पत्नीका त्याग अनुचित है

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके वैश्य मित्रके धर्म-संकटका हाल मालूम हुआ। भलीभाँति विचार करनेके बाद इस सम्बन्धमें मेरे मनमें जो बात आयी है, उसे मैं नीचे लिख रहा हूँ। मैं समझता हूँ कि इसके अनुसार करनेसे आपके मित्रकी तथा उनके घरवालोंकी भलाई होगी। पत्नीके त्यागका विचार तो कभी नहीं करना चाहिये। जब वह अपनेको निर्दोष बतलाती है, तब केवल सन्देहवश उसके पल्ले दोष बाँधना सर्वथा अनुचित और हानिकारक है। सन्देहका लाभ तो अदालतमें भी मिलता है। दूसरी बात यह है कि उनकी पत्नीका तथा.....की उम्रमें इतना अन्तर है कि वह पत्नीके मनमें आकर्षण उत्पन्न करनेयोग्य नहीं हैं। मैं तो समझता हूँ, उनकी पत्नीसे ऐसा कोई दोष बिलकुल नहीं हुआ है और वह सर्वथा निर्दोष है। उसके साथ आपके मित्रको धर्मपत्नी मानकर वैसा ही सुन्दर और स्वाभाविक व्यवहार करना चाहिये।

फिर यदि थोड़ी देरके लिये मान भी लें कि स्त्रीमें कोई दोष आया है (यद्यपि ऐसी बात प्रतीत नहीं होती) तो वैसी हालतमें वस्तुत: उसमें प्रधान दोष किसका है, इसपर विचार करना चाहिये। मेरी समझसे तो ऐसे प्रसंगोंमें स्त्रीका दोष जहाँ दो-चार आने होता है, वहाँ पुरुषका बारह-चौदह आने होता है। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दी जाती है कि स्त्रीबेचारी विवश हो जाती है। इस दृष्टिसे भी वह सर्वथा क्षम्य है। दण्डका पात्र तो पुरुष होता है जो प्राय: बचा रह जाता है।

पत्नीके त्यागमें तो हानि-ही-हानि है। कुछपर विचार कीजिये। (१) यदि वह निर्दोष है और केवल सन्देहवश उसका त्याग कर दिया जायगा तो उसे महान् दु:ख होगा। उसकी अन्तरात्माके मूक अभिशापसे आपके मित्रका अहित होगा। (२) परिस्थितिवश यदि कभी कोई दोष बना है, तो वह इसके लिये मन-ही-मन जलती ही होगी। त्यागकी बातसे उसकी वह जलन बढ़ेगी और उसको बड़ा दु:ख होगा, जो आपके मित्रके लिये अनिष्टकारक होगा। (३) उसकी छोटी उम्र है, आजके गन्दे वातावरणमें उसका जीवन पवित्र रहकर कैसे निभ सकेगा। यदि पवित्र न रह सका तो इसकी जिम्मेवारी भी आपके मित्रपर आवेगी। (४) आपके मित्र भी अभी युवक हैं, उनके जीवनमें भी पाप होना सर्वथा सम्भव है। (५) अभी तो घरमें ही क्लेश है, पर यह बात यदि मुहल्ले-गाँवमें फैली तो बड़ी बदनामी होगी, मान-सम्मानका नाश होगा और बच्चोंका सम्बन्ध होना कठिन हो जायगा। और यदि सन्देहवश इतनी बड़ी जोखिम उठायी जायगी तो वह बहुत बड़ी मूर्खताका कार्य होगा। और भी बहुत-सी हानियाँ हैं।

आपके मित्रको चाहिये कि वे अपनी पत्नीके साथ हृदयसे प्रेम करें। मनुष्यमें कमजोरी होती है। मेरी तो ऐसी धारणा है कि स्त्रियोंकी अपेक्षा आजकल पुरुष अधिक पापी हैं। पापके प्रस्ताव और प्रयत्न पहले पुरुषकी ओरसे ही होते हैं। यदि कभी किसी परिस्थितिवश किसी स्त्रीसे कोई दोष बन भी गया हो तो उसे उसके पल्ले बाँधकर, उसे दोषी साबित कर उसके जीवनको बिगाड़ना नहीं चाहिये। यह और भी बड़ा पाप है; क्योंकि इसमें पापोंके बहुत अधिक बढ़नेकी सम्भावना है। किसीके छिद्रको प्रकाश करनेकी अपेक्षा अपना अंग देकर भी उसे ढक देना कहीं श्रेष्ठ है। फिर वह तो उनकी धर्मपत्नी है और आपके लिखनेके अनुसार बड़े अच्छे स्वभावकी भी है। उसे सर्वथा निर्दोष मानकर ही व्यवहार करना चाहिये। इसीमें उसका और आपके मित्रका तथा बच्चोंका कल्याण है। हाँ, यदि आवश्यक ही हो और सम्भव हो तो वृद्ध महाशयके लिये पृथक् प्रबन्ध किया जा सकता है। अवसरपर उनका तो त्याग भी किया जा सकता है, पर धर्मपत्नीका नहीं। यही धर्म है और यही कर्तव्य है।

इसके अतिरिक्त विश्वासपूर्वक श्रीभगवान‍्से प्रार्थना करनी चाहिये और उनकी पत्नीको भी चाहिये कि वह भी नित्य भगवान‍्के नामका नियमित जप करें। तथा सबको सद‍्बुद्धि प्राप्त हो, इसके लिये भगवान‍्से प्रार्थना करें। इससे पिछले पापोंका नाश होगा, मनमें पवित्रता आवेगी और भविष्यमें पापोंसे बचनेकी शक्ति प्राप्त होगी।