पत्नीसे अनुचित लाभ न उठाइये

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने लिखा—मेरी पत्नी बड़ी बुद्धिमती है, स्वभाव भी अच्छा है। सबके साथ अच्छा बर्ताव भी करती है। परन्तु मेरी सब बातें नहीं मानती। कहती है ‘इस बातको मानना पाप है।’ मैं उसे पतिव्रता शाण्डिलीका उदाहरण देता हूँ, पर वह उसे स्वीकार नहीं करती। इससे हम दोनोंमें कलह रहती है। मेरी बात मानना पाप है या न मानना। इस विषयमें आपकी राय लिखिये।

इसके उत्तरमें निवेदन है कि पतिव्रता आर्य स्त्रीको निश्चय ही अपने पतिदेवका छायाकी भाँति अनुसरण करना चाहिये। पतिकी बात तो क्या, उसकी प्रत्येक रुचिका आदर करके उसे सिर चढ़ाना चाहिये। अन्यान्य सब धर्मोंको छोड़कर केवल पतिके प्रसन्नता-सम्पादनको ही अपना परम और एकमात्र धर्म मानना चाहिये। पतिके लिये, ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जिसका त्याग पतिव्रता नहीं कर सकती। परन्तु केवल इसी सिद्धान्तपर मूर्खताके साथ चिपटे रहनेके दुराग्रहसे काम नहीं चलता। धर्म दो तरहके होते हैं—सामान्य और विशेष। सामान्य धर्म सबपर लागू होता है और विशेष धर्मका विशेष परिस्थितिमें विशेष व्यक्तियोंद्वारा ही धारण होता है। शाण्डिलीजी असाधारण देवी थीं। उन्होंने पातिव्रतके विशेष धर्मका ही अवलम्बन किया था। इससे उनमें ऐसी शक्ति आ गयी थी कि उनके कह देनेमात्रसे सूर्यका उदय होना रुक गया। जो इस प्रकारकी विशेष धर्मयुक्त शक्तिमती देवी हों, वे शाण्डिलीकी तरह पतिदेवको वेश्याके यहाँ ले जायँ तो भी कोई हर्ज नहीं। उनका वह विशेष धर्म उनकी रक्षा करेगा और उनके पतिको भी पाप-कर्मसे बचा लेगा। ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं कि विशेष धर्मवाली पतिव्रता देवीने पतिकी आज्ञासे पर-पुरुषके पास जाना स्वीकार कर लिया। परन्तु जब वह पर-पुरुषके पास पहुँची तो उसके पातिव्रत-तेजसे उस पुरुषका चित्त शुद्ध हो गया और वह उसे माता कहकर चरणोंमें लोट गया। परशुरामने पितृ-भक्तिके विशेष धर्मको ग्रहण करके उनकी आज्ञासे अपनी सगी माता और तीन भाइयोंको मार दिया। परन्तु उनके विशेष धर्मने पितासे वरदान दिलवाकर उन चारोंको पुन: जिला दिया और उनको परशुरामके द्वारा मारे जानेकी बात भी उन्हें याद नहीं रही। परन्तु ये बातें सबके लिये नहीं होतीं। यह अनुकरण करनेकी चीज नहीं है। सामान्य धर्ममें पतिव्रता पत्नीको, पितृभक्त पुत्रको, गुरुभक्त शिष्यको और स्वामिभक्त सेवकको अपने पति, पिता, गुरु और स्वामीकी वहींतककी आज्ञाओंका पालन करना चाहिये, जिनके पालनसे आज्ञा देनेवालोंको पाप न होता हो।

