निराशाकी स्थितिसे निकलनेका अमोघ उपाय

प्रिय भाई, सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आप जो अपनेको दीन, हीन, सर्वथा निराश और नष्टजीवन मानते हैं, सो ऐसी स्थितिमें इस प्रकारके भाव प्राय: आया करते हैं। इस अवस्थामें मनुष्य यह मान बैठता है कि ‘अब इस जीवनमें मेरी स्थितिमें किसी प्रकार भी सुधारकी आशा नहीं है।’ वस्तुत: यह स्थिति बड़ी ही दयनीय है। आपने अपने लिये क्या करना चाहिये पूछा, सो जहाँतक मेरी समझ है, इस स्थितिमें मनुष्यको चाहिये कि वह सब प्रकारसे भगवान‍्के शरण हो जाय। अपनेको सर्वथा निरुपाय मानकर भगवान‍्के चरणोंमें डाल दे। ऐसी हजारों उलझनोंसे भरी हुई और सर्वथा निराश स्थितिसे निकलनेका एक ही अच्छा उपाय है कि अपनेको भगवान‍्के भरोसे छोड़ दे और भगवान‍्की मंगलमयी इच्छाको—उनके कल्याणमय विधानको स्वछन्दताके साथ अभिव्यक्त होने दे। भगवान‍्की मंगलमयी इच्छामें, उनके मंगलविधानमें सभी कुछ सर्वथा सुन्दर, कल्याणमय, प्रेममय और आनन्दमय है। उसमें दीनता, हीनता, निराशा और जीवनकी नष्टताको कोई स्थान ही नहीं है। हम जो आज इतने दीन, दु:खी तथा निराश हैं इसका कारण यही है कि हमने भोगासक्तिके कारण भगवान‍्की मंगलमयी व्यवस्थासे अलग अपनी कुछ इच्छाएँ बना ली हैं और उन्हींकी पूर्तिसे जीवनमें सुख और कल्याणकी सम्भावना मान बैठे हैं। इसीसे बार-बार निराशाका सामना करना पड़ता है। इस निराशा और दु:खकी स्थितिसे पार पानेका उपाय है बस, दृढ़ विश्वासके साथ अपनेको सर्वथा पूर्णरूपसे भगवान‍्के भरोसेपर छोड़ देना। उनके प्रति पूर्ण समर्पण कर देना और यह कठिन भी नहीं है। जो सर्वथा असहाय, निराश और आश्रयहीन है, वह दीनबन्धु भगवान‍्की शरण छोड़कर और कहाँ जायगा। जगत‍्के लोग तो सफलताकी पूजा करते हैं, ऐसे असफल-जीवनको कौन आश्रय देगा। ऐसे लोगोंके लिये तो एकमात्र अशरण-शरण, करुणावरुणालय भगवान् ही परम आश्रय हैं, जो अकारण ही नित्य प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं। उनका द्वार ऐसे लोगोंके लिये सदा ही खुला है। अतएव भगवान‍्के प्रति आत्मसमर्पण करके उनकी कृपाकी प्रतीक्षा करता रहे। भगवान‍्से यह न माँगे कि ‘आप मेरे कष्टको, मेरी कठिनाइयोंको दूर कर दें।’ यह प्रार्थना भी न करे कि ‘मेरी मनचाही चीज या स्थिति मुझे दे दें।’ बस, एकमात्र यही चाहे कि ‘भगवान‍्की मंगलमयी इच्छा पूर्ण हो, चाहे बाह्यरूपसे वह कितनी ही पीड़ा देनेवाली क्यों न हो।’ उनसे यही कहे—

मेरी चाही करनकी, जो है तुम्हरी चाह।

तो तुम्हरी चाही करो, यह है मेरी चाह॥

मेरी चाही हो वही, जो हो तुम्हरी चाह।

तुम्हरी अनचाही कभी, मत हो मेरी चाह॥

तुम्हरी चाहीमें प्रभो! है मेरा कल्यान।

मेरी चाही मत करो, मैं मूरख अज्ञान॥

इस प्रकार भगवान‍्को उनकी अपनी मनचाही करनेपर छोड़ दीजिये, फिर देखिये, किस आश्चर्यभरी रीतिसे आपके जीवनकी दशा बदलती है और भगवान‍्की व्यवस्थामें आते ही किस सुन्दरताके साथ सारी व्यवस्था सुसम्पन्न हो जाती है।

इसमें सबसे पहली वस्तु है भगवान् पर विश्वास। भगवान् ही एक ऐसी वस्तु हैं जिनपर विश्वास करनेपर कभी निराश और दु:खी नहीं होना पड़ता तथा जीवनमें सदा सहज ही सुख-शान्ति बनी रहती है। सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और सदा सच्चे सुहृद् भगवान् पर विश्वास रखनेवाले पुरुष महान्-से-महान् विपत्ति और दु:खमें भी विचलित नहीं होते और बड़ी ही आसानीसे भगवद्विश्वासके प्रखर प्रकाशद्वारा उस दु:खके अन्धकारका नाश कर देते हैं। पर जो लोग भगवान् पर विश्वास न करके भोगोंपर विश्वास करते हैं, उनको तो पद-पदपर निराश ही होना पड़ता है!

अतएव आप भगवान् पर विश्वास कीजिये और अपनेको सचाईके साथ उनके मंगलमय विधानपर छोड़कर उनकी मंगलमयी इच्छाको प्रकट होनेका सुअवसर दीजिये। फिर आप ही सब ठीक हो जायगा।