साधु-संन्यासियोंका स्त्रियोंके साथ कैसा व्यवहार हो?
सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपने लिखा कि ‘‘श्रीस्वामीजी.....तथा उनके शिष्य स्वामीजी.....ने कुमारी, सधवा, विधवा, युवती, वृद्धा—असंख्य स्त्रियोंको चेली बनाया है और वे उन्हें ईश्वरसे भी बढ़कर गुरुको समझनेका उपदेश करते हैं। भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने भी गुरुसेवा की थी, गुरुके चरणोंको दबाया था, उनकी पूजा की थी। अत: उनकी कृपासे ही वे राक्षसोंका संहार कर सके थे। इसलिये गुरुसेवा ही सार और मोक्ष देनेवाली है।’ ऐसा कहते हैं। स्त्रियोंसे चरण धुलवाकर उन्हें चरणामृत पान कराना, उनसे पगचम्पी कराना, हवा कराना, अपनी पूजा-आरती कराना आदि कराते हैं। और माता-पिता, भाई-बन्धु, सास-ससुर, यहाँतक कि पतितकके व्यवहारको झूठा बताकर गृहस्थियोंसे अच्छे-अच्छे माल हड़प करते हैं। कहते हैं सास-ससुर और पतिकी सेवा करना निस्सार है। गुरुकी सेवा ही मोक्षका साधन है। इस प्रकार घर-घरमें विद्रोह उत्पन्न करके वे उनसे अपनी सेवा कराते हैं।’’ इतना लिखकर आप पूछते हैं कि क्या ऐसे साधनसे मोक्षकी प्राप्ति होती है? क्या संन्यासियोंका गृहस्थ स्त्रियोंके साथ ऐसा सम्बन्ध होना चाहिये? इन स्वामीजीकी ये बातें कहाँतक ठीक है? क्या संन्यासियोंको स्त्रियोंको चेली बनाने, उन्हें चरणामृत देने, उनसे पैर दबवाने, एकान्तमें मिलने, अन्य प्रकारसे सेवा कराने तथा पूजा-आरती उतरवानेका अधिकार है और ऐसा करनेसे क्या उन स्त्रियोंका कल्याण हो सकता है?’
इसके उत्तरमें यही निवेदन है कि सच्चे गुरुकी महिमा ऐसी ही है। गुरुदेव जीवनके परम ध्येय भगवान्की प्राप्ति करानेवाले हैं, इस कारण शिष्यके लिये वे भगवान्से भी बढ़कर हैं, परन्तु ऐसे गुरु विलक्षण ही होते हैं। आपने जिन स्वामीजीकी तथा उनके शिष्यकी बात लिखी है, वे कैसे हैं—इसका तो मुझको पता नहीं। परन्तु जहाँतक संन्यास धर्मका सम्बन्ध है, इनके आचरण सर्वथा विपरीत और शास्त्रविरुद्ध हैं। साथ ही दूसरोंके लिये बहुत बुरे आदर्शरूप हैं। मेरी समझमें उन माता-बहिनोंकी भी बहुत बड़ी भूल है, जो अपने भोले स्वभावके कारण इस प्रकारकी बातोंमें आकर अपना अकल्याण कर रही हैं! शास्त्रकी सम्मति तथा सत्पुरुषोंके आचरणोंके अनुसार न तो किसी भी स्त्रीको पर-पुरुषका स्पर्श करना चाहिये और न किसी संन्यासी—त्यागीको स्त्रीमात्रका स्पर्श करना चाहिये। ऐसा करना पाप तो है ही, पापको बढ़ानेवाला भी है। इससे मोक्षकी प्राप्ति तो दूर रही, नरकोंमें जाकर वहाँकी भीषण यन्त्रणासे छुटकारा पाना भी कठिन है। यह मनुष्यका मोह है कि विषयासक्तिवश दुराचार करते समय मनुष्यको उसके भयानक परिणामका ध्यान नहीं रहता। इसीसे वह इस प्रकारके निषिद्ध आचरण करता है। जो लोग जड शरीरको महत्त्व देकर जान-बूझकर अपने पैर पुजवाना, चरणामृत पिलाना, स्त्रियोंसे पैर दबवाना, एकान्तमें मिलना, पूजा-आरती उतरवाना आदि करते-कराते हैं, वे मोहग्रस्त और दयाके पात्र हैं। ऐसा करने-करानेमें दोनोंमेंसे किसीका कल्याण नहीं है। हाँ, एक ऐसी स्थिति भी होती है, जिसमें मीराँकी भाँति भगवत्प्रेमके विवश होकर घर-द्वार छोड़ दिया जाता है। भगवान् बुद्ध तथा चैतन्यदेवकी भाँति घरके लोगोंको रोते-बिलखते छोड़कर चले जाना पड़ता है; परन्तु वैसी स्थिति सबकी नहीं होती। किसीको वैसा प्रेम एवं वैराग्य हो तो फिर किसी भी अन्य कर्तव्यका भार उसपर नहीं रहता। बीमारी, असमर्थता अथवा विशुद्ध वात्सल्य या स्नेहके कारण ऐसी स्थिति भी कहीं-कहीं होती है जहाँ पैर छुलाना, सेवा कराना आदि स्वीकार करना पड़ता है या ऐसी बाह्यज्ञानशून्य स्थिति होती है जिसमें न तो पैर पूजनेका पता रहता है और न सिरपर जूतियाँ लगनेका। पर ये सब असाधारण स्थितियाँ हैं। दूकान खोलकर स्त्रियोंको चेली बनाना, उनसे निषिद्ध सेवा कराना और एकान्तमें मिलना आदि तो प्रत्यक्ष अनाचार हैं और आजकल अध्यात्मके नामपर ये खूब चल रहे हैं! पर इनसे प्राय: सर्वत्र ही हानि होती है। ऐसे करानेवाले अधिकांश लोगोंकी नीयतमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दोष रहता है। कुछ लोग सरलतासे भी ऐसा करते हैं; परन्तु अपना कल्याण चाहनेवाले बुद्धिमान् पुरुषोंको इन दोषोंसे अवश्य बचना चाहिये और स्त्रियोंको तो इससे सर्वथा दूर ही रहना चाहिये। साधु-महात्माओंमें श्रद्धा-भक्ति इतनी ही होनी चाहिये कि उन्हें सच्ची श्रद्धा तथा आदरपूर्वक भिक्षा करायी जाय। उनके शरीरकी स्थितिके अनुसार उनके आरामकी यथासाध्य और यथायोग्य निर्दोष शास्त्रसम्मत व्यवस्था की जाय। और उनके शास्त्रविहित उपदेशोंके अनुसार जीवन बनाया जाय। साधु-संन्यासियोंको धन देना, विलासकी सामग्री देना या जिनसे उनके मन-इन्द्रियोंमें विकार उत्पन्न होना सम्भव हो, ऐसी कोई भी क्रिया करना तो उन्हें सत्पथसे गिराना है और एक प्रकारसे पाप करना है। गृहस्थोंको यह बात खूब समझ रखनी चाहिये। विशेष भगवत्कृपा।