मन्त्र और मूर्तिपूजा
सादर हरिस्मरण। .........ॐ नमो नारायणाय’, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप कर सकते हैं और सभी जप स्नानादिके बाद शुद्धतापूर्वक ही करने चाहिये। वैश्यगायत्री मुझे मालूम नहीं है। वह ब्राह्मण-गायत्रीसे भिन्न तो होगी ही। परन्तु मेरे विचारसे तो जिसे ब्राह्मण-गायत्री कहते हैं, उसीको यज्ञोपवीत-संस्कारयुक्त तीनों वर्णवालोंको जपना चाहिये। गायत्रीके जो अनेक भेद किये गये हैं, वे प्राचीन नहीं हैं, पीछेके महानुभावोंने किये हैं, ऐसा प्रतीत होता है।
इस मन्त्रको मूलमन्त्र कहते हैं। रामायणमें राम-नामको ही मूलमन्त्र कहा गया है। इसीका जप श्रीशंकरभगवान् करते हैं।
इष्ट-मूर्तिमें धातु-बुद्धि नहीं होनी चाहिये। उसे साक्षात् इष्टदेव ही समझना चाहिये। मूर्तिमें ऐसा भाव होना साधनमें उत्कर्षका चिह्न नहीं है। यह तो अपराध ही है। हमारा शरीर प्रत्यक्ष ही हड्डी-मांसका बना हुआ है। परन्तु इसमें तो हमारी यह बुद्धि नहीं होती। यदि ऐसी बुद्धि हो तो इसके मानापमानसे हमें क्यों दु:ख हो। इसे सजानेकी हमें क्यों इच्छा हो। फिर भगवत्-प्रतिमामें ऐसा भाव होना किस प्रकार उचित हो सकता है। उसे भी भगवान्का शरीर ही समझना चाहिये। वैदिक मन्त्रोंद्वारा उसमें प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है, तबसे भगवान् उसमें सर्वदा निवास करते हैं। इससे आगेकी बात तो यह है कि सभीको भगवद्रूप समझें। संसारमें जड कोई भी वस्तु न रहे। सारे संसारके रूपमें श्रीभगवान् ही क्रीडा कर रहे हैं। इस प्रकार जिसे चर-अचर सभी जीवोंमें भगवद्बुद्धि हो जाती है, उसको अपने लिये अलग प्रतिमा-पूजनकी उतनी आवश्यकता नहीं है। जबतक यह दृष्टि प्राप्त न हो, तबतक तो किसी एक स्थानमें भगवान्की विशेष सत्ताका अनुभव करते हुए उपासना करनी ही चाहिये।
विषयोंका बन्धन मनुष्यको नरककी ही ओर ले जाता है। इसलिये यथासम्भव चित्तको विषय-वासनाओंसे अलग रखना चाहिये। इसके लिये निरन्तर सत्संग, सद्विचार, सद्ग्रन्थोंका स्वाध्याय और भगवान्के नामका जप करनेकी आवश्यकता है। यह सब करते रहनेपर धीरे-धीरे चित्त विषय-वासनाओंके बन्धनसे छूट जाता है। यदि यह सब करना आपके लिये सम्भव न हो तो दूसरा विवाह ही कर लेना अच्छा है।
यज्ञ कई प्रकारके होते हैं। अन्न-यज्ञमें प्रधानतया अतिथिसेवारूप नृयज्ञ और बलिवैश्वदेवरूप भूतयज्ञ ही लिये गये हैं। नित्य पहले किसी अतिथिको भोजन कराकर पीछे स्वयं भोजन करना अतिथियज्ञ है। अतिथि उसे कहते हैं, जो भोजनके समय स्वयं ही आ जाय—जातिसे चाहे वह कोई हो। इसके लिये ऐसा नियम है कि भोजन तैयार होनेपर पहले बलिवैश्वदेव करे। बलिवैश्वदेवकी विधि आप किसी पण्डितसे मालूम कर लें या कुछ पैसेमें गीताप्रेससे मँगा लें। उसके बाद कम-से-कम आधा घण्टा दरवाजेपर किसी अतिथिकी प्रतीक्षा करें। यदि आ जाय तो उसे खिलाकर नहीं तो बिना खिलाये भी भोजन कर सकते हैं। निमन्त्रित या अपना कोई रिश्तेदार अतिथिकी कोटिमें नहीं होते। अतिथिसेवाके बाद जो अन्न बच रहता है, उसे यज्ञशेष कहते हैं।
सिद्धासनका तरीका इस प्रकार है—बायें पैरकी एड़ी, गुदा और अण्डकोषके बीचमें सीवनपर लगाये तथा दायें पैरकी एड़ी टूँडीके नीचे लगाकर सीधा बैठ जाय।
अपने घरकी आपने जो स्थिति लिखी है वैसी प्राय: सभी घरोंमें होती है। सब लोगोंके स्वभाव भिन्न-भिन्न होते हैं। चतुरता इसीमें है कि उन्हें सन्तुष्ट रखते हुए अपना काम किया जाय।