परदोष और परनिन्दासे बचना चाहिये

प्रिय महोदय, सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। उत्तर विलम्बसे जा रहा है, इसके लिये कृपया क्षमा करें। जहाँतक बने, दूसरेके दोष देखने और दूसरोंकी निन्दा करनेसे बचना चाहिये वरं कहीं किसी कारणवश किसीकी निन्दा हो जाय तो उसके लिये चित्तमें पश्चात्ताप होना चाहिये तथा भविष्यमें ऐसा नहीं होगा, इस प्रकारका मनमें दृढ़ निश्चय करना चाहिये। इसी प्रकार अपने बड़े पुरुषोंका कभी तिरस्कार न करके सदा सम्मान करना चाहिये। साधु-स्वभावके साधक ऐसा ही किया करते हैं। महाभारतमें आता है—

अन्यान् परिवदन् साधुर्यथा हि परितप्यते।

तथा परिवदन्नन्यांस्तुष्टो भवति दुर्जन:॥

अभिवाद्य यथा वृद्धान् सन्तो गच्छन्ति निर्वृतिम्।

एवं सज्जनमाक्रुश्य मूर्खो भवति निर्वृत:॥

‘साधुलोग दूसरोंकी निन्दा करके जैसे परितप्त होते हैं, दुष्टलोग दूसरोंकी निन्दा करके वैसे ही सन्तुष्ट होते हैं। इसी प्रकार जैसे सत्पुरुष बड़े-बूढ़ोंका अभिवादन करके सुखी होते हैं, वैसे ही मूर्खलोग सत्पुरुषोंकी निन्दा करके प्रसन्न होते हैं।’

दूसरोंके दोषदर्शन, परनिन्दा और वृद्धों तथा सत्पुरुषोंका अपमान करनेमें मनुष्यका अभिमान ही प्रधान कारण है। अभिमानसे जिसकी आँखें चौंधियायी हुई होती हैं, उसको सभीमें दोष दीखते हैं, वह अपनेको तथा अपनी बुद्धिको ही सर्वश्रेष्ठ मानता है, इसलिये सबकी निन्दा करता है तथा सभीका अपमान-तिरस्कार कर बैठता है। मनुष्य यदि अपनी ओर तथा अपने ज्ञानकी ओर यथार्थ रूपसे देखे तो उसे पता लगेगा कि अनन्त अपार ज्ञानके समुद्रका एक कण भी उसे प्राप्त नहीं है। वह जन्मभर दिन-रात सीखता ही रहे तो भी ज्ञानका अन्त नहीं आवेगा। उसकी अपेक्षा बहुत ही अधिक जाननेवाले लोगोंकी इतनी अधिक संख्या है कि उनके सामने उसका कहीं पता ही नहीं लगता। परन्तु वे भी सब कुछ जान गये हों, ऐसी बात नहीं है, उनसे अधिक जाननेवाले भी हैं। जिस प्रकार ज्ञानका अभिमान मिथ्या और मूर्खतापूर्ण है, उसी प्रकार धन, अधिकार तथा अन्यान्य पदार्थों या स्थितियोंका अभिमान है। धन, अधिकार और उच्च स्थिति आदिका क्या मूल्य है। प्रथम तो वे स्वल्प और अपूर्ण हैं; दूसरे जितने जो कुछ हैं, वे भी अनित्य ही हैं। आज हैं, कल नहीं। ऐसी अवस्थामें उनपर गर्व करना, उनको लेकर अपनेमें उच्चताका आरोप करना और दूसरोंको नीचा समझना वास्तवमें मूर्खता ही है।

मनुष्यको जहाँतक बने, अपने दोष देखने चाहिये, उनके लिये अपने मन-ही-मन निन्दा करनी चाहिये तथा अपनेको निर्दोष बनानेका सतत प्रयत्न करना चाहिये। सब लोग ऐसा करने लगें तो सभी निर्दोष हो जायँ और समाजका अपने-आप सुधार हो जाय। व्यक्तियोंका समुदाय ही तो समाज है। समाजका प्रत्येक व्यक्ति निर्दोष हो गया तो समाज स्वयमेव निर्दोष हो गया। परन्तु भूल तो यहीं होती है। मनुष्य अपनी बुराइयोंकी ओर नहीं देखता, वरं छोटी बुराई भी बहुत बड़ी दीखे, इस प्रकारका चश्मा चढ़ाकर दूसरोंकी बुराइयोंको देखता है। अपने द्वेष-दम्भ और हिंसा-प्रतिहिंसा भरे हृदयसे दूसरोंकी बुराइयोंको मिटानेका प्रयत्न करता है। फलत: बुराइयाँ और भी बढ़ जाती हैं—अपनेमें भी तथा दूसरोंमें भी। इससे सभीकी हानि होती है। साधकको तो बड़ी सावधानीसे इस दोषसे अपनेको बचाना चाहिये। दूसरोंके दोष देखनेका उसको न तो अवकाश मिलना चाहिये और न उसके पास ऐसी आँखें ही होनी चाहिये।

तेरे भावैं जो करो भलो बुरो संसार।

नारायण तू बैठ कर अपनो भवन बुहार॥

फिर, यदि दूसरेमें कोई दोष दिखलायी दे भी जाय तो वहाँ यह विचार करना चाहिये कि ‘सम्भव है यह दोष इसमें न हो, मेरी दोष-दृष्टिसे ही ऐसा दिखायी देता हो।’ बहुत बार हम ऐसा अनुभव करते हैं कि हमने किसी मनुष्यके सम्बन्धमें जो धारणा की थी, वह गलत थी, हमारी ही समझकी भूल थी और उस भूलके लिये हम कभी-कभी पश्चात्ताप भी करते हैं। सम्भव है, इस बार भी वैसी ही भूल हुई हो। दूसरे, यह देखना चाहिये कि उसमें जो दोष है (जैसे वह झूठ बोलता है, चोरी करता है, क्रोध करता है आदि), वही या वैसा ही दूसरा कोई दोष हममें है या नहीं। यदि शान्त वृत्तिसे देखा जायगा तो स्पष्ट दिखलायी देगा कि दूसरोंकी अपेक्षा हममें वैसे दोष बहुत अधिक मात्रामें हैं—

बुरा जो देखन मैं गया बुरा न पाया कोय।

जो तन देखा आपना मुझ-सा बुरा न कोय॥

तीसरे, यह सोचना चाहिये कि उसने किस परिस्थितिमें पड़कर यह दोष किया है। उस परिस्थितिमें हम होते तो क्या करते। दूसरोंकी आलोचना करना, उसके दोषोंका बखान करना और उपदेशकी बातें कहना जितना सहज है, परिस्थितिमें पड़कर धीरता-वीरताके साथ उससे बच निकलना उतना ही कठिन है। चौथे, यह बात अवश्य विचारणीय है कि हमारा लाभ दूसरोंके दोष देखने, उनकी निन्दा करनेमें है या गुण देखकर उन्हें ग्रहण करनेमें है। इसपर विचार किया जाय तो यह निर्विवाद सिद्ध होगा कि हमारा लाभ गुण देखने और उनके ग्रहण करनेमें ही है।

इन सब बातोंपर विचार करके आप अपनी आदतको ठीक कीजिये। आप अभी नौजवान हैं, आपके सामने आगे बढ़नेके लिये बड़ा विस्तृत क्षेत्र है। दूसरोंकी ओर ध्यान न देकर आप अपनेको सुधारनेमें ही लगे रहिये। इसीमें आपका कल्याण है। × × × शेष भगवत्कृपा।