कानूनके द्वारा पापको प्रोत्साहन
आपका पत्र मिला। आपका लिखना यथार्थ है। इस समय उच्छृंखलता और स्वेच्छाचारिता बढ़ती जा रही है और भले-भले लोगोंके द्वारा भी ‘प्रगति’, ‘सुधार’ और ‘व्यक्ति-स्वातन्त्र्य’ के नामपर इस कुप्रवृत्तिको प्रोत्साहन दिया जा रहा है। मेरी ऐसी धारणा है कि स्त्रियोंकी अपेक्षा पुरुषोंका मन अधिक दुराचारी है, परन्तु मालूम होता है कि अब स्त्रियाँ भी इस पापके क्षेत्रमें किसीसे पीछे नहीं रहना चाहतीं। गत दो-तीन साल पहलेकी बात है—दिल्लीकी विधानसभामें एक महिलाने कहा था कि ‘हमपर सतीत्व क्यों थोपा जा रहा है।’ सन् १९४७ में बम्बईमें एक सुधारक महिलाके द्वारा प्रस्तावित तलाकसम्बन्धी कानून पास हुआ था; उसके द्वारा स्त्रियोंको व्यभिचारकी कितनी सुविधा मिलती है, इसका एक ताजा उदाहरण बम्बई हाईकोर्टका एक फैसला आपके सामने है। श्रीरंग सखाराम गायकवाड़ नामक एक व्यक्तिने उक्त कानूनके अनुसार अपनी पत्नी सुलोचनाको व्यभिचारिणी होनेके कारण तलाक देना चाहा और अदालतमें यह सिद्ध कर दिया कि उस स्त्रीका चार पर-पुरुषोंके साथ अनैतिक सम्बन्ध था। पर बम्बई हाईकोर्टके न्यायाधीश श्रीकोयाजीने तलाककी आज्ञा नहीं दी और निर्णय किया कि ‘चार पर-पुरुषोंके साथ व्यभिचार करनेवाली स्त्री दुराचारिणी तो है; परन्तु इसको वेश्या-व्यवसाय नहीं माना जा सकता और न इस आधारपर तलाक ही दिया जा सकता है। वेश्या-व्यवसायका अर्थ है पैसा लेकर सर्व साधारणके साथ सम्बन्ध स्थापित करना।’
—(‘सन्मार्ग’, काशी)
इस निर्णयसे आजके सुधारक प्रवृत्तिके नर-नारियों और कानून-प्रवर्तकोंकी मनोवृत्तिका प्रत्यक्ष परिचय मिलता है। कहाँ तो भारतीय नारीका अनुपम सतीत्व और उसके लिये सर्वस्व-त्यागकी सहज प्रतिज्ञा एवं कहाँ कानूनके द्वारा व्याभिचारकी छूट! इससे सिद्ध है कि हमारा समाज इस समय व्यवस्थापूर्वक पतनकी ओर जा रहा है। इससे बचनेके लिये बाहरी उपाय तो करने चाहिये; परन्तु सर्वोत्तम उपाय एक यह है कि धर्मकी रक्षा करनेवाले सर्वसमर्थ श्रीभगवान्से प्रार्थना की जाय। वे कृपा करके अधर्मको धर्म बतानेवाली हमारी तामसी बुद्धिको बदल देंगे तो सब कुछ आप ही ठीक हो जायगा!
आपने जो समस्या लिखी, उसका किसी प्रकार साम-दामके द्वारा समझा-बुझाकर घरमें ही समाधान कर लीजिये। बात बढ़ानेमें कोई लाभ नहीं प्रतीत होता। अभी तो सर्वथा मामूली-सी बात है। बढ़ानेपर यदि बात बड़ी हो जायगी और परिस्थिति हाथसे निकल जायगी तो फिर बहुत बड़ी कठिनता होगी। इसका भी सर्वांगसुन्दर उपाय मेरी समझसे तो भगवत्प्रार्थना ही है। आप कातरभावसे भगवान्से प्रार्थना कीजिये—श्रद्धा और विश्वासपूर्वक। सर्वसमर्थ भगवान् चाहेंगे तो तमाम वातावरण क्षणोंमें बदल जायगा और आपका संकट बड़ी सरलतासे टल जायगा। इसमें जरा भी सन्देह मत कीजिये।