नम्र निवेदन

भाईजी (श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार) के व्यक्तिगत पत्रोंका यह तीसरा संग्रह ‘महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर [लोक-परलोकका सुधार तृतीय भाग]’ के नामसे कल्याणकामी पाठकोंकी सेवामें प्रस्तुत किया जा रहा है। पहले दो भागोंका प्रकाशन कई वर्ष पूर्व हुआ था। तबसे और भी अनेक उपयोगी पत्र उनके द्वारा लिखे गये और उनमेंसे थोड़े-से समय-समयपर कल्याणमें प्रकाशित होते रहे। उन्हींमेंसे कुछ चुने हुए पत्रोंका समावेश इस संग्रहमें किया गया है। पहले दो भागोंका जनताने आदर किया और उनसे लाभ उठाया, इसीसे यह तीसरा भाग प्रकाशित किया जा रहा है।

प्रस्तुत संग्रहमें कई नवीन विषयोंका समावेश हुआ है, जिससे पुस्तककी उपादेयता बढ़ गयी है। तात्त्विक विषयोंके साथ-साथ साधनाके मार्गमें आनेवाले अनेक व्यावहारिक प्रश्नोंका इनमें बड़े ही मार्मिक एवं सुन्दर ढंगसे समाधान किया गया है। साधनामें कौन-कौन-सी बातें सहायक हैं तथा कौन-सी बाधक हैं, इसे बड़ी विशद रीतिसे समझाया गया है। साथ ही वर्तमान राजनीति और सुधारवादके दोषोंकी यथार्थ समीक्षा करते हुए दुराचार-भ्रष्टाचार, जनसंख्याकी वृद्धि तथा अन्नकी कमीको दूर करनेके उपायोंपर बड़ी ही दूरदर्शिताके साथ विचार किया गया है। इसके अतिरिक्त विवाह-विच्छेद आदि धर्मशास्त्रविरोधी सामाजिक प्रश्नों तथा नारी-जातिकी कतिपय समस्याओंपर भी पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। आशा है, लेखकके प्रौढ़, परिष्कृत, तप:पूत एवं अनुभवपूर्ण विचारोंसे पाठक यथेष्ट लाभ उठायेंगे।

इन पंक्तियोंके लेखकका ऐसा विश्वास है कि जो लोग इन पत्रोंको मननपूर्वक पढ़ेंगे तथा उनमें कही हुई बातोंको अपने जीवनमें उतारनेकी चेष्टा करेंगे, उनके लोक-परलोकका निश्चय ही सुधार होगा और वे पारमार्थिक जीवनमें अपनेको बड़ी तीव्र गतिसे अग्रसर होता हुआ देखेंगे। वर्तमान नास्तिक युगमें इस प्रकारके आध्यात्मिकतासे ओतप्रोत, भगवद्विश्वाससे छलकते हुए एवं जगत‍्की सच्ची हितकामनासे तड़पते हुए विचार बहुत कम देखने-सुननेको मिलेंगे। किमधिकं विज्ञेषु—

विनीत

चिम्मनलाल गोस्वामी