पूजा-प्रतिष्ठासे बचिये
प्रिय महोदय, सादर-हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। धन्यवाद! आपने लिखा कि ‘समय बहुत अच्छा बीत रहा है, भजन-साधनके साथ ही मैं आजकल प्रवचन भी करता हूँ, बहुत लोग सुननेको आते हैं, लोगोंका प्रेम तथा उत्साह उत्तरोत्तर बढ़ रहा है।’ सो बहुत आनन्दकी बात है। भगवान्के प्रति लोगोंमें प्रवृत्ति हो, उनका उत्साह-उल्लास बढ़े और वे भजन-साधन करनेमें लगें—यह बहुत ही उत्तम बात है। जो लोग स्वयं भगवान्का स्मरण करते हैं और दूसरोंसे करवाते हैं, वे निश्चय ही धन्य हैं। एक प्राचीन श्लोक मिलता है—
ते सभाग्या मनुष्येषु कृतार्था नृप निश्चितम्।
स्मरन्ति ये स्मारयन्ति हरेर्नाम कलौ युगे॥
‘मनुष्योंमें वे लोग धन्य हैं और निश्चय ही कृतार्थ हैं, जो इस कलियुगमें स्वयं भगवान्के नामका स्मरण करते हैं और दूसरोंसे करवाते हैं।’
इस दृष्टिसे आपका कार्य बहुत ही सराहनीय है। परन्तु एक सुहृद्के नाते मेरा आपसे निवेदन है कि आप सदा-सर्वदा आत्मनिरीक्षण करते रहियेगा। आप शुद्ध वैराग्यके भावसे, केवल भगवत्स्मरण एवं भजन-ध्यानके लिये ही घरसे निकले हैं—ऐसा आप मानते हैं। अतएव यह ध्यान रखिये कहीं वैराग्य और भजनके पवित्र स्थानमें बड़प्पनका या गुरुपनका अभिमान, मान-सम्मानकी इच्छा और लोगोंका मनोरंजन करके उनसे विषय प्राप्त करनेकी लालसा न जाग्रत् हो जाय।
पता नहीं लगता—जब मनुष्य भजन-साधन करने लगता है, घर त्यागकर संन्यासी हो जाता है, वैराग्यका अभ्यास करता है, आहार-विहार आदिमें संयम-नियमका पालन करता है, श्रीभगवन्नाम-गुण-कीर्तनमें कभी मस्त हो जाता है, तब सरल हृदयके नर-नारी उसे भक्त या महात्मा मानकर उसकी पूजा-प्रतिष्ठा करने लगते हैं, उससे उपदेश प्राप्त करके भवसागरसे पार होना चाहते हैं, उसे अपनी जीवन-नौकाका कर्णधार गुरु मानने एवं कहने लगते हैं और ऐसी स्थितिमें यदि इन बातोंमें उसे जरा भी रस आने लगता है तो संयम-नियमके साधन, भगवद्भजन तथा सत्संगके प्रभावसे जो कामना-वासनाएँ तथा दुर्गुण-दुर्विचार हृदयमें लुप्त-से हो गये थे, छिप गये थे, जिससे उसने मान लिया था कि मैं काम, क्रोध, लोभ, मान और मोहादिसे मुक्त हो गया हूँ, वे कामना-वासनाएँ और दुर्गुण-दुर्विचार पुन: प्रबलरूपमें जाग उठते हैं, जो उनकी सारी साधन-सम्पत्तिको सहज ही लूटकर उसके अन्दर धन-मान-प्रतिष्ठाकी प्रत्यक्ष और प्रबल भूख उत्पन्न कर देते हैं, जिससे उसका जीवन सचाईसे दूर हटकर निरी कृत्रिमताका तथा दम्भका केन्द्र बन जाता है। वह फिर अपने व्याख्यानों, प्रवचनों, कथाओं, कीर्तनों और प्रेम तथा ध्यानकी नकली भाव-भंगिमाओंसे उन नर-नारियोंको रिझाकर उनसे अपनी वासना-कामनाकी तृप्ति करनेके प्रयत्नमें लग जाता है। भलीभाँति आत्मनिरीक्षण करनेपर मनके इस दोषका पता लग सकता है। कभी मनकी ऐसी स्थिति मालूम दे तो सावधान हो जाना चाहिये तथा लोगोंके सामने किये जानेवाले व्याख्यानों, प्रवचनों एवं कीर्तनोंको छोड़कर एकान्तमें भगवान्के सामने रो-रोकर कातर प्रार्थना करके अपनी स्थिति रखनी चाहिये और उनसे रक्षाकी भीख माँगनी चाहिये।
