सच्ची चाहका स्वरूप

सादर हरिस्मरण। आपका ११ दिसम्बरका कृपापत्र मिला। आपने मेरे प्रति जो श्रद्धा और सद्भाव प्रकट किये हैं, यह आपके प्रेमकी बात है। मैं तो अपनेको इसका अधिकारी नहीं समझता। सम्पूर्ण चराचरके प्रेरक वे सर्वान्तर्यामी श्रीहरि ही हैं। मुझसे भी वे ही किसी इच्छाकी पूर्ति करा रहे हैं। इससे यदि आपको आनन्द मिलता है तो आपको उन्हींका कृतज्ञ होना चाहिये और उन्हींके दर्शनकी लालसा बढ़ानी चाहिये।

आपने जो प्रश्न किये हैं, उनके विषयमें जैसे मेरे विचार हैं, नीचे निवेदन करता हूँ—

१—सच्ची चाहका स्वरूप यह है कि फिर चाही हुई वस्तुके बिना जीना कठिन हो जाता है। सच्ची चाहका रूप होता है अनिवार्य आवश्यकता। उस एक वस्तुके सिवा और किसीकी चाह तो बहुत पहले विदा हो जाती है। जब प्रेमी अपने इष्टके बिना रह नहीं सकता तो उसे दर्शन देना ही पड़ता है। फिर खाना-पीना, सोना-जगना, उठना-बैठना सभी भार हो जाता है। सच्ची चाह उत्पन्न होनेके बाद फिर दर्शनोंमें देरी नहीं लगती।

२—सच्ची चाह निष्काम होनी चाहिये—इसमें तो कहना ही क्या है? यदि हमें भगवान‍्से उनके सिवा कुछ और लेनेकी लालसा होगी तो वे उसे ही देंगे, अपनेको क्यों देंगे? पूर्वकालमें सकाम उपासना करनेवालोंको भी दर्शन हुए हैं। परन्तु इस प्रकारके दर्शन भगवत्प्रेमकी तत्काल वृद्धि नहीं करते। उन्हें दर्शनानन्दकी यथार्थ प्राप्ति प्राय: नहीं होती। वे केवल भोग या मोक्ष ही पा सकते हैं, प्रेम नहीं।

३—चाहको बढ़ानेका एकमात्र उपाय यही है कि भोगोंको अनित्य और दु:खोत्पादक समझकर उनकी सब इच्छाएँ छोड़ दी जायँ। जबतक दूसरी कोई भी कामना रहेगी तबतक भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा तीव्र नहीं हो सकती।

४—निरन्तर ध्यानके लिये तो निरन्तर ध्यानकी ही जरूरत है। जहाँ काम और ध्यान दोनों हैं, वहाँ तो दोनों ही रहेंगे। एक साथ दो बातें कैसे रहेंगी? तथापि जबतक वैसी लगन नहीं लगी है तबतक ऑफिसके कामको भी उन्हींका काम समझकर कीजिये और काम करते हुए यथासम्भव उनका नाम-जप और चिन्तन भी चलाइये।

५—सोते हुए जप या ध्यान कैसे हो सकता है? निद्रा और जप एक कालमें तो रह ही नहीं सकते। निद्रामें वृत्ति लीन रहती है और वह उसी विषयमें लीन होती है जो निद्रा आनेके ठीक पूर्व क्षणतक रहता है। अत: जप-ध्यान करते-करते सो जाइये। ऐसा करनेसे जब आप उठेंगे तब भी आपको मालूम होगा कि उठते ही पुन: वही जप और ध्यान आरम्भ हो गया है। क्योंकि वृत्ति जिसमें लीन होती है, उसीसे उदित भी होती है। इस प्रकार निद्राके आगे-पीछे जपका सम्पुट रहनेसे निद्राकालमें भी मन जपमें ही लीन रहेगा।

६—साधनमें आप मुझसे जो सहायता चाहेंगे वह मैं यथाशक्ति अवश्य देनेका प्रयत्न करूँगा। आपको जो कुछ शंका हो प्रसन्नतासे पूछनेकी कृपा करें। पत्रका उत्तर देनेमें मुझे प्राय: देरी हो जाया करती है, इसके लिये मैं लाचार हूँ। शेष भगवत्कृपा।