पतिव्रता
सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। आपके प्रश्नोंका उत्तर इस प्रकार है—
जो स्त्री—
उत्तम के अस बस मन माहीं।
सपनेहु आन पुरुष जग नाहीं॥
—इस आदर्शके अनुसार कभी मनसे भी पर-पुरुषका चिन्तन नहीं करती, अपने पतिको ही परमेश्वर मानकर सदा उसीसे प्रेम रखती है, उसीके सुखमें सुख और उसीके दु:खमें दु:ख मानती है। निरन्तर पतिकी सेवासे पतिको सन्तुष्ट रखनेकी चेष्टा करती है। जो अपनेको पतिपर न्योछावर करके उसके साथ एक प्राण एक आत्मा हो चुकी है। पतिके सोनेके बाद सोती और उठनेसे पहले ही जागती है। पतिके गुरुजनोंका पवित्र मनसे स्वागत-सत्कार-सेवा करती है, वह स्त्री सती या पतिव्रता कहलाती है।
इस प्रकार पतिव्रतधर्मका अधिक समयतक पालन करनेपर नारीमें अपूर्व शक्ति आ जाती है, फिर तो देवता भी उससे डरते हैं। कोई कामी पुरुष उससे बलात्कार करने जाकर जीवित नहीं रह सकता। पतिव्रता एक अग्नि है, जहाँ पापी तिनकेके समान भस्म हो जाते हैं। ऐसी स्त्री सिद्ध पतिव्रता मानी जाती है। जो सिद्ध नहीं, साधन-पथपर चल रही है, वह भी किसी पापीके बलात्कारसे अशुद्ध नहीं होती। यदि वह अपने मनमें पापकी वासना जरा भी न आने दे तो उसके शरीरको कोई पापी बलपूर्वक स्पर्श कर दे तो भी वह वास्तवमें ‘असती’ नहीं मानी जाती। वह शास्त्रीय प्रायश्चित्त करके अपनी दैहिक अशुद्धिको दूर करके फिर पूर्ववत् शुद्ध हो जाती है।
सतीके सतीत्वको बलपूर्वक उसकी इच्छाके विपरीत नष्ट करनेवाला पुरुष कोटि कल्पोंतक रौरव नरकमें पड़ता है, ऐसा सन्तोंका वचन है।
स्त्री और पुरुष दोनोंके लिये संसारसे पार होनेका मार्ग है—पापसे बचते हुए भगवान्का भजन करना। जो जिस वर्णमें है, उसके अनुसार अपने धर्मका पालन करते हुए सब प्रकारकी बुराइयोंसे दूर रहे तथा भवभयहारी भगवान्के चरणोंका निरन्तर चिन्तन करता रहे। भगवान्के शरण होकर उनकी ही इच्छासे उन्हींके लिये जीवन धारण करे। वही करे जो भगवान्को प्रिय हो। भगवान्को क्या प्रिय है—यह शास्त्र बतलाते हैं; क्योंकि शास्त्र ही भगवान्के आदेश हैं। शास्त्रमें जो न करनेयोग्य कहा हो उसे न करना। जो कर्तव्य बताया गया हो, वही करना यही प्रत्येक स्त्री-पुरुषका धर्म है। इसीसे वे संसार-समुद्रके पार जा सकते हैं। शेष सब भगवान्की दया।