मान-बड़ाईसे बचिये

आपका पत्र मिला था। इधर काम-काज बहुत अधिक रहा, इससे समयपर उत्तर नहीं दिया जा सका। मनुष्यमें यह एक बड़ी दुर्बलता है कि वह अपनी बड़ाई सुनकर प्रसन्न हो जाता है और अपनी वास्तविक स्थितिको भूलकर अपने सम्बन्धमें लोगोंकी मिथ्या उच्च धारणाको स्वीकार कर लेता है। आप सोचिये तो, किसी कंगालको यदि दूसरा कोई पुरुष या समाजके बहुसंख्यक लोग भी बड़ा धनी मानकर उसकी प्रशंसा करने लगें तो इससे क्या वह धनी हो जाता है? दूसरोंकी प्रशंसासे उसे क्या लाभ हुआ? इसी प्रकार हमारे अन्दर यदि सद‍्गुण नहीं हैं, हमारे हृदयमें यदि प्रभुके प्रति निष्काम प्रेम नहीं है, हमारे पास यदि भगवान‍्के भजनका परम धन नहीं है और लोग हमें बड़ा सद‍्गुणसम्पन्न, बड़ा प्रेमी और बड़ा भजनानन्दी मानते हैं तो इससे हमें क्या मिल गया और हमारा क्या उपकार हो गया? और यदि इसको हम स्वीकार कर लेते हैं तो अपनेको धोखेमें डालनेके अतिरिक्त और क्या करते हैं। इस झूठी बड़ाई तथा मिथ्या सम्मानके बोझको उठाकर हम सिवा बोझसे मरनेके और कुछ भी तो नहीं पा सकेंगे।

बड़ाई तथा सम्मान यदि सच्चे गुणोंको लेकर भी हों, तो भी साधकके लिये उनका स्वीकार करना परम हानिकर है। जहाँ मान-बड़ाईमें मिठास आया (और वह आता ही है), वहीं हमारी क्रियामेंसे वास्तविकता निकल जायगी और हम वही काम करने लगेंगे, जिसमें हमें लोगोंके द्वारा सम्मान मिले एवं लोग हमारी प्रशंसा करें। मतलब यह कि फिर हमारे कार्य सत्यकी सेवा—प्रभुकी भक्तिके लिये न होकर केवल लोकरंजनके लिये होंगे, फिर वे चाहे अकार्य या अधर्म ही क्यों न हों और उनसे परिणाममें हमारा परम अकल्याण ही क्यों न होता हो। इसलिये साधकको चाहिये कि वह सदा सचेत रहे और मान-बड़ाईका दूरसे ही त्याग करता रहे। उन्हें पास भी न आने दे। साधकका आचरण विषयी पुरुषसे सर्वथा प्रतिकूल होना चाहिये तभी उसे साधनामें सिद्धि मिलती है और तभी वह सिद्धावस्थाके समत्वमें स्थित होता है। विषयी मान-बड़ाईका भूखा रहता है और इन्हें पानेके लिये कोई भी अकार्य करनेको तैयार रहता है। पर साधक मान-बड़ाईको विषवत् मानकर उनका त्याग करता है तथा अपमानके योग्य किसी भी निन्दनीय कार्यको न करता हुआ भी अपमान और निन्दाको अपने लिये शुभ समझता है एवं बड़ी प्रसन्नतासे इनका वरण करता है। वही जब सिद्ध-अवस्थामें पहुँच जाता है, तब उसके लिये मानापमान और निन्दा-स्तुति समान हो जाते हैं। अपने प्रिय भक्तोंका लक्षण बतलाते हुए भगवान् उन्हें मानापमानको तथा निन्दा-स्तुतिको समान माननेवाले बतलाते हैं। ‘मानापमानयोस्तुल्य:’, ‘तुल्यनिन्दास्तुति:।’ (गीता १४, १२ अध्याय)

आपकी जो बड़ाई हो रही है तथा आपको जो सम्मान मिल रहा है, आप इनको अपनी साधनाका विघ्न मानिये। भजन तो खूब कीजिये और भी बढ़ाइये, परन्तु मान-बड़ाईको तनिक भी पास मत फटकने दीजिये। इसीलिये भक्तलोग अपने भजन-धनको बहुत छिपाकर रखा करते हैं, वैसे ही जैसे सम्भ्रान्त कुलकी कोई नारी जारके प्रेमको गुप्त रखती है। पर यदि अब आपके लिये ऐसा सम्भव न हो तो आप मान-बड़ाईको स्वीकार मत कीजिये। सम्भव हो तो लोगोंको नम्रता और विनयके साथ रोकर समझा दीजिये कि ‘जब आपलोग मेरे हितैषी हैं, मेरा पतन नहीं चाहते हैं और कल्याण ही चाहते हैं, तब फिर मुझे मान-बड़ाई देकर मेरा अकल्याण क्यों कर रहे हैं। मेरे पतनका मार्ग क्यों प्रशस्त कर रहे हैं।’ और यदि वे मान जायँ तो बहुत ही अच्छी बात है। परन्तु यहाँ भी बहुत सावधानीकी आवश्यकता है। कहीं-कहीं ऐसा भी होता है कि मनको तो मान-बड़ाई प्रिय लगते हैं और उन्हें प्राप्त करनेकी लालसा भी रहती है; परन्तु ऊपरसे उनका विरोध किया जाता है, वह इस अभिप्रायसे कि ऐसा करनेपर लोगोंकी यह धारणा होगी कि ये कितने अच्छे पुरुष हैं, जो मान-बड़ाईको सर्वथा नहीं चाहते और इसके लिये इतने दु:खी होकर—रो-रोकर प्रार्थना करते हैं—और फलत: वे पहलेसे भी अधिक सम्मान और प्रशंसा करने लगेंगे।

