सच्चा विचारस्वातन्त्र्य

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। उत्तर देरसे जा रहा है। क्षमा करें। विचार-स्वातन्त्र्यका अर्थ मनमाना आचरण करना नहीं है। ‘मेरे मनको जो अच्छा लगेगा, मेरी इन्द्रियाँ जिसमें सुख मानेंगी, मैं वही करूँगा, किसी भी नियम-संयममें, बन्धनमें नहीं रहूँगा। किसीकी हानि हो या लाभ, अपना भी नैतिक पतन हो या उत्थान, मैं इसकी परवा नहीं करूँगा। मेरी स्वतन्त्रताके आगे किसीका भी कोई मूल्य नहीं है—ऐसा मानना विचारस्वातन्त्र्य नहीं है। यह तो यथेच्छाचार है और प्रत्यक्ष ही मन-इन्द्रियोंकी गुलामी है। जो मन-इन्द्रियोंका गुलाम बनकर उनकी तृप्तिके लिये विवेकशून्य यथेच्छ आचरण करता है, वह स्वतन्त्र कहाँ है; असलमें तो वही परतन्त्र है। जो शरीरसे परतन्त्र है, पर मन-इन्द्रियोंपर जिसका अधिकार है, जो उनके वशमें नहीं है, पर वे ही जिसके वशमें हैं, वही वस्तुत: स्वतन्त्र है। इस स्वतन्त्रताके लिये नियमोंकी आवश्यकता है, संयमकी आवश्यकता है एवं नित्य अन्दर छिपे रहनेवाले काम-क्रोध, ईर्ष्या-असूया, राग-द्वेष, दम्भ-हिंसा आदि शत्रुओंके पूर्ण दमनकी आवश्यकता है। जो मन-इन्द्रियोंको दोषोंसे रहित और नित्य संयमके बन्धनमें रखता है, वही बन्धनसे छूटता है। यह बन्धन मुक्तिके लिये होता है और इस बन्धनसे छूटना नित्य बन्धनमें बँधना होता है।

भगवान‍्ने गीतामें कहा है—‘समस्त पाप कामनासे होते हैं और कामना मन-इन्द्रियोंमें रहती है। आत्मा मन-इन्द्रियोंका दास नहीं, उनका स्वामी है, उनसे श्रेष्ठ है, इस प्रकार विचारकर कामरूपी शत्रुको मार डालना चाहिये।’ वस्तुत: यह सर्वथा सत्य है। आत्मामें बड़ी शक्ति है। यदि आत्माकी मूक सम्मति न हो और वह बलपूर्वक मन-इन्द्रियोंको रोके रहे तो मन-इन्द्रियोंमें शक्ति नहीं कि वे आत्माके विरुद्ध किसी भी पापमें प्रवृत्त हो सकें। पर हम जब अपनेको असमर्थ मानकर मन-इन्द्रियोंकी गुलामी स्वीकार कर लेते हैं, तब इन्द्रियाँ अन्धे घोड़ोंकी भाँति मनरूपी लगामके साथ ही शरीररूपी रथको, उसमें सवार रथी (हम)-को और बुद्धिरूपी सारथीको चाहे जिस गड्ढेमें ले जाकर डाल देती हैं और परिणाममें लगातार दु:खोंका भोग करना पड़ता है। भगवान‍्ने कहा है—

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते।

प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते॥

(गीता २।६४-६५)

‘स्वाधीन अन्त:करणवाला पुरुष राग-द्वेषरहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका (वैध) भोग करता हुआ प्रसन्नताको प्राप्त होता है और उस प्रसन्नतासे उसके सारे दु:खोंका नाश हो जाता है एवं फिर उस प्रसन्नचित्त पुरुषकी बुद्धि शीघ्र ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है।’

विषयोंका सेवन बुरा नहीं है, पर वह किया जाना चाहिये इन्द्रियोंको वशमें करके। उनके वशमें होकर नहीं। जो ऐसा पुरुष है वही स्वतन्त्र है और उसीके विचार भी स्वतन्त्र हैं। वह स्वयं बन्धनमुक्त होता है और दूसरोंको भी बन्धनसे मुक्त करता है। पर जो स्वयं बन्धनमें है, उसका दूसरोंको मुक्त करनेकी बात करना तो पागलपनमात्र है।