आपको यह सर्वथा सावधानीके साथ देखते रहना चाहिये कि आपकी क्रिया और चेष्टा लोकरंजनार्थ—लोगोंको प्रसन्न करके अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये तो नहीं हो रही है। वे जब आपको फूलोंका हार पहनाते हैं, चन्दन लगाते हैं, मान-सम्मान करते हैं, पैर छूते हैं, भक्त, जीवन्मुक्त महात्मा, महाभागवत, महापुरुष या भगवान् कहकर सिर नवाते हैं, आपके आचरण, साधन या स्थितिकी बड़ाई करते हैं, आपको अपना पथप्रदर्शक या गुरु बनाना चाहते हैं, सरल हृदयसे अपनी दुरवस्थाको आपके सामने रखकर उससे त्राण करने और भगवत्प्रेम प्रदान करनेकी प्रार्थना करते हैं, उस समय आपका मन क्या कहता है। क्या उससे आपके मनमें उस समय आनन्द आता है? उस मान-सम्मान और पूजा-प्रतिष्ठामें रस, सुख तथा गौरवकी अनुभूति होती है? उन लोगोंकी इस पूजा-प्रतिष्ठा तथा मान-सम्मान करने एवं पैर पूजनेकी प्रवृत्तिको आप उत्साह देते हैं, उनकी भक्ति, श्रद्धा मानकर प्रसन्न होते हुए उसे अच्छा बतलाते हैं या इन सब कार्योंका विरोध करते हैं? विरोध करते हुए भी क्या आपके मनमें कभी ऐसी बात आती है कि विरोध करनेपर ये नर-नारी मुझे और भी अधिक ऊँची स्थितिका महात्मा या प्रेमी समझेंगे और मेरी इस विनम्रतापर विशेष मुग्ध होकर मेरा विशेष सम्मान करेंगे?
यदि आपको मान-पूजामें—चरणस्पर्श कराने आदिमें रस आता है, प्रसन्नता होती है, आप सुखका अनुभव करते हैं, अथवा ‘इसमें अपना एवं उनका कल्याण होगा’ ऐसा मानते-कहते हैं। दु:ख, संकोच और लज्जाका अनुभव नहीं होता, यह एक ‘महान् पतन करानेवाला साधनका प्रधान विघ्न’ है, ऐसा नहीं मानते तो निश्चय समझिये, आपका पतन हो रहा है। आप परमार्थके पुण्य-पथसे च्युत हो रहे हैं। ऐसी अवस्थामें सावधान हो जाइये।
धन और स्त्रीके संसर्गसे तो सदा-सर्वदा सर्प तथा अग्निसे बचनेकी तरह सर्वथा बचे ही रहिये; मान, प्रतिष्ठा, पूजा, यश, कीर्तिकी भी कभी जरा भी इच्छा मत कीजिये।
यह बड़े आश्वासनकी बात है कि आप अपनी कमजोरियोंको स्वीकार करते हैं और अपनी मानस-स्थितिको समझते हैं; पर इतनेपर भी आप उन कार्योंको कर ही रहे हैं, जिनका परिणाम आपके लिये अहितकर हो सकता है—यह अवश्य दु:खकी बात है। मेरी रायमें अभी आपको चाहिये कि आप दूसरोंको उपदेश देना बन्द कर दें। पूजा-प्रतिष्ठाको कभी स्वीकार न करें। किसीको चरण न छूने दें। वर्तमान स्थानको छोड़ दें और कहीं अन्यत्र जाकर नियमपूर्वक भजन करें। भजनमें इतना समय लगायें कि थोड़ी देर सोने तथा शौच स्नान-भोजनादिके अतिरिक्त दूसरी बातके सोचने तथा दूसरा काम करनेके लिये अवकाश ही नहीं मिले। स्त्रियोंसे एकान्तमें कभी न मिलें, न बातचीत करें, न किसी अकेली स्त्रीके घर भिक्षा आदिके लिये जायँ और न किसी स्त्रीको मन्त्र दें।
