कष्टसे छूटनेका अमोघ उपाय
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपके कष्टोंका समाचार पढ़कर खेद हुआ। मैं चाहता हूँ आपके कष्ट दूर हों और आप सारे अभावोंसे मुक्त हो जायँ। मेरे वशकी बात होती तो मैं आपको कष्टमुक्त करनेमें बहुत ही सुखका अनुभव करता; परन्तु यह मेरे वशकी बात नहीं है। मनुष्यको जो इस शरीरमें सुख-दु:ख प्राप्त होते हैं, वे अपने ही पूर्वजन्मोंमें किये हुए अच्छे-बुरे कर्मोंके फल हैं। इसीका नाम प्रारब्ध है। भगवान्के सिवा दूसरा ऐसा कौन है जो प्रारब्धकी गतिको रोक सके या उसको मिटा सके। आपको आर्तभावसे भगवान्को पुकारना चाहिये और विश्वासपूर्वक उनसे प्रार्थना करनी चाहिये। भगवान् सब कुछ कर सकते हैं और वे स्वाभाविक ही आपके परम सुहृद् हैं। आप उनकी कृपा और सुहृदतापर विश्वास करके उनका स्मरण कीजिये और उनको अपने कष्टोंकी कथा सुनाइये। यह एक ऐसा अमोघ साधन है जो अनायास ही सब प्रकारके संकटोंसे छुटकारा दिला सकता है। भगवान्ने स्वयं कहा है—
मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
(गीता १८। ५८)
‘मुझमें चित्त लगा लो, फिर मेरी कृपासे तुम सारी कठिनाइयोंको पार कर जाओगे।’
भगवान् शरणागतवत्सल हैं। वे शरणागतका कभी त्याग नहीं करते, न उसके पूर्वकर्मोंको ही देखते हैं। उनका व्रत ही है शरणागतको निर्भय करना— ‘मम पन सरनागत भयहारी।’ अन्य सारे साधन विफल हो सकते हैं पर यह कभी विफल नहीं होगा। यह अमोघ है पर इसमें मुख्य बात है विश्वासकी। विश्वास होना चाहिये और होनी चाहिये निष्कपट हृदयकी आर्त पुकार। मैं तो आपसे यही कहता हूँ कि आप सब ओरसे सब आशा-भरोसा छोड़कर केवल सर्वसमर्थ प्रभुके शरणापन्न हो जाइये। फिर आपको आश्चर्यजनक रूपमें अपनी स्थितिमें परिवर्तन दिखायी देगा। अपने-आप ही ऐसे संयोग बन जायँगे, जो आपके संकटों और कष्टोंके मिटानेमें समर्थ होंगे।
जहाँतक बने नित्य-निरन्तर भगवान्के नाम-जपका अभ्यास कीजिये। जितना ही नाम-जप गहरा होगा, उतना ही लाभ अधिक होगा। साथ ही, श्रीमद्भागवतके अष्टम स्कन्धके तीसरे अध्याय—गजेन्द्र-स्तवनका विश्वासपूर्वक आर्तभावसे प्रतिदिन पाठ कीजिये। आप यदि ऐसा करेंगे तो, मेरा विश्वास है, आपके संकट अवश्य दूर हो जायँगे।