब वह अपनेको राजकुमार समझे—यद्यपि वह था तो पहले भी राजकुमार ही। इसी प्रकार अज्ञान नाश होनेपर जो स्व-स्वरूपका प्रकाश होता है, उसीको मुक्ति कहते हैं।
मायाशक्ति परमेश्वरका स्वभाव है। स्वभाववश जो कुछ होता है ‘उसमें वह क्यों हुआ?’ यह प्रश्न ही नहीं होता। स्वभावमें किसी दूसरे प्रयोजनकी कल्पना नहीं होती। इसी प्रकार मायाशक्ति सृष्टिकर्ता परमेश्वरका स्वभाव होनेसे—बस, स्वाभाविक ही जगत्का प्रकाश होता है। इसीलिये भगवान् व्यासने ब्रह्मसूत्रमें ‘लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्’ कहकर इस जगत्के निर्माणकी मीमांसा की है।
विचार (नित्यानित्यवस्तुविवेक), वैराग्य (इस लोक और परलोकके दृष्ट-अदृष्ट समस्त भोगोंसे विरति), षट् सम्पत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान) एवं मुमुक्षुत्व (संसार-बन्धनसे छूटनेकी अत्यन्त तीव्र इच्छा)—इस साधनचतुष्टयसे सम्पन्न अधिकारी पुरुष जब शास्त्र, गुरु और भगवत्कृपासे जीवित दशामें ही ब्रह्मके सत्-स्वरूपको, जगत्के असत्-स्वरूपको तथा जीवके परमार्थत: ब्रह्म-स्वरूपको सम्यक् प्रकारसे जान लेता है एवं समस्त दृश्यप्रपंचको ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’, ‘ब्रह्मैवेदं सर्वम्’, ‘वासुदेव: सर्वमिति’ आदि श्रुति-स्मृतियोंके वचनानुसार ब्रह्मस्वरूप अनुभव करके योगारूढ़-अवस्थाको प्राप्त हो जाता है अर्थात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके साथ एकात्मताका प्रत्यक्ष अनुभव कर पाता है, तब उस पुरुषको ‘जीवन्मुक्त’ कहते हैं।
ऐसी अवस्थामें उसके समस्त कर्मबन्धन कट जाते हैं—आग लग जानेपर जैसे समस्त संगृहीत द्रव्य जलकर खाक हो जाते हैं, वैसे ही जीवन्मुक्त पुरुषकी ज्ञानाग्निके द्वारा उसकी सम्पूर्ण कर्मराशि जलकर भस्म हो जाती है। ‘ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा’ (गीता ४। ३७)।
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया:।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
(मुण्डक० २। २। ८)
अर्थात् उस परावर परमात्माका साक्षात्कार हो जानेपर जड-चेतनकी एकात्मतारूप हृदयकी गाँठ टूट जाती है। जड देहादिमें होनेवाले आत्माभिमान तथा समस्त संशयोंका नाश हो जाता है और सम्पूर्ण कर्म कर्मबीजसहित नष्ट हो जाते हैं। इस श्रुतिवाक्यके अनुसार उसके समस्त कर्मोंका क्षय हो जाता है। संचित कर्म (पूर्वकृत संगृहीत कर्मराशि) गोदाममें आग लग जानेपर गोदाममें संगृहीत वस्तुओंकी भाँति जल जाते हैं; क्रियमाण (नवीन कर्म) भुने हुए बीजोंकी भाँति कर्मसंस्कार उत्पन्न नहीं कर सकते और प्रारब्ध (इस जीवनमें भोगके लिये अपना कार्य आरम्भ कर चुके हुए) कर्म भी शरीरमें अहंता और भोगोंमें भोक्तापनकी सत्ता न रहनेसे जीवन्मुक्त पुरुषको कोई सुख-दु:ख नहीं पहुँचा सकते। इस प्रकार तीनों प्रकारके कर्मोंसे मुक्त पुरुष ही ‘जीवन्मुक्त’ है। यह जीवन्मुक्त पुरुष संसारमें संसारके सुख-दु:खसे वैसे ही अलिप्त रहता है जैसे जलमें कमल।
प्रारब्धकर्मके शेष रहनेतक देहपात नहीं होता, इसीसे वह ‘जीवन्मुक्त’ है और प्रारब्ध क्षय होनेपर देहपात होते ही वह ब्रह्ममें मिल जाता है, अज्ञानजनित कर्मबीज न रहनेसे उसका सूक्ष्म और कारणदेह नष्ट हो जाता है और उसके प्राण कहीं उत्क्रमण नहीं करके वहीं अपने तत्त्वमें विलीन हो जाते हैं। इससे उसको ‘विदेहमुक्त’ कहते हैं।
स्वरूपत: ‘जीवन्मुक्ति’ और ‘विदेहमुक्ति’ में कोई भेद नहीं है। वह जीवन्मुक्ति वस्तुत: मुक्ति ही नहीं है, जिसमें कुछ करना शेष रह जाता हो। जैसे तरंगोंसे लहराता हुआ जल भी जल है और तरंगहीन स्थिर जल भी जल है, वैसे ही संसारमें कर्म करके दीख पड़नेवाला ‘जीवन्मुक्त’ पुरुष भी मुक्त है और देहपात होनेपर संसारसे सर्वथा रहित ‘विदेहमुक्त’ पुरुष भी मुक्त ही है।
यह जगत्के जीवोंका बड़ा सौभाग्य है कि प्रारब्ध शेष होनेके कारण जीवन्मुक्त पुरुषोंका लोकदृष्टिमें जगत्में रहना होता है। उनके रहनेमात्रसे ही जगत्का अशेष उपकार होता है और जो सौभाग्यशाली लोग श्रद्धापूर्वक उनके शरीरोंका दर्शन, स्पर्श और उनके साथ सम्भाषणादि कर पाते हैं, वे तो साधन करनेपर बहुत ही सुगमतासे कर्मबन्धनको काटनेमें समर्थ होते हैं।
पर ‘ब्रह्म’ ही भगवान्का एकमात्र स्वरूप नहीं है तथा कर्मबन्धन काटकर पारमार्थिक नित्य आनन्दकी उपलब्धिका मार्ग भी केवल यही एक नहीं है। यह स्मरण रखना चाहिये।
यह आपके प्रश्नोंका संक्षिप्त उत्तर है, इससे आपका कुछ समाधान होगा तो आनन्दकी बात है। न होनेपर भी आनन्द ही है। आपके पत्रका उत्तर लिखनेमें इस विषयका कुछ पवित्र मनन हुआ, इसके लिये मैं आपका कृतज्ञ हूँ। साधुवाद स्वीकार करें।