सहभोजसे हानि

प्रिय महोदय! सप्रेम राम-राम। आपका कृपापत्र मिला। आपने मेरे पूर्वपत्रके लिये कृतज्ञता प्रकट की, इसके लिये साधुवाद! मेरे कुछ लिखनेसे आपकी कुछ भी सेवा बनी हो तो यह मेरा सौभाग्य है। वस्तुत: मेरे पास अपना निजका (Original) कुछ भी नहीं है। जो कुछ मैं लिखता हूँ, सब शास्त्रों और सन्तोंका ही जूँठन प्रसाद है।

आपने लिखा कि ‘किसीके साथ खानेमें क्या दोष होता है? जब हम उसके बुरे कार्योंमें कोई साथ नहीं देते, तब उसका हमपर दोष क्यों आना चाहिये? और यह भी कौन कह सकता है कि दूसरे ही बुरे हैं, हम बुरे नहीं हैं? अपनेको बुरा न मानना और दूसरोंको बुरा बताकर उससे परहेज रखना तो सरासर अहंकार है और इस अहंकारसे क्या मनुष्यको नहीं बचना चाहिये?’

उत्तरमें यह नम्र निवेदन है कि दूसरेको बुरा मानना और अपनेको अच्छा मानना तो कदापि उचित नहीं है; बल्कि सन्तलोगोंको तो दूसरोंमें बुराई दीखती ही नहीं, वे तो सारी बुराई अपनेमें ही देखते हैं। सन्तवाणी है—

बुरा जो देखन मैं गया बुरा न पाया कोय।

जो तन देखा आपना मुझ-सा बुरा न कोय॥

परन्तु दूसरोंको बुरा बताकर किसीसे परहेज करना दूसरी बात है, और सरल शुद्धिकी नीयतसे खान-पान आदिमें अलग रहना दूसरी बात है। हम यह क्यों न समझें कि ‘हम बुरे हैं, इसलिये हम अपनी बुराईसे दूसरोंको बचानेके लिये उनसे अलग खाते-पीते हैं।’ कोई राज्यक्ष्माका रोगी यदि घरवालोंको अपने सम्पर्कसे बचाये रखे तो वह उनमें बुराई देखकर उनसे परहेज नहीं करता, न अपनेको अच्छा ही मानता है। वह तो अपनी बुराईका संक्रमण दूसरोंमें न हो, इसीलिये उनसे अलग रहता है। अब रही बात साथ खानेमें दोष लगनेकी, सो यह अवश्य विचारणीय है। आप तो पढ़े-लिखे पुरुष हैं। विलायती दवाओंकी शीशियोंके लेबलपर आपने (Untouched by hand) ‘हाथसे स्पर्श नहीं किया गया’ छपा देखा होगा। ऐसा क्यों? हाथसे छूनेसे क्या हानि है? यदि हानि नहीं है तो फिर इन वैज्ञानिक डॉक्टरोंका यह बहम कैसा? वस्तुत: यह बहम नहीं है। स्पर्शकी बात तो अलग रही, पास बैठकर बातचीत करनेसे भी शारीरिक और मानसिक रोगके परमाणुओंका आदान-प्रदान होता रहता है। इसीसे सत्संग तथा सत्स्थानकी महिमा है और कुसंग तथा कुस्थलकी निन्दा की गयी है। नारदपांचरात्रमें आया है—

आलापाद् गात्रसंस्पर्शाच्छयनात् सहभोजनात्।

संचरन्ति हि पापानि पुण्यं चैव तथा विशेत्॥

तस्मात् भक्तै: सहालापं कुरुते पण्डित: सदा।

यात्येवाभक्तसम्पर्काद् दुष्टात् सर्पाद् यथा नर:॥

‘किसीके साथ बातचीत करनेसे, देहका स्पर्श करनेसे, एक साथ सोनेसे और साथ भोजन करनेसे एक देहके पाप दूसरे देहमें प्रवेश करते हैं। इसी प्रकार पुण्यात्माके पुण्य भी एक देहसे देहान्तरमें प्रवेश करते हैं।’

‘इसीसे समझदार लोग सदा भक्तोंके साथ बातचीत किया करते हैं। अभक्तके सम्पर्कसे तो वैसे ही विनाश होता है जैसे दुष्ट सर्पके संगसे मनुष्यके प्राण चले जाते हैं।’

इसीलिये हिन्दू-शास्त्रोंमें स्पर्शास्पर्शका विज्ञान है। रजस्वला माता, पत्नी और पुत्रीका भी स्पर्श नहीं किया जाता। उनमें घृणा नहीं है। है विज्ञानसम्मत विवेक, जो विविध रोग तथा अपवित्रताके संक्रमणसे परस्पर रक्षा करता है। इसीलिये हिन्दू-भोजन-विज्ञानके अनुसार पंक्ति तथा व्यक्तिके साथ भेदयुक्त व्यवहारकी सुन्दर व्यवस्था है!

आजकल तो खान-पानमें अनर्गल अनाचार चल रहा है, वह तो बुद्धिका सर्वथा नाशक है। शारीरिक रोगोंकी वृद्धि तो इससे होती ही है। पर किसको समझाया जाय? जब आप-सरीखे पुरुष ही ऐसी दलील पेश करते हैं तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है। समयकी लहर है, क्या किया जाय; परन्तु इससे परिणाम तो पलटेगा नहीं। बुरेका फल निश्चित बुरा ही होगा।

मेरी सम्मतिमें तो घृणा किसीसे नहीं करनी चाहिये। मनुष्यकी बात तो दूर रही—पशु-पक्षी और क्षुद्र कीट-पतंगसे भी नहीं। परन्तु व्यवहार करना चाहिये अपने वर्णाश्रमके अनुसार यथायोग्य। सबके साथ खान-पान कभी नहीं करना चाहिये। अवश्य ही सहभोजमें आजकल गौरव माना जाता है; पर वस्तुत: यह पतनका चिह्न है, उत्थानका नहीं!