सच्ची स्वतन्त्रता और विजय क्या है?
सप्रेम हरिस्मरण। आपका लम्बा पत्र मिला। आपने स्वतन्त्रता और विजयके सम्बन्धमें जो विचार प्रकट किये, अवश्य ही उनका अपने क्षेत्रमें किसी अंशमें महत्त्व है, परन्तु वास्तविक स्वतन्त्रता और विजय तो दूसरी ही है। सच्चा स्वतन्त्र वह है, जो मोहके बन्धनसे मुक्त हो गया हो और सच्चा विजयी वह है, जिसने अपने मन और इन्द्रियोंपर पूर्णरूपसे विजय प्राप्त कर ली हो। भौतिक बलसे भूमिपर तो काम-क्रोधपरायण राक्षसों और असुरोंका भी अधिकार हो सकता है। वे भी त्रैलोक्यविजयी होकर अपनेको परम स्वतन्त्र मान सकते हैं। प्राचीन कालके इतिहास और वर्तमानकी अनेक घटनाएँ इसमें प्रमाण हैं। परन्तु इन स्वतन्त्रताप्राप्त त्रैलोक्यविजयी व्यक्तियोंमें ऐसे कितने थे जो अपने मनकी कामना, वासनाओंको जीतकर काम, क्रोध, लोभरूपी आभ्यन्तरिक शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर चुके हों। ऐसा तो वे ही लोग कर पाते हैं, जो कठोर आत्मसंयमके नियमोंके बन्धनमें रहकर अपनेको इसका सुयोग्य अधिकारी बना लेते हैं। संयमके कठोर बन्धनसे ही मन-इन्द्रियोंके दासत्वकी बेड़ियाँ कटती हैं। जीव मन-इन्द्रियोंका स्वामी है, उनसे बलवान् और श्रेष्ठ है; परन्तु अपने बलको भूलकर वह इनका दास बना हुआ है और इनके वशमें होकर विषयोंमें आसक्त हो रहा है। फलत: नाना प्रकारके दुष्कर्म और पाप करनेमें प्रवृत्त होता है।
भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा था कि मन-इन्द्रियोंमें बसनेवाला और भोगोंकी बड़ी-से-बड़ी मात्रासे भी न अघानेवाला यह पापी काम ही मनुष्यका परम शत्रु है, यही क्रोध बन जाता है। अतएव महाबाहो! तुम इस कामरूपी भयंकर शत्रुको मारकर विजयी बनो—
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥
अतएव हमें इस वर्तमान बाहरी स्वतन्त्रतासे न तो फूलना चाहिये, न भूलना ही। स्मरण रखना चाहिये कि यदि इस स्वतन्त्रताने कहीं हमारे भीतरी शत्रु काम, क्रोध, लोभ, मद, मत्सरादिको बढ़ा दिया तो हमें और भी अधिक मन-इन्द्रियोंकी गुलामी स्वीकार करनी पड़ेगी, हम और भी अधिक पराजित और परतन्त्र हो जायँगे। इसलिये हमें अपने अन्तरात्माकी ओर देखना चाहिये और इसी कसौटीपर कसकर निर्णय करना चाहिये कि हम वास्तवमें आजाद हुए हैं या नहीं। आजादीके नामपर कहीं बर्बाद तो नहीं हुए जा रहे हैं!!
विचारस्वातन्त्र्य और व्यक्तिस्वातन्त्र्यकी दुहाई देकर प्रगतिके नामपर हम जो ऐसा कहते हैं कि ‘हम किसी शास्त्रको, समाजको, बन्धनको और नियमको नहीं मानते। हम तो वही करेंगे, जो हमारे मनमें उचित जँचेगा।’ इससे क्या यह सिद्ध नहीं होता कि हमारी मानसिक गुलामी बढ़ रही है और हम स्वतन्त्रताके नामपर उच्छृंखलताकी उपासनामें लगे हैं एवं ऐसा करके अपनेको अधिक-से-अधिक बन्धनोंमें बाँध रहे हैं। भगवान्ने गीतामें स्पष्ट कहा है—
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
(१६। २३)
‘जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर मनमाना आचरण करता है, वह न तो सिद्धिको प्राप्त करता है और न परम गतिको तथा परम सुखको ही।’
हमें भौतिक स्वतन्त्रताके साथ ही आत्माकी स्वतन्त्रता—जो सच्ची स्वतन्त्रता है—प्राप्त करनी चाहिये और बाहरी विरोधियोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके साथ ही अपने अन्दर बैठे हुए असत्य, हिंसा, काम, क्रोध, लोभ और वैर आदि शत्रुओंका भी समूल नाश करना चाहिये। यह काम भाषणों तथा लेखोंसे नहीं होगा। इसके लिये भगवत्कृपापर विश्वास करके साधना करनी पड़ेगी और यही अवश्य कर्तव्य है। भारतवर्षके पास तो यही परम धन है, जिसकी रक्षा और वृद्धि करके इसे जगत्के त्रितापतप्त जीवोंमें वितरण करना चाहिये। ऐसा न करके हम यदि स्वतन्त्रता और विजयकी झूठी शानका डंका पीटते रहेंगे तो कुछ भी नहीं बनेगा। आत्मा परतन्त्र ही रहेगा और उसका और भी पतन होगा। भगवान्ने गीतामें कहा है—
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:।
काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत्॥
(१६। २१)
‘काम, क्रोध और लोभ—ये तीन प्रकारके नरकके द्वार हैं और आत्माका पतन करनेवाले हैं। इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये।’