पत्नीका त्याग सर्वथा अनुचित है
सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। आपकी परिस्थिति ज्ञात हुई। पत्रको देखकर जान पड़ता है—आप स्वाध्यायशील और विवेकी पुरुष हैं। तभी तो विषम परिस्थितिमें पड़कर भी आपने धैर्य और विवेकका परित्याग नहीं किया है। आजकलके नवयुवक नये-नये विवाहके लिये स्वयं बहाने ढूँढ़ा करते हैं। आपको तो पिताकी सम्मति ही नहीं, आदेश और आग्रह भी प्राप्त हैं, मित्र भी ऐसी ही सलाहें देते हैं, फिर आपके मार्गमें कौन-सी बाधा थी? इतनेपर भी आपने कर्तव्यका विचार किया और दूसरोंसे भी परामर्श लेनेकी आवश्यकता समझी। यह आपकी साधुता ही है और इसके लिये आप साधुवादके पात्र हैं।
अपनी पत्नीके जो दोष आपने लिखे हैं, वे सम्भव हैं उनमें हों, तो भी धर्मपत्नी हैं, यह सोचकर वे त्याग करने योग्य कदापि नहीं हैं। कहीं-कहीं तो पतियोंमें ही बड़े-बड़े दोष देखे जाते हैं और क्षमामूर्ति नारियाँ सब कुछ सहन करके उसी पतिके साथ सन्तोषपूर्वक जीवन व्यतीत करती पायी जाती हैं। अधिकांश उदाहरण ऐसे ही हैं जहाँ मनचले पुरुष हैं और साध्वी स्त्री हैं। आपकी घटनाको मैं अपवादरूप मानता हूँ। स्त्रियोंके लिये शास्त्रने यह आदेश दिया है—वे दरिद्र, वृद्ध, रोगी, मूर्ख, अन्धे, बहरे, क्रोधी और नपुंसक पतिका भी परित्याग न करें—
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना।
अंध बधिर क्रोधी अतिदीना॥
जब नारी-जाति पुरुषके लिये इतना त्याग कर सकती है, तब पुरुषको क्या उसके लिये भी कुछ नहीं करना चाहिये? यह कहाँका न्याय है? विवाद या कलह एक ही ओरसे नहीं होता। कुछ-न-कुछ कारण दोनों ही ओर रहता है। यदि दोनों ओरके कारणका ठीक-ठीक अध्ययन करके उसे दूर करनेकी चेष्टा की जाय तो विवादकी जड़ कट सकती है। कुटुम्बके अन्य सारे सदस्य यदि क्षमाभावको अपना लें तो केवल एकके झगड़ालू होनेसे कलह नहीं हो सकता। आपकी माताजीके लिये जैसे आप पुत्र हैं, वैसे आपकी पत्नी भी उनकी पुत्री हैं। वे आपको और उनको अपनी सगी सन्तानकी तरह प्यार करने लगें तो कोई कारण नहीं कि पत्नीके स्वभावमें अन्तर न पड़े। मेरे कहनेका मतलब यह नहीं कि पत्नीको अपनी ओरसे सुधारकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये। यदि वह बुद्धिमती और विवेकवती होतीं तो उन्हींका कर्तव्य था—सास-ससुरके चरणोंमें पड़कर अपनी भूलोंके लिये क्षमा माँगना और निरन्तर उनकी सेवामें संलग्न रहना; परन्तु किसी भी कारणसे यदि अज्ञानवश उन्होंने अपने कर्तव्यका पालन नहीं किया तो लोग सज्ञान और विवेकी हैं, वे भी उन्हींकी तरह भूल करें, यह कदापि वांछनीय नहीं हो सकता।
आपने पत्नी-परित्यागके पक्ष और विपक्षमें जो युक्तियाँ उपस्थित की हैं, उनपर क्रमश: विचार किया जाता है—
१—श्रीरामने सीताका परित्याग मनसे नहीं किया था। उनके मनमें सीताके प्रति सदा एक-सा आदरका भाव रहा। बाहरसे भी उनका त्याग तभी हुआ, जब और कोई मार्ग नहीं रह गया था। प्रजाकी भी भूल थी, प्रजाका उससे कोई हित नहीं हुआ। अन्तमें प्रजाको भूल स्वीकार करनी पड़ी और सीताजीके सत्यकी विजय हुई। क्या यही परिस्थिति आपके सामने भी है? क्या आपकी पत्नीपर भी ऐसा ही दोषारोपण किया गया है? क्या उसके त्यागमें ही माता-पिताका कल्याण निहित है? क्या त्यागके सिवा और कोई मार्ग नहीं रह गया है? सीताका त्याग कितना ही न्याय्य क्यों न रहा हो, क्या आजतक उसके कारण प्राय: लोग श्रीरामपर आक्षेप नहीं करते?
२—राजा कैकयने कैकेयीकी माताका परित्याग क्यों किया, इसलिये कि वह ऐसा कार्य करनेको उतारू थी, जिससे राजाकी मृत्यु निश्चित थी। क्या आपकी पत्नी भी आपके प्राण लेनेको उद्यत है, फिर ऐसा संकल्प क्यों हुआ?