मनके इस दुर्भावकी परीक्षा दूसरे सहजमें नहीं कर पाते—यह तो स्वयं आपके ही देखनेकी चीज है। आप अपने मनसे मान-बड़ाईको सचमुच बुरा समझने लगें और जैसे किसीके द्वारा आदरपूर्वक दिये जानेपर भी बुद्धिमान् मनुष्य अपने लिये हानिकर और घृणित वस्तुको स्वीकार नहीं करते, वैसे ही मान-बड़ाईको स्वीकार न करें। फिर यदि कहीं कोई आपका सम्मान कर भी देगा, बड़ाई कर भी देगा तो उससे आपकी हानि नहीं होगी। यद्यपि साधकको इससे बचना ही चाहिये, क्योंकि यह मीठा विष है और है अत्यन्त आकर्षक। समझता हुआ भी मनुष्य मोहवश इसे स्वीकार कर लेता है। इसीलिये कोई-कोई सन्त जान-बूझकर ऐसी चेष्टा किया करते हैं कि जिससे लोगोंके हृदयोंमें उनके प्रति जो सम्मानकी भावना होती है, वह नष्ट हो जाय। यह तो सच्चे सद‍्गुणोंके लिये प्राप्त होनेवाले सम्मान और प्रशंसाके लिये बात हुई। जहाँ बिना ही किसी सद‍्गुणके कोई अपनी बड़ाई या सम्मान करे और उसे हम स्वीकार कर लें तो यही समझना चाहिये कि या तो हम महामूर्ख हैं, या हममें किसी अंशमें दम्भ आ गया है जो हमारा पतन करके छोड़ेगा। मैं मानता हूँ— आपमें सद‍्गुण हैं और लोग आपका जो सम्मान तथा प्रशंसा करते हैं, वे सम्भवत: सद्भावसे ही करते हैं तथापि उन्हें स्वीकार करना न तो आदर्श है और न आपके लिये तनिक भी लाभदायक ही है। हानिकारक तो प्रत्यक्ष ही है। मान-बड़ाईको सुनकर मनुष्यमें कहीं अपने सम्बन्धमें यथार्थसे अधिक उच्च धारणा हो गयी कि वह डूब गया। फिर उसमें अनेक दोष अपने-आप ही आ जायँगे।

असलमें मनुष्यको चाहिये कि वह नित्य-निरन्तर अपनेको देखता रहे—मैं किस ओर जा रहा हूँ, मेरे पास कितना धन है, मैं किस स्थितिमें हूँ। और यह सब भलीभाँति देखकर जैसा अपनेको पावे, वैसा ही समझे और दोष हों तो उन्हें स्पष्ट व्यक्त कर दे, एवं कदाचित् कुछ गुण हों तो उन्हें छिपा ले तथा अपनेसे अधिक सद‍्गुणवालोंकी ओर देखकर— अनन्त अपार कल्याणगुण-सागर श्रीभगवान‍्के गुणोंका स्मरण कर अपनेको तुच्छ समझे, मनमें जरा भी अभिमानका अंकुर न उत्पन्न होने दे। इसीमें उसका कल्याण है।

धनी तो मनुष्य धन होनेपर ही हो सकता है, लोगोंके कहनेसे नहीं हो सकता। इसलिये मनुष्यको नित्य-निरन्तर भजनरूपी धनको बढ़ाना चाहिये और उसके लिये उत्तरोत्तर लोभ भी अधिक-से-अधिक करना चाहिये। विषयोंका लोभ जितना हानिकारक है उतना ही भजनका लोभ महान् लाभदायक है। काम-क्रोध-लोभ-मोह आदि दुर्गुण भी यदि भगवान‍्से सम्बद्ध हो जाते हैं तो सद‍्गुण बन जाते हैं।

कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।

नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥

(श्रीमद्भा० १०। २९। १५)

‘काम, क्रोध, भय, स्नेह, ऐक्य और सौहार्द—इनमेंसे कोई भी भाव भगवान् श्रीहरिके साथ जोड़ दिया जाय तो फिर वह भाव भगवद्‍रूप ही हो जाता है।’

मेरे इस पत्रसे आपको कुछ भी सत्-प्रेरणा मिली तो आप उसे भगवान‍्की कृपा समझिये। मैं तो निमित्तमात्र हूँ।