प्रेमसे ही सुधार हो सकता है

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला, समाचार जाने। आपका लिखना यदि सत्य है और उसके सच्चे सबूत आपके पास हैं, तब तो वे भाई लोग अवश्य ही बड़े दोषी हैं और इस हालतमें उनके साथ सब प्रकारका व्यवहार छोड़ देना चाहिये। उनको कभी घरमें नहीं आने देना चाहिये। लड़ाई-झगड़ा न करके शान्तभावसे ही ऐसा निश्चय कर लेना उत्तम है। लड़ाई-झगड़ेमें कटुता बढ़ती है, बदनामी फैलती है और अपने मान-सम्मानको भी धक्‍का पहुँचता ही है। पत्नीको पिताके घर न रखकर अपने घर ही रखना चाहिये और अपने सद्‍व्यवहारके द्वारा उसके हृदयमें परिवर्तन हो, ऐसा प्रयत्न करना चाहिये। दोष सभीसे होते हैं। भगवान् ही बचाते हैं। यदि हम किसीको दोषी साबित करके उसके दोषकी घोषणा कर देंगे तो इसमें कोई लाभ न होगा। वह पक्‍का अपराधी बन जायगा। इसके स्थानपर यदि हम उससे प्रेम करेंगे और अपने सद्‍व्यवहारके द्वारा उसके हृदयको जीत लेंगे तो सम्भव है उसका जीवन सुधर जाय एवं वह पवित्र आचरण करने लगे। इसलिये दोषीके दोषसे तो घृणा करनी चाहिये, पर दोषीसे नहीं। उसे दोषमुक्त करनेका प्रयत्न करना चाहिये। जैसे किसी भयानक रोगमें रोगीके रोगनाशके लिये निपुण चिकित्सक उसे कुचला, भिलावा, संखिया, अफीम और सर्पविष आदि विष भी दवाके रूपमें देते हैं—पर देते उतनी ही मात्रामें तथा वैसे ही ढंगसे हैं जिससे रोगीपर विषका असर उतना ही हो, जितना उसके रोगनाशके लिये आवश्यक है। इसी प्रकार कभी-कभी हित-कामनासे कटु व्यवहार भी करना पड़े तो कोई आपत्ति नहीं, परन्तु उस समय भी मनमें प्रेम तथा हितके भाव ही होने चाहिये। द्वेष तथा दु:ख पहुँचाकर सुखी होनेके नहीं। ऐसा व्यवहार वस्तुत: वही कर सकता है जो राग-द्वेषसे छूटा हुआ हो। राग-द्वेष होनेपर साधारणत: ऐसे व्यवहारमें भूल हो जाया करती है। इसलिये जहाँतक सम्भव हो, व्यवहार मधुर ही करना चाहिये। साथ ही सावधानी रखनी चाहिये, जिससे भविष्यमें इस प्रकारके दोष बननेका अवसर ही न आवे। ऐसे पाप एकान्त पानेपर हुआ करते हैं। अत: एकान्तसे बचना चाहिये तथा पुरुष-संसर्ग न हो, इसके लिये सावधान रहना चाहिये। शास्त्रोंमें यह स्पष्ट आदेश है—

तप्तांगारसमा नारी घृतकुम्भसम: पुमान्।

तस्माद् वह्निं घृतं चैव नैकत्र स्थापयेद् बुध:॥

(चाणक्य०)

मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत्।

बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥

(मनु०)

‘स्त्री जलती हुई आगके समान है और पुरुष घृतसे भरे घड़ेके समान। बुद्धिमान् पुरुष घी और अग्निरूप स्त्री-पुरुषको कभी एक स्थानपर न रखे।’

‘माता, बहिन और पुत्रीके साथ भी एकान्तमें एक साथ नहीं बैठना चाहिये। बलवान् इन्द्रियाँ विद्वान‍्को भी विषयकी ओर खींच लेती हैं।’

आप भगवान् श्रीकृष्णके विग्रहकी पूजा करते हैं। दैवी सम्पत्तिके गुणोंको धारण करना चाहते हैं और काम-क्रोधपर विजय प्राप्त करना चाहते हैं—सो बड़े आनन्दकी बात है। विपरीत परिस्थितिमें ही इसकी परीक्षा होती है। आप श्रीमद्भगवद‍्गीताका अर्थ समझकर पाठ करते रहिये। भगवान‍्का नाम-जप तथा प्रार्थना करते रहिये। आपकी पत्नीको सद‍्बुद्धि मिले, इसके लिये भी भगवान‍्से प्रार्थना कीजिये। पत्नीको मैकेमें न रखकर अपने घरपर रखिये और उसके साथ प्रेमयुक्त यथायोग्य व्यवहार करके उसका सुधार कीजिये। आपके घर रहनेपर वह मांस खाना आप ही छोड़ देगी।

घर छोड़कर एकान्तवास करनेमें लाभ नहीं होगा। घरमें ही रहकर अपनी साधनाकी रक्षा करते हुए भगवान‍्की कृपाके बलपर घरका सुधार कीजिये। भगवान‍्की कृपासे कुछ भी असम्भव नहीं है, इसपर विश्वास कीजिये। साधुवृत्ति मनमें रखिये और उसे बढ़ाइये। उसको बाहर प्रकट करनेकी क्या आवश्यकता है। आपके बच्चे हैं, उनके लिये भी आपका घरमें रहना आवश्यक है।

संसारका यही स्वरूप है। इस घरके तो यही तमाशे हैं। तमाशोंकी भाँति इन्हें देखते रहिये और इस तमाशेमें जहाँ अपने स्वाँगके अनुसार जो खेल करना हो, उसे सावधानीसे पूरा करते रहिये—भगवान‍्की आज्ञा मानकर उन्हें सदा स्मरण करते हुए, उन्हींकी प्रसन्नताके लिये ही। भगवान‍्के इस जगन्नाटकमें हम सभी पात्र हैं और सभीको ईमानदारीके साथ अपने-अपने जिम्मेका अभिनय सुचारु रूपसे करना चाहिये—यही निष्काम कर्मयोग भी है।