पतिका धर्म
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने जो बातें लिखीं, वे कुछ अंशोंमें सत्य हैं; परन्तु मनुष्यको विचार करना चाहिये अपने धर्मपर। जो अपने धर्मको नहीं देखता, स्वयं धर्मपर आरूढ़ नहीं रहना चाहता और दूसरेको धर्मपर आरूढ़ न देखकर झल्लाता है, उसकी झल्लाहटसे कोई अच्छा फल नहीं होता। आप चाहते हैं नारियाँ सीता-सावित्री क्यों नहीं बनतीं; पर आप यह क्यों नहीं सोचते कि पुरुष श्रीरामचन्द्र और सत्यवान् क्यों नहीं बनते। स्त्रियाँ अपने धर्मका पालन करें यह बहुत आवश्यक है, परन्तु पुरुषोंके लिये भी तो धर्मपालन कम आवश्यक नहीं है। मेरे पास एक बड़ा करुण पत्र आया है। एक बहिन लिखती हैं ‘मेरे स्वामी मुझे गालियाँ बकते हैं, मारते हैं, न मालूम क्या-क्या करते हैं; यहाँतक कि मुझसे वेश्यावृत्ति करवाना चाहते हैं। बताइये मैं क्या करूँ।’ इस बहिनको क्या उपदेश दिया जाय? ऐसे पतिकी आज्ञा माननी चाहिये या उसका बहिष्कार करना चाहिये? एक विधवा बहिन लिखती है कि ‘मेरे देवरने मुझे फुसलाकर मुझसे सादे कागजपर सही करवा ली और अब वह मेरी न्यायोचित सम्पत्तिको हड़पना चाहता है। मैं क्या करूँ।’ यह तो नमूना है। ऐसी घटनाएँ कितनी होती होंगी। पुरुषोंका अत्याचार बेहद बढ़ गया है। आप अपने पत्रमें केवल पत्नीकी शिकायत-ही-शिकायत लिखते हैं; परन्तु आपके पत्रको पढ़नेसे पता लगता है कि उस बेचारीका यदि कोई दोष है तो यही है, वह निर्दोष है—उसे छल-कपट नहीं आता। दोष तो सारा आपका है जो आप उसके सामने परमात्मा बनकर बैठते हैं और उसकी न्यायसंगत सम्मतिके विरुद्ध उससे अपनी पूजा करवाना और अनुचित बातोंमें उसका सहयोग प्राप्त करना चाहते हैं। आपको क्या हक है, उससे आप गन्दा गाना गानेको कहें और वह न गाये तो आप उसे पतिव्रता न समझें? आपको क्या हक है, आप उसे शराब पिलाकर सिनेमामें ले जाना चाहें और वह हाथ जोड़कर इसके लिये क्षमा माँगे तो आप उस देवीपर नाराज होकर उसे सतीधर्मसे गिरी हुई करार दें और मेरा समर्थन माँगें? पतिको परमेश्वर समझकर उसकी सेवा करे, यह स्त्रीका धर्म है। पतिका धर्म नहीं कि अपनेको परमेश्वर बताकर उससे कहे कि तुम मुझे उचित-अनुचित जैसे भी मैं कहूँ, पूजो। यह तो किसीके धर्मसे अनुचित लाभ उठाना है। मेरी आपको सम्मति है कि आप उसकी नेक सलाहको मानिये। उसकी सलाह—जो कुछ आप लिखते हैं—आपके लिये बड़ी कल्याणकारिणी है। वह आपको शराब छोड़ने, तम्बाकूका त्याग करने, सिनेमा न देखने और झूठ न बोलनेकी सलाह देती है तो कौन-सा बुरा कर्म करती है? आप कहते हैं ‘उसकी बात तो ठीक है; परन्तु वह मेरी स्त्री होकर मुझको उपदेश देनेका पाप करती है—यह मैं कैसे बरदाश्त करूँ।’ वाह! धन्य है आपकी समझको। स्त्री सहधर्मिणी है, वह आपकी सच्ची हितैषिणी है, वह प्रतिपदपर आपका मंगल चाहती है। उसके सिवा सत्-परामर्श देनेका सबसे अधिक अधिकार और है ही किसको? आप उसकी सलाह मानिये और भगवान्के कृतज्ञ होइये कि आपको ऐसी सुशीला सद्गुणवती पत्नी प्राप्त हुई है। आप अपने सौभाग्यपर गर्व कीजिये और अपनी पत्नीका परम प्रेमके साथ आदर कीजिये। उसे कभी कड़े शब्द न कहिये। न उसका जी दुखाइये। उसे अपना मित्र मानिये और भरसक सुख पहुँचानेकी चेष्टा कीजिये। इसीमें आपका कल्याण है।