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अपनी हानि हो, अपने नरकमें जानेकी सम्भावना हो, वहाँतककी आज्ञा भी मानी जा सकती है; परन्तु जिस आज्ञाके पालनसे आज्ञा देनेवालेको नरकमें जाना पड़े, ऐसी अशास्त्रीय आज्ञाको कभी नहीं मानना चाहिये। जैसे पति अपनी पत्नीको यदि पर-स्त्रीसे व्यभिचार करनेमें सहायता देनेकी या पर-पुरुषके साथ व्यभिचार करनेकी आज्ञा दे तो उसे कभी नहीं मानना चाहिये। जैसे पिता किसी दूसरेका अहित करनेकी, चोरी-डकैती, खून या व्यभिचार आदिकी आज्ञा दे अथवा स्वयं चोरी, जारी, हिंसा आदि पापकर्म करता हो और उसमें सहायता करनेकी आज्ञा दे तो उसे नहीं मानना ही कर्तव्य और धर्म है। पापबुद्धि और पापचेष्टाका समर्थन करना भी पाप है, फिर पाप करना तो पाप होगा ही और जो इस प्रकार किसीको—पत्नी, पुत्र, शिष्य या सेवकको पापमें लगावेगा, वह भी प्रेरक और समर्थक होनेसे पापका भागी होगा ही। ऐसी हालतमें उसकी आज्ञा न माननेमें ही उसका और अपना कल्याण है। आपके पत्रसे, जब कि आप शाण्डिलीका उदाहरण देनेकी बात लिखते हैं, ऐसा अनुमान होता है कि आपने अवश्य ही किसी पापकार्य करने या करानेके लिये अपनी धर्मपत्नीको आज्ञा दी होगी और उन्होंने उसे पाप बतलाकर माननेसे इनकार किया होगा। यदि ऐसी बात है तो मेरी समझसे उन्होंने बहुत ठीक किया है और ऐसा ही सबको करना भी चाहिये। और आपको भी उनपर नाराज न होकर अपना सौभाग्य मानना चाहिये और अपनी पत्नीका कृतज्ञ होना चाहिये कि जो वे आपको पाप-पथपर चलनेसे रोकती हैं। पति-पत्नीका परस्पर सच्चे मित्रका नाता है और मित्रका धर्म है—‘मित्रको कुमार्गसे हटाकर सुमार्गपर चलाना।’ (‘कुपथ निवारि सुपंथ चलावा।’)

पतियोंने, पिताओंने, गुरुओंने और मालिकोंने अपने अधिकारका और शास्त्रकी आज्ञाओंका बड़ा दुरुपयोग किया है, और बहुत अनुचित लाभ उठाया है। पतियोंने अपनेको परमेश्वर बतलाकर भोली स्त्रियोंसे अपनी नारकीय पापवासनाकी पूर्तिमें सहायता प्राप्त की, पिताओंने अपनी स्वार्थसिद्धिके लिये पुत्रोंको पाप-पथपर अग्रसर किया, गुरुओंने अपनी निन्दनीय इच्छाओंकी पूर्तिके लिये शिष्य-शिष्याओंको कुमार्गपर चलाया और मालिकोंने अपने जघन्य स्वार्थ-साधनके लिये सेवकोंको चोर, डाकू, हिंसक और बदमाश बनाया। आज बड़ोंके प्रति छोटोंका जो अनादर देखा जाता है, उसमें एक कारण यह भी है, जो प्रतिक्रियाके नियमके अनुसार अनिवार्य था।

सचमुच आपकी पत्नी बुद्धिमती हैं और साथ ही आपकी सच्ची हितैषिणी भी हैं। आप उनका उपकार मानिये और उनकी बुद्धिमत्तासे लाभ उठाकर अपने जीवनको पवित्र बनाइये। कभी भी शाण्डिलीजीका उदाहरण देकर उनके द्वारा अपनी पापवासना-पूर्तिकी चेष्टा मत कीजिये। शाण्डिलीजीका आचरण अपवाद है, सर्वसाधारणके लिये नियम नहीं। हाँ, पतिकी पवित्र सेवामें अपने तन-मन-धनका उत्सर्ग कर देना स्त्रीका पवित्र धर्म है और उसका उसे अवश्य पालन करना चाहिये। याद रखना चाहिये, पत्नीकी बुद्धिमें पति परमेश्वर है; परन्तु पति अपनेको परमेश्वर समझकर पत्नीको गुलाम समझे—यह सर्वथा अनुचित है। पत्नी अर्धांगिनी है और पतिके द्वारा सदा ही सम्मान तथा सद्‍व्यवहार प्राप्त करनेकी अधिकारिणी है।

मेरे पत्रमें कुछ कटुता आ गयी हो तो कृपया क्षमा करें।