आप तो नये साधक हैं। सिद्ध महापुरुष भी वैसे ही आचरण करते हैं, जिनसे उनका अनुकरण करके इतर लोग सन्मार्गपर आरूढ़ रहें। स्वयं भगवान्ने गीतामें कहा है—
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रित:।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा: प्रजा:॥
(३। २१—२४)
‘श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, इतर लोग भी उसीका अनुकरण करते हैं। वह जो कुछ भी प्रमाण कर देता है, लोग उसीका अनुवर्तन करते हैं। अर्जुन! मेरे लिये त्रिलोकीमें कोई भी कर्तव्य नहीं है, न कोई प्राप्त होने योग्य वस्तु ही मुझको अप्राप्त है; तथापि मैं कर्ममें ही बर्तता हूँ। यदि मैं कदाचित् सावधानीके साथ आदर्श कर्माचरण न करूँ तो पार्थ! मानवसमुदाय सब प्रकारसे मेरे ही बताये मार्गपर चलने लगे अर्थात् आदर्श कर्मोंका परित्याग कर दे। इस प्रकार यदि मैं आदर्श कर्म न करूँ तो लोक उत्सन्न हो जायँ और मैं संकरताका कारण बनूँ तथा इस सारी प्रजाका नाश करनेवाला होऊँ।’
जब इस प्रकार स्वयं भगवान् और जनकादि सिद्ध पुरुष भी श्रेष्ठ आदर्श आचरण करना चाहते हैं तब आप तो साधक हैं। यह सत्य है कि नित्य समत्वमें स्थित परम श्रेष्ठ सिद्ध महापुरुषोंका यदि कहीं मान-सम्मान होता है तो उससे उनकी कोई हानि नहीं होती, तथापि वे भी उसे स्वीकार नहीं करते। असलमें मान-सम्मान होता है श्रेष्ठत्वका—सदाचार, सद्गुण, ऐश्वर्य, शक्ति, नि:स्वार्थभाव, त्याग, वैराग्य, भक्ति और ज्ञानका। ये सारी चीजें भगवान्की हैं; यदि किसीमें ये हैं तो भगवान्की दी हुई हैं। फिर वह इनके लिये अभिमान क्यों करे, भगवान्को मिलनेवाले सम्मान-गौरवका अधिकारी अपनेको क्यों समझे? जो लोग इस मान-सम्मानको अपनी प्राप्तव्य वस्तु समझकर स्वीकार करते हैं और फूल उठते हैं, वे तो अपना पतन ही करते हैं। सबसे अच्छी और लाभकी बात तो यह है कि इन्हें स्वीकार ही न किया जाय और यदि कहीं स्वीकार न करनेसे किसीको यथार्थमें दु:ख होता हो तो उतना ही स्वीकार करे, जितना शास्त्रमर्यादा और सदाचारके अनुकूल हो और उसको भी भगवान्के ही समर्पण कर दे। यही समझे कि यह सब भगवान्का ही मान-सम्मान है। मैं जो निमित्त बनाया गया हूँ, इससे मालूम होता है कि इसमें कहीं-न-कहीं मेरी कोई वासना ही कारण है। और भगवान्से प्रार्थना करे कि वे इस मीठे विषसे सदा बचाते रहें।