रासलीला निर्दोष है

सप्रेम हरिस्मरण। श्रीमद्भागवतमें रासके पश्चात् राजा परीक्षित् ने जो शंका की है, उसको तो आपने ग्रहण कर लिया है; परन्तु समाधानके अंशको भलीभाँति नहीं पढ़ा है। उसमेंसे एक अंशको लेकर आपने असन्तोष प्रकट किया है। मेरा निवेदन है कि आप श्रीमद्भागवतके दशमस्कन्धके अध्याय ३३ में ३० से ४० तकके श्लोकोंके भावको भलीभाँति हृदयंगम करें।

भगवान् श्रीकृष्ण सर्वव्यापी परमेश्वर हैं, सबके आत्मा हैं; वे समस्त विश्वब्रह्माण्डोंके समस्त स्त्री-पुरुषोंके भीतर रम रहे हैं। वे ही स्त्री हैं और वे ही पुरुष हैं। वे एक साथ सहस्रों और लाखों रूपोंमें प्रकट होते हैं और अपनी ह्लादिनी शक्तिसे आविर्भूत आत्मस्वरूपा श्रीगोपियोंके साथ ही रास करते हैं। उनका यह दिव्य रास नित्य-निरन्तर चलता रहता है और उसी परम मधुर आनन्द-रस-सागरकी एक क्षुद्रतम बूँदका आभास पाकर जगत‍्के समस्त प्राणी आनन्दकी अनुभूति करते हैं। भगवान‍्के लिये न तो कोई अपना है, न पराया; भगवान‍्से मिलनेका सौभाग्य उसी जीवको प्राप्त होता है, जो अनन्त जन्मोंकी साधनासे भगवत्कृपा-प्रसादका अधिकारी बन चुका है। श्रीगोपांगनाओंने यह अधिकार प्राप्त किया था। उनमें श्रुति, देवी, ऋषि-मुनि आदि सभी सम्मिलित होकर पवित्रतम गोपीभावके दिव्य मधुर रसका समास्वादन कर अपने जन्म और जीवनको धन्य करते थे। क्या संसारके दुष्ट प्राणी या दुराचारी मनुष्य भगवान‍्की इस परम दिव्य लीलाका अनुकरण कर सकते हैं? क्या उनमें भी वे सभी अलौकिक बातें सम्भव हैं, जो साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णमें हैं? यहाँ मैं श्रीशुकदेवजीके समाधानमेंसे दो-तीन श्लोक उद‍्धृत करता हूँ—

गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्।

योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्ष: क्रीडनेनेह देहभाक्॥

अनुग्रहाय भूतानां मानुषं देहमास्थित:।

भजते तादृशी: क्रीडा या: श्रुत्वा तत्परो भवेत्॥

नासूयन् खलु कृष्णाय मोहितास्तस्य मायया।

मन्यमाना: स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकस:॥

(श्रीमद्भा०१०।३३।३६—३८)

अर्थात् ‘गोपियोंके, उनके पतियोंके तथा सम्पूर्ण देहधारियोंके अन्त:करणमें जो आत्मारूपसे विराजमान हैं, जो सबके साक्षी एवं परम पति हैं, वे ही भगवान् लीलाके लिये यहाँ दिव्य चिन्मय मंगल विग्रहरूपमें प्रकट होते हैं। श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जीवोंपर कृपा करनेके लिये ही मनुष्य-शरीरका आश्रय लेते हैं और ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिनका श्रवण करके जीव भगवत्परायण हो जायँ। व्रजवासी गोपोंने भगवान् श्रीकृष्णमें तनिक भी दोषदृष्टि नहीं की। वे उनकी योगमायासे प्रभावित थे, उन्हें ऐसा प्रतीत होता था कि उनकी पत्नियाँ उन्हींके पास सो रही हैं।’

इन पंक्तियोंमें भगवान‍्के स्वरूप, उनकी लीलाकी दिव्यता, लीलाके मंगलमय उद्देश्य तथा श्रीभगवान‍्के अचिन्त्य माहात्म्यपर प्रकाश पड़ता है। गोपांगनाओंके स्थूल शरीर पतियोंके पास थे, वे पवित्र रस-भावमय देहसे भगवत्-मिलनका दिव्य आनन्द प्राप्त कर रही थीं। आत्मा और परमात्माका मिलन दिव्य देहसे ही सम्भव है। वहाँतक स्थूल शरीरकी पहुँच कहाँ? आप श्रीभगवान‍्के स्वरूपको तथा गोपियोंके तत्त्वको समझें और रासलीलाकी दिव्यतापर दृष्टि रखें। आपको पता लगेगा इसमें लौकिक कामक्रीड़ाकी गन्ध भी नहीं है।