मुक्ति और भगवत्सेवा
सप्रेम हरिस्मरण। आपके पत्रका उत्तर बहुत विलम्बसे जा रहा है। दूसरे कार्योंमें लगे रहनेसे इधर ध्यान देनेका अवसर न मिला। अत: कितने ही पत्रोंके उत्तरमें देर हो गयी। इसके लिये मनमें विचार न करेंगे।
(१) आपके प्रश्नका उत्तर इस प्रकार है—भागवतमें पाँच प्रकारकी मुक्ति बतायी गयी है। सार्ष्टि, सामीप्य, सालोक्य, सारूप्य तथा एकत्व। इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है—भगवान्के समान ऐश्वर्यसे युक्त होना ‘सार्ष्टि मुक्ति’ है। भगवान् जहाँ भी रहें उनके समीप रहनेका सौभाग्य प्राप्त हो, यह ‘सामीप्य मुक्ति’ है। भगवान्के धाममें रहनेका स्थान प्राप्त होना ही ‘सालोक्य मुक्ति’ है। भगवान्का जैसा स्वरूप है, वैसा ही अपना भी हो जाना ‘सारूप्य मुक्ति’ है तथा भगवान्के स्वरूपमें लीन होकर उनसे एकाकारता प्राप्त कर लेना, यह ‘एकत्व’ या ‘सायुज्य मुक्ति’ है।
(२) यद्यपि इन सबमें किसी-न-किसी रूपमें भगवत्सान्निध्य प्राप्त रहता है और भक्त भगवान्का मिलन-सुख चाहते ही हैं, तथापि इन सबमें आत्मसुखको ही प्रधानता दी गयी है। भगवान्के समान ऐश्वर्य, लोक, रूप तथा उनका सामीप्य पाकर जो स्वयं सुखी होना चाहता है, वह मोक्षका पात्र है किन्तु जो अपने सुखको महत्त्व नहीं देता जो भगवान्को सुख पहुँचाकर ही सुखी होता है, उसके लिये उनकी सेवा ही सबसे बड़ी वस्तु है। अतएव (‘दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जना:।’) प्रेमी भक्तजन देनेपर भी इन मुक्तियोंको ग्रहण नहीं करते। मुक्तिमें भोग है और सेवामें त्याग, इसलिये सेवाका ही स्थान ऊँचा है।
(३) जहाँ मुक्तियोंका भी तिरस्कार हो जाता है, ऐसी सेवाका आदर्श हैं—गोपियाँ ‘यथा व्रजगोपिकानाम्’ (नारदभक्तिसूत्र २१)। उनका सारा जीवन ही सेवामय है। उनका चलना-फिरना, सोना-जागना, उठना-बैठना, खाना-पीना, वस्त्राभूषण धारण करना आदि सब कुछ श्रीकृष्णके ही लिये है। वे श्रीकृष्णको सुख पहुँचाकर उन्हें आनन्दित देखकर ही सुखी होती हैं। प्रियतमका सुख ही उनका सुख है। वे अपनेको श्रीकृष्णकी सेवापर न्योछावर कर चुकी हैं। जहाँ तन, मन, प्राण, आत्मा और उससे होनेवाले सारे कार्यकलाप भगवान्को समर्पित हो जाते हैं, वहीं सच्ची सेवा बन पाती है। शेष सब प्रभुकी कृपा है।