साध्वी पत्नीका त्याग बड़ा पाप है

श्रीगोयन्दकाजीके नाम खूँटीके एक भाईका पत्र आया है। पत्र-लेखकने अपना नाम नहीं लिखा है। वे लिखते हैं कि—‘‘विवाहसे पहले मैंने माताजीसे कहा था कि मैं विवाह नहीं करूँगा। इसपर पिताजीने कहा कि—‘तुम्हारी यदि विवाहकी इच्छा नहीं है तो वृन्दावन जाकर भजन करो, जिससे मुझे तुम्हारे विवाहके लिये कर्ज भी नहीं करना पड़ेगा, तुम्हारी विवाह न करनेकी इच्छा पूरी हो जायगी और हमलोगोंको लड़कीवालोंसे यह कहनेका बहाना मिल जायगा कि लड़का भाग गया। हमलोग लाचार हैं।’ इसपर मैंने उनसे कहा कि ‘आप अपनी ओरसे काम बन्द न करें। लड़कीवाला आप ही मने कर देगा।’ मैंने यह बात एक प्रतिष्ठित पण्डितके भरोसे कह दी। पर ऐसा नहीं हुआ और मेरा विवाह गत वर्ष हो गया। मेरी पत्नी सरल, साध्वी, शीलवती और भगवत्सेवामें दृढ़ प्रेम रखनेवाली है। वह मेरी सेवा करना चाहती है। मेरे गुरुजन मुझे सिर्फ उससे बोलने और सेवा स्वीकार कर लेनेको कहते हैं। मैं ‘हाँ’ भर लेता हूँ पर ऐसा मुझसे होता नहीं। मेरे मनमें आता है कि मुझे चाहे नरक क्यों न भोगना पड़े, मैं अपनी जिद्द नहीं छोड़ूँगा, स्त्रीकी सेवा स्वीकार न करूँगा, न उससे बोलूँगा। मैं उसे त्याग देना चाहता हूँ और इसपर आपकी सम्मति चाहता हूँ।’’

इस विचारमें सिवा मिथ्या हठ, प्रमाद एवं बेसमझीके और कुछ भी नहीं है। विवाह न करना था तो पहले ही दृढ़ रहते, पिताकी बात मानकर स्पष्ट कह देते और भजनमें लगते। बिना इच्छाके किसीका विवाह कौन कर सकता है? इच्छासे विवाह किया, पत्नी बेचारी सरलहृदया, साध्वी तथा सेवापरायणा भी है, पर आप उसका त्याग करना चाहते हैं हठवश। यह हमारी समझसे तो एक मूर्खतापूर्ण पाप है। दृढ़ वैराग्यवान् पुरुषोंके लिये भी ऐसी स्थितिमें विचार करना आवश्यक हो जाता है। फिर आपकी तो स्थिति ही दूसरी है। हमारा आपसे बलपूर्वक अनुरोध है कि आप इस प्रकारके पापभरे विचारोंको छोड़कर साध्वी पत्नीका आदर करें, उससे प्रेम करें और उसे निर्दोष सुख पहुँचानेका प्रयत्न करें।

आपका मन शीलधर्म पालन करनेका अथवा अधिक-से-अधिक संयम रखनेका हो तो पति-पत्नी दोनों सोच-समझकर अपने लिये संयमका नियम बना लें और उसीके अनुसार जीवनमें व्यवहार करें; परन्तु त्यागकी तो कल्पना ही छोड़ दें। यदि आप हठवश साध्वी पत्नीका त्याग करनेकी बात सोचेंगे और वैसा करने जायँगे तो आपके लिये यह बहुत बड़ी मूर्खता और बड़े पापका कार्य होगा, और पीछे आपको बहुत पश्चात्ताप करना पड़ेगा! आशा है आप हमारी बात अवश्य मानेंगे और हमें तुरन्त सूचना देंगे कि आपने हमारी सम्मति स्वीकार करके पत्नीके त्यागका विचार सर्वथा छोड़ दिया है और उनसे सप्रेम मिलने-बोलने लगे हैं।