पत्नीको मारना महापाप है

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने लिखा कि ‘मैं कभी-कभी गुस्सेमें आकर अपनी पत्नीको कटुवचन कह बैठता हूँ। इसपर कभी तो वह चुप रह जाती है और कभी कुछ सामने बोल देती है। जब बोल देती है तब मेरा गुस्सा और बढ़ जाता है और मैं उसे मार बैठता हूँ। मुझे इसके लिये कभी-कभी पीछेसे पश्चात्ताप भी होता है। अब आप बताइये कि मुझे क्या करना चाहिये।’

मेरी समझसे अपनी पत्नीपर पतिका हाथ उठाना बहुत बड़ा पाप है। क्योंकि वह असहाय है, पतिके ही आश्रित है, बदलेमें वह सिवा दु:खी होने, रोने अथवा कड़े मिजाजकी हो तो कुछ कटुवचन कहनेके और कोई प्रतिकार नहीं कर सकती। क्रोध तो किसीपर भी नहीं होना चाहिये। वह तो महाशत्रु है। जिसके मनमें आता है उसको पहले जलाता है और जिसके प्रति आता है उसको पीछे (वाणी आदिके द्वारा) प्रकट होनेपर जलाता है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषोंको अपने हितके लिये उसका सर्वथा त्याग ही करना चाहिये। परन्तु यदि आवे ही तो समान शक्तिवालेपर आनेसे उसका कुछ औचित्य भी कहा जा सकता है। लेकिन जो अपनेसे हीनबल हो, प्रतिकार करनेकी शक्ति न रखता हो, चुपचाप रोने और दु:खी होनेके सिवा कुछ भी न कर सकता हो, उसपर क्रोध करना तो वस्तुत: बड़ी ही नीचता और कायरता है। परन्तु होता है प्राय: यही। दुर्बलपर ही गुस्सा आया करता है। फिर पत्नी तो सहधर्मिणी है उसका समान दर्जा है, उसकी अकारण अवज्ञा करना भी पाप है, मारना तो महापाप है। स्त्री वशमें हो सकती है सच्चे प्रेमसे, सद्‍व्यवहारसे और हितकर मधुर वचनोंसे। उसके हितके लिये बिना गुस्सेके उसे कभी कटु शब्द कहे जायँ तो वह दोषकी बात नहीं है; परन्तु साथ-ही-साथ आत्मपरीक्षा भी करनी चाहिये। धर्मका सार यह बताया गया है—

आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥

‘जो-जो बातें अपनेको प्रतिकूल मालूम होती हों, दूसरेके प्रति उनको कभी न करें।’ आपको कोई कड़वी जबान कहे, गाली दे, मारे, तो क्या आपको वह भला मालूम होगा? यदि नहीं तो, फिर आपको क्या अधिकार है कि आप दूसरोंको बुरी जबान कहें, उन्हें गाली दें और मारें।

अतएव मैं आपसे प्रेमपूर्वक निवेदन करता हूँ कि पत्नीको मारनेकी आदतको सर्वथा आप छोड़ ही दें। इसके लिये तो शपथ कर लें। आपको कभी-कभी पश्चात्ताप होता है, इससे पता लगता है कि आप इस चीजको बुरी मानते हैं। अतएव आपके लिये इसे छोड़ना बहुत कठिन नहीं होगा। ‘कटु’ शब्द भी यथासाध्य न बोलें। क्योंकि कटुका प्रतिकार भी प्राय: कटु ही होता है और उससे कटुताके और भी बढ़नेकी आशंका रहती है।

साथ ही मेरा आपकी पत्नीसे भी अनुरोध है कि वे भी वाणीका संयम करें। आपके कटु शब्दोंके बदलेमें या तो चुप रहें या यदि आपका गुस्सा बढ़नेकी सम्भावना न हो तो ठीक समय देखकर बहुत नम्र तथा मीठे शब्दोंमें आपको समझा दें। ऐसा होगा तो फिर मार-पीटका प्रसंग कभी आवेगा ही नहीं। विशेष भगवत्कृपा।