३—मनुस्मृतिमें ऐसी कन्याको त्यागनेयोग्य बताया गया है, जो विवाहके पहलेसे ही निन्दित, रोगिणी तथा दूषित आचरणकी रही हो। छलसे उसके साथ ब्याह कराया गया हो और उसके दोष बताये न गये हों। क्या यही बात आपके सामने भी है? जो स्वभावत: नित्य-निरन्तर पतिके साथ द्वेष रखती हो वह स्त्री भी त्याज्य है, परन्तु आपकी स्त्री ऐसी तो नहीं प्रतीत होती। वह तो इसलिये रूठी-सी जान पड़ती हैं कि आप माता-पिताके पक्षमें होकर उनका सर्वथा तिरस्कार करते हैं। आपका माता-पिताके न्यायपक्षमें रहना नितान्त धर्मसंगत है। आपको ऐसा ही करना भी चाहिये। वह स्त्रीका अज्ञान है कि इस उचित कार्यको करनेपर भी वह आपसे कुपित रहती हैं। उन्हें समझानेकी चेष्टा हो अथवा उन्हें कुछ काल अलग रखा जाय जैसा कि वह अब भी पिताके घरमें हैं, यही उनके लिये दण्ड है। त्यागकर सर्वथा दूसरा विवाह करनेके लिये तो कोई भी विधान नहीं है। चाणक्य आदि नीतिकारोंने दुष्टा स्त्री उसीको कहा है, जो व्यभिचारिणी हो। आपके सामने ऐसा प्रश्न कदापि नहीं है। मेरी समझसे तो वर्तमान कालको देखते किसी भी स्थितिमें स्त्रीका त्याग नहीं करना चाहिये।
४—जो पिता शाप और वरदान देनेमें समर्थ हों, उनकी आज्ञाका विचार किये बिना पालन करना अच्छा है। परशुराम और ययातिके पुत्रोंके दृष्टान्तसे यही निष्कर्ष निकलता है। जो पिता राग-द्वेषके वशीभूत हों, उनकी आज्ञापर विचार कर लेना आवश्यक है। प्रह्लादने हिरण्यकशिपुके कहनेसे भगवान्का भजन नहीं छोड़ा था। पिताका वास्तविक कल्याण करनेवाला प्रत्येक कार्य अवश्य करना चाहिये; किन्तु जिससे पिताका भी परलोक बिगड़े; ऐसी आज्ञा माननेपर पिताकी ही हानि है। अत: उसे अस्वीकार कर देना उचित है। आपकी स्त्रीके परित्यागसे आपके पिताका या माताका कल्याण होगा, ऐसा समझना सर्वथा भूल है। अत: आपको पिताकी यह अधर्मयुक्त आज्ञा, जो उनका भी अकल्याण करनेवाली है, नहीं माननी चाहिये। पत्नी-परित्याग अथवा सम्बन्ध-विच्छेदके विरोधमें जो आपने विभिन्न ग्रन्थोंके विचार प्रस्तुत किये हैं, वे मननीय और माननीय हैं। उन्हींके आश्रयसे वास्तविक हित हो सकता है।
५—स्त्रीके स्वभावको सुधारनेके लिये सबसे पहली बात है उसे निश्छल प्रेमदान देना। उसके सुख-दु:खको पूछना, उसमें हाथ बँटाना और उसे सन्तुष्ट रखनेकी चेष्टा करना। अच्छे-अच्छे ग्रन्थों और महात्माओंके विचार सुनाना। रामायण आदि पढ़ना अथवा सुनाना। पुराणोंमें वर्णित साध्वी स्त्रियोंके चरित्र सुनाना। उनकी बुद्धि और विवेकको प्रेमके साथ जगाना और भगवान्से उसके सुधारके लिये सदा प्रार्थना करना।
६—दो स्त्रियोंके होनेका परिणाम राजा उत्तानपादका दृष्टान्त आपके सामने है। राजा दशरथके आनन्दकाननमें जो भयंकर कालाग्नि प्रकट हुई, उसका कारण भी बहु-विवाह ही है। आप माता-पिताकी सेवा करें। माता-पिताका कर्तव्य है कि वे अपनी रूठी हुई बहू या पुत्रीको मनाकर लावें। हृदय खोलकर उससे प्यार करें, ‘क्योंकि ‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति’ सन्तान दुष्ट हो सकती है, किन्तु माता-पिताका उसपर भी स्नेह ही होता है। हमारे एक मित्रने एकसे अधिक विवाह किये हैं और इसके कारण वे बहुत दु:खी हैं।
७—पहलेसे ही स्त्रीको दुष्टा न मान लें। स्त्रीमें दोष होंगे। दोष आगन्तुक हैं, उन्हें दूर किया जा सकता है। इसका उपाय पाचवें प्रश्नके उत्तरमें बताया गया है।
आपको अपने कर्तव्यसे विचलित नहीं होना चाहिये। आप माता-पिताके पुत्र हैं, उन्हें सुख दें, उनकी सेवा करें, उनकी उचित आज्ञाका पालन करें। परन्तु पत्नीके भी पति हैं, उसको भी सच्चे हृदयसे स्नेह-दान दें। दूसरोंके दोष न देखकर अपने कर्तव्यपर ध्यान दें। पत्नीको भी समझाते रहें—परन्तु प्रेमीकी भाँति, कठोर बनकर नहीं। भगवान्को सदा याद रखकर उन्हींसे सहायता माँगे। शेष श्रीहरिकी कृपा!