परम वस्तुकी प्राप्तिके लिये अनिवार्य इच्छाकी आवश्यकता

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। धन्यवाद! आपने कृतज्ञता प्रकट की, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। मनुष्यका कर्तव्य ही है कि वह परस्पर सत्परामर्शका आदान-प्रदान करे, इसमें बड़ाईकी कौन-सी बात है। सच पूछिये तो आपके प्रति कृतज्ञ तो मुझको होना चाहिये, जो आपने सत्-चर्चा चलाकर मेरे मनको कुछ समयके लिये सच्चिन्तनमें लगाया।

आपने लिखा कि ‘मैं इस विषयको बहुत दिनोंसे जानता हूँ, पर ऐसा कर नहीं पाता’ सो इसमें मेरी समझसे आपकी इच्छाकी तीव्रताका तथा तदनुकूल क्रियाका अभाव ही प्रधान कारण है। किसी भी कार्यकी सिद्धि केवल जाननेसे नहीं होती, उसके साथ उसे सिद्ध करनेकी इच्छा एवं तदनुकूल कार्य करनेकी आवश्यकता है। भोजनसे भूख मिटती है यह जान लिया, परन्तु इस जाननेसे पेट नहीं भरता। भोजनकी इच्छा होनी चाहिये तथा भोजनके पदार्थ बनाकर उनको खाना चाहिये। ज्ञानके साथ इच्छा होनी चाहिये और वह इच्छा भी ऐसी होनी चाहिये जो अनिवार्य आवश्यकताके रूपमें परिणत हो गयी हो—जैसे अत्यन्त प्यासेको जलकी इच्छा होती है। ऐसी इच्छा होनेपर क्रिया स्वयमेव होती है और फिर उसका फल प्रकट होता है। मैं समझता हूँ, आप केवल जानते ही हैं पर आपने न तो उसे प्राप्त करनेकी तीव्र इच्छा ही की है और न प्रयास ही।

एक बात यह भी है कि प्रयास भी मन्द नहीं होना चाहिये। उसके लिये अटूट धैर्य चाहिये और चाहिये परम श्रद्धा एवं आत्मविश्वास। योगदर्शनमें आया है कि अभ्यास वही दृढ़ होता है जो निरन्तर चलता हो, दीर्घकालतक चलता रहे और जिसके करनेमें सत्कार-बुद्धि हो। हम जिस वस्तुको पाना चाहते हों, उसकी सत्ता और श्रेष्ठतामें हमारी श्रद्धा होनी चाहिये, उसके प्राप्त होनेमें श्रद्धा होनी चाहिये और हम उसे अवश्य प्राप्त कर लेंगे, इस निश्चयमें दृढ़ विश्वास होना चाहिये। जहाँ श्रद्धाका अभाव है, आत्मविश्वासकी कमी है, वहाँ सिद्धि तो दूर रही, साधन ही सुचारुरूपसे नहीं हो पाता। अतएव मैं तो आपको सलाह दूँगा कि आप अपने जाने हुए तत्त्वको पानेके लिये आतुर हो जाइये। फिर उसके लिये प्रयत्न आप ही होगा। और फिर आपको प्रशस्त पथ बतलानेवाले भी अवश्य मिल जायँगे। तीव्र इच्छा होनेपर विश्वासी साधककी सहायता स्वयं भगवान् करते हैं।